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    ईरानी लड़कियों के सीने में जलती है एक आग

    ईरान में लड़कियों अपने दमन और उत्पीड़न की परवाह किए बिना, अपने कटे होंठों से बहते लहू के साथ मोर्चे पर हैं, ईरान को बदलने की बात कर रही हैं. वैसे ईरान में लड़कियों की यह जुझारू भूमिका नई नहीं है.

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    सुपरस्टार के 'नाम पर' दिखना, छपना कहीं आसान, लेकिन सवाल शाहरुख खान से कहीं आगे का है!

    सवाल यह है कि 'एक वर्ग' जो साल 2024 में ट्विटर पर-ऑल आइज ऑन राफाह- पोस्ट की झड़ी लगा देता है, वह इस तरह की घटनाओं पर क्यों चुप्पी साध लेता है? यहां एक बार को किंग खान की मजबूरी समझी जा सकती है, लेकिन बाकी लोगों को किसी शख्स की जिंदा जला देने, बर्बरतापूर्ण ढंग से मार देने की घटना क्यों नहीं झकझोरती?

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    "असली धुरंधरों" को महसूस, आत्मसात, अनुसरण करने, सम्मान देने की जरूरत

    सिनेमा संदेश ही दे सकता है, इसे ग्रहण करना, आत्मसात करना समाज के ऊपर है! ISI करीब 77 साल पहले अपनी स्थापना (1 जनवरी, 1948) के बाद से ही भारत के खिलाफ 'अलग-अलग तरह के युद्ध' छेड़े हुए है. ऐसे-ऐसे युद्ध, जिनकी आप एक बार को कल्पना भी नहीं कर सकते

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    स्मृतिशेष ज्ञानरंजन: हिंदी की ऊष्मा और ऊर्जा का एक स्रोत चला गया

    वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार ज्ञानरंजन का आज 89 साल की उम्र में निधन हो गया. उन्हें उनकी कहानियों के साथ-साथ 'पहल' नाम की साहित्य पत्रिका के संपादन के लिए भी याद किया जाएगा.

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    वेनेज़ुएला पर हमला: अमेरिकी ताकत की नई परिभाषा गढ़ता डोनाल्ड ट्रंप का 'डॉनरो सिद्धांत'

    डोनाल्ड ट्रंप का 'डॉनरो सिद्धांत' लोकतंत्र या वैचारिक संघर्ष से कम और संसाधनों, सुरक्षा और महान शक्ति प्रतिस्पर्धा से अधिक जुड़ा है. इस बारे में और विस्तार से बता रहे हैं डॉक्टर मनीष दाभाडे.

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    वेनेजुएला में नैतिकता गई तेल लेने! पश्चिम का दोहरा रवैया, संयुक्त राष्ट्र पर सवाल, शीतयुद्ध की आशंका

    अमेरिका का वेनेजुएला पर सीधा सैन्य हमला वैश्विक राजनीति में ताक़त बनाम नैतिकता की बहस को फिर से तेज़ कर रहा है, जहां तेल संसाधनों और भू-रणनीतिक हितों के लिए अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की अनदेखी की गई.

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    21वीं सदी के 25 साल, कितने कमाल-कितने मलाल

    वैसे इन पच्चीस वर्षों में जितने त्वरित बदलाव दिख रहे हैं, उतने ही ज़िद्दी ठहराव भी नज़र आ रहे हैं. जिन बीमारियों को हम उन्नीसवीं सदी में ख़त्म मान ले रहे थे, वे इक्कीसवीं सदी में प्रगट हो रही हैं. जिन बहसों को बीती सदी में बीत जाना चाहिए था, वे नई धमक के साथ मौजूद हैं.

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    छत्तीसगढ़ के माओवादी आंदोलन से आदिवासियों को क्या मिला

    छत्तीसगढ़ में करीब चार दशक तक चले माओवादी आंदोलन में आदिवासियों के हिस्से में क्या आया है, बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी.

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    IND vs RSA: दक्षिण अफ्रीका ने टीम इंडिया को "फर्स्ट क्लास कम्पार्टमेंट" से बाहर निकाल दिया!

    India vs South Africa: टीम इंडिया का सीरीज में सफाया तो तभी तय हो गया था जब उसे दक्षिण अफ्रीका ने उस पर 549 का भारी-भरकम लक्ष्य लाद दिया था, लेकिन आखिरी दिन सर्वकालिक सबसे बड़ी हार की कल्पना शायद ही किसी ने की थी

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    आ गया 2026 : सुंदरता के पोस्टकार्ड से बाहर का उत्तराखंड और विकास की असली तस्वीर

    नए साल की शुरुआत हो चुकी है. उत्तराखंड में सूर्य की पहली किरण एक नई उम्मीद के साथ लोगों के जेहन में उतर चुका है.

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    सैलाब में खो गया सुकून... कोविड के बाद अचानक 'घुमक्कड़' कैसे हो चली जिंदगी?

    कोरोना के बाद भारत में एक नई आदत नहीं, बल्कि एक नई मानसिकता पैदा हुई है. 'अब नहीं तो कभी नहीं' की मानसिकता. लॉकडाउन ने लोगों से सिर्फ आजादी नहीं छीनी थी, उसने समय का भरोसा भी छीन लिया था. नतीजा यह हुआ कि जैसे ही पाबंदियां हटीं, लोग घरों से नहीं, बल्कि भीतर जमी हुई बेचैनी से बाहर निकले.

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    QS 2026: भारतीय विश्वविद्यालयों की हरित प्रगति, सरकार की पहल का क्या असर?

    QS रैंकिंग में दुनियाभर के विश्वविद्यालयों को शामिल किया जाता है. इस बार की रैंकिंग में आईआईटी रुड़की, बीएचयू जैसे संस्थानों को दर्जा मिला है.

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    अरावली कटी तो आएंगे कई देश जद में... ये मुद्दा सिर्फ राजस्थान का थोड़ी है

    अरावली का मुद्दा जंगल बनाम विकास की बहस का है ही नहीं. यह उस सोच की परीक्षा है, जो मानती है कि पहाड़ काटे जा सकते हैं, हवा बांटी जा सकती है और पानी को फाइलों में सीमित किया जा सकता है. अरावली पर चला हर बुलडोजर सिर्फ अलवर या गुरुग्राम की जमीन नहीं छीलता, वह दक्षिण एशिया की साझा सांसों पर असर डालता है.

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    जब अदालतें पहाड़ तय करने लगें... अरावली पर SC के 100 मीटर वाले फैसले की असहज करने वाली सच्चाई

    क्या पहाड़ियों और पर्वत प्रणालियों की वैज्ञानिक परिभाषा तय करना सुप्रीम कोर्ट का काम है? पर्यावरण संरक्षण में भारतीय न्यायपालिका की भूमिका ऐतिहासिक रही है, खासकर अनुच्छेद 21 के तहत, जहां उसने कार्यपालिका की निष्क्रियता के बीच हस्तक्षेप किया है.

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    विनोद कुमार शुक्ल नहीं रहे... दीवार से देह निकल गई, शब्दों की खिड़की से रोशनी आती रहेगी

    विनोद कुमार शुक्ल लिख और छप तो सातवें दशक से रहे थे और अपनी सहज प्रयोगशीलता के साथ रचनाकर्म को बरत रहे थे, लेकिन कीर्ति संभवतः उन्हें कुछ देर से मिली. सत्तर और अस्सी के दशक बहुत ऊंची आवाज़ में सुनाई पड़ने वाली जनपक्षधर कविताओं के थे जिनके बड़े नायक नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल जैसे कवि थे.

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    कांग्रेस में फिलहाल कोई वैकेंसी नहीं, राहुल और प्रियंका एक ही हैं

    राहुल वैसे नेता हैं जो खुद खूब मेहनत करते हैं और अपने नेताओं से भी वही उपेक्षा करते है. भले ही उनके पास कोई अहमद पटेल जैसा राजनैतिक सूझबूझ वाला व्यक्ति नहीं है. उनकी अपनी एक युवा टीम है जो अपने ढंग से पार्टी चला रही है और उसे ही यह जवाब देना है कि पार्टी का प्रदर्शन सुधर क्यों नहीं रहा.

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    वह वाक्य जो फिसलकर गिर पड़ा... क्या सिर्फ हास्य था, या सदियों से चली आती किसी छिपी हुई सीढ़ी का चरमराना?

    हर आदमी की दो मौतें होती हैं. एक जब वह सच को देखता है, और दूसरी जब सच उसे देख लेता है. आज सच ने सदन को देख लिया. तारीफ तब तक तारीफ नहीं होती, जब तक उसमें बराबरी का स्पर्श न हो.

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    3P वाला महासंकट...कल तक जहां खड़े थे नीतीश और जदयू, तेजस्वी के सामने आ गई वही चुनौती

    बिहार में पिछले 4 लोकसभा चुनावों में राजद का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा है. पार्टी को कभी भी 10 सीट पर भी जीत नहीं मिली है. अब विधानसभा चुनाव की हार ने तेजस्वी के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है.

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    अब चुनावी वादों को चुनाव घोषणा पत्र से जमीन पर उतारना पड़ता है, क्या है नीतीश के 'सात निश्चय-3'

    चुनाव के दौरान की जाने वाली घोषणाओं पर उन पर जमीन पर होने वाले क्रियान्वयन को लोग किस तरह से देखते हैं, बता रहे हैं संजीव कुमार मिश्र.

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    गोवा के लिए कितना जरूरी है मैंग्रोव के जंगलों का होना

    मंडोवी, ज़ुअरी और चापोरा नदियों के किनारों पर फैले मैंग्रोव के जंगल पानी को साफ रखते हैं और प्रदूषण को कम करने में मदद करते हैं.

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