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विचार
  • कोरोना काल में गुपचुप तरीके से किराया बढ़ा रही है रेलवे
    रवीश रंजन शुक्ला
    13 फरवरी को दिल्ली से करीब 1200 किमी दूर रांची रेलवे स्टेशन पर जब एक शख्स ने प्लेटफार्म टिकट खरीदा तो 15 रुपए का टिकट उसे 30 रुपए में दिया गया. उसने जब काउंटर पर पूछा कि ये टिकट तो पहले 15 रुपए का था तो जवाब मिला है कल यानि 12 फरवरी से ये 30 रुपए का हो गया है.
  • अब हिन्दुस्तान को कतई परवाह नहीं - कहां पहुंच रही है राहुल गांधी बनाम जी-23 की लड़ाई
    वीर सांघवी
    कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई अब इतनी थकाऊ और दोहरावभरी हो गई है कि जो लोग इस सरकार को रोकने के लिए एक राजनौतिक ताकत को चाहते हैं, उन्हें भी इस पार्टी से कोई उम्मीद नहीं रह गई है.कांग्रेस ऐसी पहली पार्टी नहीं है, जो विपक्ष की भूमिका में पहुंचने के बाद खुद को ही नुकसान पहुंचाने लगी हो. 
  • खराबी नरेंद्र मोदी स्टेडियम की पिच में नहीं, अंग्रेज़ बल्लेबाज़ों के 'कौशल' में है...
    मनीष शर्मा
    इंग्लैड की पहली पारी में चार बल्लेबाज़ LBW और तीन बल्लेबाज़ बोल्ड हुए. दूसरी पारी में भी उसके चार बल्लेबाज़ LBW और तीन बल्लेबाज़ बोल्ड हुए. अगर पिच में अप्रत्याशित घुमाव, उछाल होता, तो उसके ज़्यादार बल्लेबाज़ों के कैच विकेटकीपर / नज़दीकी फील्डरों के हाथों में समाए होते. दूसरी पारी में कीपर पंत के दस्तानों में महज दो कैच आए. इनमें से भी एक नंबर 11 एंडरसन का था.
  • किसान पंचायतों में जाटों और मुस्लिमों का 'साथ' क्या नए सियासी समीकरण का संकेत है?
    कमाल खान
    पश्चिमी यूपी में मुसलमान, पूर्वी यूपी के मुसलमानों की तुलना में ज़्यादा सम्पन्न हैं.सहारनपुर में लकड़ी के कारोबार और मुरादाबाद के पीतल के कारोबार में वे शामिल हैं.वे बड़े किसान भी हैं. यहां जाटों से उनके झगड़े साम्प्रदायिक कम कारोबारी या ज़मीन जायदाद के ज़्यादा रहे हैं.पश्चिमी यूपी में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने "मजगर" यानि मुस्लिम, अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत को जोड़ने का नारा दिया था. इसका उन्हें सियासी लाभ मिला.
  • गांधी के आंगन में गोडसे के पुजारी!
    प्रियदर्शन
    ख़ुद बाबूलाल चौरसिया का बयान इसकी पुष्टि नहीं करता. काश कि उन्होंने कहा होता कि कभी वे नाथूराम गोडसे को महान समझते थे और अपनी इस समझ पर अब वे शर्मिंदा हैं. वे गांधी की तरह किसी प्रायश्चित के लिए तैयार हैं. लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें पता ही नहीं था कि जिसका वे जलाभिषेक कर रहे हैं, वह गोडसे की प्रतिमा है. उनसे धोखे से यह काम कराया गया. कहने की ज़रूरत नहीं कि उनकी इस दलील पर किसी को भरोसा नहीं होगा.
  • समलैंगिक विवाह और हमारी नागरिकता का सवाल
    प्रियदर्शन
    केंद्र सरकार ने दिल्ली हाइकोर्ट में हलफ़नामा देकर कहा है कि वह समलैंगिक शादियों को वैधानिक मान्यता देने के विरुद्ध है. उसकी दलील है कि शादी हमारे यहां एक पवित्र बंधन है. सरकार के हलफ़नामे के मुताबिक एक स्त्री और एक पुरुष के इस रिश्ते को लोकाचार से मान्यता दी जाती है. इसे निजता के मौलिक अधिकार का हिस्सा नहीं माना जा सकता.
  • असल मुद्दों को सोशल मीडिया में कितनी जगह मिलती है?
    रवीश कुमार
    भारत के युवा हमेशा ही निराश करते हैं. उनसे उम्मीद थी कि वे नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम को लेकर डिबेट में डूब जाएंगे लेकिन वे नौकरी पर डिबेट की मांग करने लगे. भारत इंग्लैंड टेस्ट मैच के दूसरे दिन का खेल शुरू होने से पहले इन युवाओं ने नौकरी की बात शुरू कर दी.
  • नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम किसान आंदोलन की सबसे बड़ी जीत है, बस किसानों की नहीं
    रवीश कुमार
    एक ऐसे समाज में जब नब्बे दिनों से किसान कृषि क़ानूनों के विरोध के दौरान अंबानी और अडानी के नाम से भी नारे लगा रहे हैं, राहुल गांधी हम दो और हमारे दो के आरोप मढ़ रहे हैं, अमित शाह अहमदाबाद में एक क्रिकेट स्टेडियम का नाम नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम रख देते हैं. जिसके भीतर एक छोर का नाम रिलायंस एंड है और दूसरे छोर का अडानी एंड. 
  • स्टेडियम के नामकरण को लेकर विपक्ष के मोदी सरकार पर हमले
    रवीश कुमार
    बहस की कमी नहीं पड़नी चाहिए. अगर बेरोज़गारी और पेट्रोल के दाम को लेकर लोग ज़्यादा मीम बनाने लगें तो उन्हें नए मीम बनाने का मौका देना भी एक तरह आपदा में अवसर के समान है. लोग खुद ही इस काम में लगे हुए हैं कि मोटेरा क्रिकेट स्टेडियम का नाम नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम हो गया है. व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का यह फेवरेट टॉपिक है कि किस नेता के नाम पर स्टेडियम से लेकर क्या क्या है.
  • स्टेडियम में प्रधानमंत्री के नाम का खेल
    प्रियदर्शन
    अहमदाबाद का मोटेरा स्टेडियम अब नरेंद्र मोदी स्टेडियम के नाम से जाना जाएगा. जीते-जी किसी नेता के नाम पर भी ऐसे नामकरण की बस एक ही नज़ीर मिलती है जब उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती ने पार्कों में अपनी और अपने परिजनों की मूर्तियां लगवाईं. इसका खमियाजा मायावती को 2012 का विधानसभा चुनाव हार कर भुगतना पड़ा.
  • दिशा रवि को मिली जमानत, अदालत का यादगार फैसला
    रवीश कुमार
    अंधेरों की हजार परतें इंसाफ़ की हवा की दिशा नहीं रोक सकती हैं. सत्ता के दम पर 22 साल की एक लड़की को डराने का अहंकार आज एक फैसले की कापी में चूरचूर होकर बिखरा पड़ा है. सत्ता इससे सबक नहीं लेगी लेकिन पुलिस के अफसरों को लगा कर गोदी मीडिया की फौज खड़ी कर इस मुल्क, जिसका नाम भारत है, में एक 22 साल की लड़की को जिस तरह घेरा गया और उसका मुकाबला इस लड़की ने किया है वही दिशा है. सिर्फ उसका नाम दिशा नहीं है बल्कि वाकई वह दिशा है. जब उसने 20 फरवरी को भरी अदालत में कह दिया कि किसानों की बात करना गुनाह है तो वह जेल में रहना चाहेगी.
  • BJP ने धर्म का इस्तेमाल किया, लेकिन धर्म का बेहतरीन आचरण कभी प्रस्तुत नहीं किया...
    रवीश कुमार
    मैं इस सवाल का उत्तर जानना चाहता हूँ कि जो पार्टी धर्म और धार्मिक पहचान की राजनीति करती हो वह अपने समर्थक समूह से लेकर कार्यकर्ता समूह में धर्म का कौन सा आचरण स्थापित कर पाती है?
  • देशभक्ति, देशद्रोह और चुटकुले  ..
    प्रियदर्शन
    हिंदुस्तान के नेताओं को भी याद रखना चाहिए कि वे सब कुछ बदल डालेंगे, तब भी स्मृतियां बची रहेंगी- वे बची रहती हैं, वे उन पर कहानियां, फिल्में और चुटकुले बनाती रहेंगी.हिंदुस्तान में बीते दो साल में 6,600 से ज़्यादा लोग देशद्रोह के आरोप में जेल में डाल दिए गए. यह चुटकुला नहीं है, तथ्य है, लेकिन किसी चुटकुले से कम नहीं है. इसके पहले जिन लोगों पर देशद्रोह के मुक़दमे चले, उनमें से 2 फ़ीसदी पर ही आरोप तय हो पाए
  • अंतराष्ट्रीय दाम कम तो देश में पेट्रोल महंगा क्यों?
    रवीश कुमार
    पेट्रोल और डीज़ल के दाम दस दिन से लगातार बढ़ते जा रहे हैं. मध्य प्रदश में प्रीमियम पेट्रोल सौ रुपये लीटर हो गया है. अनुपपूर शहर में तो सामान्य पेट्रोल 100 रुपये लीटर हो गया है. भारत में अब ऐसे कई शहर हैं जहां पेट्रोल 98 से 100 रुपये लीटर बिक रहा है. उपभोक्ता को समझ नहीं आ रहा है कि ये दाम अंतरराष्ट्रीय कारणों से बढ़ रहे हैं या उन कारणों से जिसका पता नहीं चल रहा है. पेट्रोल डीज़ल के बढ़ते दाम से हर दिन लोगों की कमाई घटती जा रही है. 2017, 2018 के बाद यह तीसरा मौका है जब पेट्रोल की कीमतें लंबी छलांग रही हैं.
  • वसीम जाफ़र के साथ खड़े हों
    प्रियदर्शन
    यह छुपी हुई बात नहीं है कि सौतेलेपन का यह एहसास इस समाज में बढ़ रहा है. बहुत संभव है कि यह सौतेलापन बहुत सारे लोगों के भीतर न हो, बहुसंख्यक समाज के भीतर भी न हो, लेकिन जो मुखर सौतेलापन है, वह इन वर्षों में दुराग्रही भी हुआ है, तीखा भी और ढीठ भी.
  • क्या सरकार दमन का टूलकिट तैयार कर रही है?
    प्रियदर्शन
    टूलकिट पर लौटें. कोई भी आंदोलन, संस्थान या समूह अपने लक्ष्यों के लिए टूलकिट बना सकता है. पहले भी ये टूलकिट बनते रहे हैं. लेकिन ग्रेटा थनबर्ग द्वारा ट्वीट किया गया टूलकिट आने पर सरकार ऐसे चौंक रही है जैसे पहली बार उसने इसका नाम सुना हो. यह नादानी से ज़्यादा सयानापन है- टूलकिट जैसे किसी दस्तावेज़ को जबरन आतंक और अलगाववाद का दस्तावेज़ साबित करने का सयानापन.
  • क्लाइमेट एक्टिविस्ट दिशा रवि की गिरफ्तारी पर उठे बड़े सवाल
    रवीश कुमार
    अच्छी बात है कि 98 से 100 रुपये लीटर पेट्रोल बिकने से देश परेशान नहीं है. दिल्ली में एक रात में गैस के सिलेंडर के दाम 50 रुपये बढ़ गए, दिल्ली परेशान नहीं है. जो देश इन बातों से परेशान नहीं है उस देश को इस बात से परेशान किया जा रहा है कि बंगलुरु की एक 22 साल की लड़की दिशा ए रवि गिरफ्तार हुई है जिस पर राजद्रोह, दो समुदायों के बीच नफरत और साज़िश करने के आरोप हैं. भारत की छवि ख़राब करने के आरोप हैं. भारत की छवि ख़राब करना एक नया आरोप है, इसे कानूनी रूप से कहां परिभाषित किया गया है यह बताना मेरे बस की बात नहीं है. लेकिन दिशा ए रवि की गिरफ्तारी के सिलसिले में कुछ शब्द चल पड़े हैं. हैं पुराने लेकिन इस बार पुलिस की निगाह से संदिग्ध हो गए हैं. टूल किट. डिजिटल स्टार्म. यानी ट्वीटर फेसबुक या व्हाट्सएप के ज़रिए किसी चीज़ को वायरल कर देना. आए दिन होता रहता है और आप इसके आदी हो चुके हैं.
  • क्यों अर्थव्यवस्था के मामले में भारत बांग्लादेश से नीचे 164वें पायदान पर है?
    रवीश कुमार
    चौपट अर्थव्यवस्था के दौर में भारतीय जनता ने महंगाई को जिस तरह गले लगाया है वह अद्भुत है. हर बढ़ती हुई कीमत जनता को स्वीकार है. जनता ने महंगाई को लेकर सरकार को मनोवैज्ञानिक दबाव से मुक्त कर दिया है.
  • वैलेंटाइन डे पर देश की लड़कियों को रवीश कुमार की सलाह
    रवीश कुमार
    जिस समाज में प्रेम करना मुश्किल हो जाए उस समाज में सबसे पहले नौजवान ही नहीं रहना चाहेंगे. रहेंगे भी तो मन मार कर. ज़िंदा लाश बन कर.
  • क्या महापंचायतें किसान आंदोलन को थाम पाएंगी?
    रवीश कुमार
    किसान आंदोलन ने इतना तो कर दिया कि नवंबर से लेकर अभी तक देश में खेती पर बात हो रही है. इस बीतचाती के कई मंच हैं. एक मंच है संसद. दूसरा मंच है राजनीतिक रैलियां. तीसरा मंच है किसान आंदोलन और उनकी महापंचायतें हैं. चौथा मंच है अखबारों के संपादकीय पन्ने हैं. किसान आंदोलन के कारण कांग्रेस और बीजेपी की आर्थिक नीतियां भी एक्सपोज़ होती रहीं. विपक्ष में रहते हुए कुछ और सत्ता में आकर कुछ. ऐसा इसलिए होता है कि दोनों की आर्थिक नीतियां एक ही किताब और स्कूल से आती हैं.
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