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This Article is From Aug 14, 2025

कब रुकेगा कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न, कितना सफल हुई है आईसीसी 

सुभाष कुमार ठाकुर
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अगस्त 14, 2025 14:44 pm IST
    • Published On अगस्त 14, 2025 14:43 pm IST
    • Last Updated On अगस्त 14, 2025 14:44 pm IST
कब रुकेगा कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न, कितना सफल हुई है आईसीसी 

कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने एक दिशा-निर्देश जारी किया था. इसे 'विशाखा गाइडलाइंस' के नाम से जाना जाता है. केंद्र सरकार ने 2013 में विशाखा गाइडलाइंस को कानूनी स्वरूप देते हुए कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 पारित किया. इस अधिनियम की धारा-4 के मुताबिक प्रत्येक नियोक्ता के लिए यह अनिवार्य है कि वह कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए 'आंतरिक शिकायत समिति' (आईसीसी) का गठन करेगा. इस अधिनियम को उच्च शिक्षण संस्थानों में व्यावहारिक रूप में लागू करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षण संस्थानों में महिला कर्मचारियों एवं छात्रों के प्रति यौन उत्पीड़न की रोकथाम, प्रतिषेध और निवारण) विनियम, 2015 जारी किया. लेकिन इन तमाम कानूनी प्रावधानों के बावजूद आज भी अधिकांश कार्यस्थलों पर या तो आईसीसी का गठन ही नहीं हुआ है या फिर आईसीसी की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है.यह स्थिति कानून के क्रियान्वयन में गंभीर शिथिलता और उदासीनता को दर्शाती है.

राज्यों को सजा दे चुकी है सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट के बार-बार निर्देशों के बावजूद कई राज्य अब भी वैधानिक दायित्वों का पालन नहीं कर रहे हैं, इससे कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का सामना करने वाली महिलाओं को प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र से वंचित होना पड़ रहा है. इससे केवल न्याय में विलंब ही नहीं होता है, बल्कि न्याय तक पहुंच से भी वंचित होना पड़ता है. उल्लेखनीय है कि 11 फरवरी, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर, झारखंड,मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना और पुडुचेरी जैसे पांच राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश को सरकारी कार्यस्थलों में आईसीसी गठित न करने के लिए दंडित किया.

चिंताजनक बात यह है कि अधिकतर कार्यस्थलों पर अगर आईसीसी है भी तो केवल कागजों में है. कई बार ऐसा देखा गया है कि शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई नहीं की जाती है.परिणामस्वरूप या तो किसी पीड़िता को अपनी नौकरी या पढ़ाई छोड़नी पड़ती है या फिर अपनी जान गंवानी पड़ती है. ओडिशा के बालासोर के फकीर मोहन कॉलेज में इस साल 12 जुलाई जो कुछ हुआ उसने पूरे उच्च शिक्षा जगत को झकझोर कर रख दिया. बीएड की एक छात्रा ने अपने ही विभागाध्यक्ष द्वारा किए जा रहे यौन उत्पीड़न से तंग आकर कॉलेज परिसर में ही आत्मदाह कर लिया. वह 90-95 फीसद तक जल गई थी. इलाज के दौरान 14 जुलाई को उसकी मौत हो गई. यह केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि यह हमारी शैक्षणिक संस्थाओं की असंवेदनशीलता और लचर व्यवस्था की भयावहता को उजागर करता है.इस मामले में ध्यान देने वाली बात यह है कि पीड़िता ने 30 जून को कॉलेज की आंतरिक शिकायत समिति में अपने यौन उत्पीड़न की औपचारिक शिकायत भी की थी. उसने आरोप लगाया था कि विभागाध्यक्ष ने उससे यौन संबंधों की मांग की थी. पीड़ित छात्रा का आरोप था कि इनकार करने पर शैक्षणिक कैरियर बरबाद करने की धमकी दी थी.एक जुलाई को उसने पुलिस में भी शिकायत की थी, लेकिन न तो कॉलेज प्रशासन ने और न ही पुलिस ने कोई ठोस कदम उठाया. आईसीसी ने नौ जुलाई को जांच रिपोर्ट तो सौंपी,लेकिन उसमें कोई निर्णायक अनुशंसा नहीं की गई.

कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं महिलाएं

यह भयावह स्थिति केवल एक कॉलेज या संस्थान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कमोबेश हर कार्यस्थल पर विद्यमान है.न्यूज एजेंसी पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक एक आरटीआई रिप्लाई से पता चला है कि 2017 से 2024 के बीच दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में यौन उत्पीड़न की 151 शिकायतें दर्ज कराई गईं. अक्टूबर 2024 में परिसर में आयोजित एक फ्रेशर्स पार्टी के दौरान यौन उत्पीड़न और हिंसा की घटनाओं को लेकर 47 छात्राओं ने आईसीसी में एक सामूहिक शिकायत दर्ज करवाई थी. इन छात्राओं ने कार्रवाई की मांग की थी. ऐसे ही एक मामले में जेएनयू ने 17 अप्रैल,2025 को एक वरिष्ठ प्रोफेसर स्वर्ण सिंह को बिना सेवानिवृत्ति लाभ के बर्खास्त कर दिया. उन पर आरोप है कि उन्होंने जापानी दूतावास में काम करने वाली एक महिला के साथ विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में कथित तौर पर छेड़छाड़ की थी. स्वर्ण सिंह ने अपनी बर्खास्तगी को दिल्ली हाई कोर्ट में रिट याचिका (सिविल—5269/2025) के जरिए चुनौती दी है. उनके वकील की दलील है कि आईसीसी का गठन कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 में निर्धारित प्रावधानों के अनुरूप नहीं किया गया था. उल्लेखनीय है कि इस अधिनियम की धारा-4(2) के मुताबिक आईसीसी में कम से कम छह सदस्य होने चाहिए- एक अध्यक्ष (महिला प्रोफेसर), दो अन्य संकाय सदस्य, दो गैर-शैक्षणिक सदस्य और एक गैर-सरकारी संगठन का प्रतिनिधि जो महिलाओं के हितों के लिए प्रतिबद्ध हो. इसके साथ ही आईसीसी के कुल सदस्यों में कम से कम 50 फीसद सदस्य महिलाएं होनी चाहिए.परंतु स्वर्ण सिंह मामले में केवल तीन सदस्यीय आईसीसी गठित की गई थी. यह अधिनियम के प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन है.

आरोपी प्रोफेसर के वकील ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि यह भी स्पष्ट नहीं है कि समिति में नियुक्त सदस्यों के पास आवश्यक योग्यताएं थीं या नहीं. यह बताते चलें कि अधिनियम की धारा—4(5) के मुताबिक यदि आईसीसी का अध्यक्ष या कोई सदस्य अधिनियम की धारा—16 के प्रावधानों (यह शिकायत और जांच रिपोर्ट को गोपनीय रखने की बात करता है) का उल्लंघन करता है या उसके विरुद्ध किसी अपराध में दोष सिद्ध हो चुका हो या वर्तमान में कोई आपराधिक जांच लंबित हो या वह किसी अनुशासनात्मक कार्रवाई में दोषी पाया गया हो या ऐसी कोई कार्रवाई उसके विरुद्ध लंबित हो या उसने अपने पद का ऐसा दुरुपयोग किया हो जिससे उसका पद पर बने रहना जनहित के प्रतिकूल हो तो ऐसे अध्यक्ष या सदस्य को आईसीसी से हटा दिया जाएगा. अधिवक्ता ने इस आधार पर तर्क दिया है कि आईसीसी के गठन की प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं. इससे पूरी जांच प्रक्रिया शून्य और अमान्य हो जाती है. यह भी कहा गया है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय अधिनियम, 1966 की धारा-30(4) के तहत सेवा से बर्खास्तगी जैसी गंभीर अनुशासनात्मक कार्रवाई से पूर्व याचिकाकर्ता को कारण बताओ नोटिस देना अनिवार्य था.परंतु इस मामले में जेएनयू की 'कार्यकारी परिषद' ने बिना नोटिस जारी किए ही बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया. उल्लेखनीय है कि जेएनयू की ओर से पेश अधिवक्ता ने सुनवाई के दौरान यह स्वीकार किया कि आरोपी प्रोफेसर को कोई नोटिस जारी नहीं किया गया था. मीडिया रिपोर्ट्स से यह भी पता चलता है कि आरोपी प्रोफेसर को महिला की ओर से दर्ज कराई गई शिकायत और आईसीसी की जांच रिपोर्ट की कॉपी भी नहीं दी गई. इन तमाम तथ्यों का संज्ञान लेते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने 14 मई, 2025 को जेएनयू कार्यकारी परिषद के फैसले को अंतिम निर्णय आने तक के लिए स्थगित कर दिया है.

जीएसकैश बनाम आईसीसी

उल्लेखनीय है कि 2017 में जेएनयू की जेंडर सेंसिटाइजेशन कमिटी अगेंस्ट सेक्सुअल हैरसमेंट (जीएसकैश) को खत्म कर आईसीसी का गठन किया गया था. लेकिन तभी से छात्र संघ और शिक्षक संघ लगातार आईसीसी का विरोध कर रहे हैं. उनकी मांग है कि जीएसकैश को फिर बहाल किया जाए. इसके हितधारकों का कहना है कि आईसीसी में जीएसकैश जैसी पारदर्शिता और स्वायत्तता का घोर अभाव है, इस वजह से यह प्रशासनिक दबाव में शिकायतों का निपटारा करता है.यही कारण है कि आईसीसी की कार्यप्रणाली को लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए. इस पर लोगों का भरोसा कम हुआ.

आईसीसी को यौन उत्पीड़न की शिकायतों पर त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई के लिए गठित किया गया था, वह अब तक अपनी भूमिका निभाने में असफल रही है. यह दर्शाता है कि कई संस्थानों में आईसीसी महज औपचारिकता बन कर रह गई है. जेएनयू और बालासोर की घटनाओं में एक बात समान है, दोनों ही मामलों में आईसीसी की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है. दोनों ही मामलों में कहा जा रहा है कि आईसीसी ने कानून द्वारा निर्धारित उचित प्रक्रिया का अनुसरण नहीं किया. बालासोर वाली घटना से यह बात निकलकर सामने आ रही है कि आईसीसी ने सही तरीके से जांच नहीं की और आरोपी विभागाध्यक्ष को बचाने की कोशिश की गई.वहीं जेएनयू वाली घटना में आरोपी प्रोफेसर का कहना है कि आईसीसी ने पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर जांच प्रक्रिया को अंजाम दिया. इसके परिणामस्वरूप जेएनयू की कार्यकारी परिषद ने बिना नोटिस के बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया.

क्या आईसीसी में सुधार की जरूरत है

ओडिशा सरकार ने बालासोर मामले में संज्ञान लेते हुए कॉलेज के प्राचार्य और आरोपी प्रोफेसर को निलंबित कर जांच समिति गठित की है. यह जरूरी कदम है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पर्याप्त है? क्या हम फिर से किसी अगली घटना का इंतजार करेंगे या संस्थागत जवाबदेही को लेकर कोई ठोस कदम उठाएंगे? यह घटना एक चेतावनी है कि अगर व्यवस्था को दुरुस्त नहीं किया गया तो यह एक के बाद एक अनेक जिंदगियों को निगल सकती है. इस घटना से सबक लेने की जरूरत है. हर कार्यस्थल पर आईसीसी को सिर्फ कागजी संस्था नहीं, बल्कि शिकायत निवारण के लिए एक सक्रिय, पारदर्शी और संवेदनशील मंच बनाना होगा. किसी भी व्यवस्था से लोगों का भरोसा उठ जाना सबसे चिंताजनक बात है. महिलाओं को यह भरोसा दिलाना होगा कि उनकी आवाज सुनी जाएगी और उन्हें न्याय मिलेगा.पुलिस प्रशासन के पास भी ऐसे संवेदनशील मामलों में निष्क्रियता की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए.यूजीसी की गाइडलाइंस के मुताबिक सभी शिक्षण संस्थानों को साल में तीन बार जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन करवाना चाहिए ताकि महिलाओं को पता चल सके कि यौन उत्पीड़न के विरुद्ध किस प्रकार से कानूनी सहायता ली जा सकती है और पुरुषों को भी यह पता चल सके कि उनकी किस तरह की गतिविधियां यौन उत्पीड़न के दायरे में आ सकती हैं.

अस्वीकरण: लेखक बिहार की बाबासाहब भीमराव आंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर के राजनीति विज्ञान विभाग में शोधछात्र हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.

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