-
ब्लॉग राइटर
-
राइटर को गोली मारी, अब उसका स्मारक जलाया- ऐसे महान बनेगा अमेरिका?
इस हत्या की पूरे अमेरिका में तीखी प्रतिक्रिया हुई. लेकिन फेडरल एजेंसियों ने गोली चलाए जाने को सही ठहराया. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कहा कि यह आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई थी- यह महिला पुलिसवाले को कुचलने का इरादा रखती थी. ट्रंप के मुताबिक पुलिसवाला अस्पताल पहुंच गया. हालांकि वीडियो बताते हैं कि यह भी ट्रंप का एक और झूठ भर है.
- फ़रवरी 23, 2026 18:38 pm IST
-
सौ साल बाद के लिए अभी लिखी जा रही किताबें
फ्यूचर लाइब्रेरी ऐसी ही विराट परियोजना है जिसका इरादा हमारे समय की सर्वश्रेष्ठ रचनात्मकता और कल्पनाशीलता को एक सदी के बाद के पाठकों के लिए बचाए रखने का है. वैसे यह सच है कि दुनिया जितनी तेज़ी से बदलती है, उतनी ही ज़िद के साथ पुरानेपन से जकड़ी भी रहती है.
- फ़रवरी 11, 2026 17:55 pm IST
-
दुष्यंत की कोशिश थी कि ये सूरत बदलनी चाहिए- उन्होंने ग़ज़लों की बिल्कुल नई लकीर खींची
अचानक यह बात समझ में आती है कि उर्दू में फ़ैज़ जिस बात के लिए सराहे जाते हैं- रोमानियत और राजनीति को मिलाने के लिए, उसे शायद हिंदी में दुष्यंत कुमार ने कुछ और गाढ़ेपन के साथ साधने में कामयाबी हासिल की है.
- फ़रवरी 03, 2026 18:45 pm IST
-
दिल्ली बुक फेयर में लाखों नई किताबें, AI और इंटरनेट पर दुनिया भर के कंटेंट के बावजूद कैसे टिकी हैं पुस्तकें
किताबों ने हमें देखना सिखाया है. किताबें ख़ूब ख़रीदें. यह अनुभव आम है कि हम जितनी किताबें ख़रीदते हैं, उतनी पढ़ नहीं पाते. लेकिन किताबों का घर में होना आश्वस्त करता है कि किसी भी दिन हम चाहें तो उन्हें पलटेंगे. किताबें भी हमें अपनी आलमारियों से देखती रहती हैं.
- जनवरी 12, 2026 21:34 pm IST
-
विनोद कुमार शुक्ल नहीं रहे... दीवार से देह निकल गई, शब्दों की खिड़की से रोशनी आती रहेगी
विनोद कुमार शुक्ल लिख और छप तो सातवें दशक से रहे थे और अपनी सहज प्रयोगशीलता के साथ रचनाकर्म को बरत रहे थे, लेकिन कीर्ति संभवतः उन्हें कुछ देर से मिली. सत्तर और अस्सी के दशक बहुत ऊंची आवाज़ में सुनाई पड़ने वाली जनपक्षधर कविताओं के थे जिनके बड़े नायक नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल जैसे कवि थे.
- दिसंबर 24, 2025 09:28 am IST
-
धर्मेंद्र को जीते-जी मार डाला! शर्म मीडिया को मगर नहीं आती
धर्मेंद्र पर लौटें. यह सच है कि वे अरसे से बीमार हैं. बीच-बीच में अस्पताल भी जाते रहे हैं. लेकिन यह भी सच है कि इस उम्र में वे फिल्में भी करते रहे हैं. इस साल दिसंबर में भी उनकी एक फिल्म आने वाली है.
- नवंबर 12, 2025 16:50 pm IST
-
आधी रात को जब दुनिया सो रही थी, हिंदुस्तान की लड़कियां जश्न मना रही थीं
ये नई लड़कियां अपनी ही नहीं, नए हिंदुस्तान की कहानी भी लिख रही हैं. वे बदल रही हैं और लड़कों को बदलने को मजबूर कर रही हैं. ऐसा नहीं कि ये उपलब्धियां किसी शून्य से अचानक आ गई हैं. अलग-अलग खेलों में ये लड़कियां कमाल कर रही हैं.
- नवंबर 03, 2025 21:31 pm IST
-
किस बात का नशा? हम एक बीमार समाज तो नहीं बना रहे हैं?
भारत में भी ड्रग्स का यह संसार और कारोबार बड़ा होता जा रहा है- इसके प्रमाण बहुत सारे हैं. पंजाब में तो इसने एक महामारी जैसा रूप ले लिया था. बीच-बीच में तमाम विश्वविद्यालयों के आसपास ड्रग्स के धंधे की चिंताजनक ख़बरें आती रही हैं.
- अक्टूबर 29, 2025 20:57 pm IST
-
अथ श्री जननायक कथा: गांधी इसलिए जननायक नहीं, महात्मा कहलाए
बिहार में पिछड़ी राजनीति कर्पूरी ठाकुर को जननायक मानती रही. अब तो सब मानने लगे हैं, लेकिन एक दौर में उनकी पिछड़ी जाति को लेकर मज़ाक उड़ाया जाता रहा, तुकबंदियां की जाती रहीं.
- अक्टूबर 29, 2025 14:06 pm IST
-
जातिवाद ज्यादा खतरनाक है या सांप्रदायिकता?
नीतीश ने भी लालू यादव के मंडल की काट में जो राजनीति विकसित की, वह जातिगत अस्मिताओं को मज़बूत करने वाली ही थी. उन्होंने बस यह किया कि मंडल के कुछ और टुकड़े कर डाले. पिछड़ों में अतिपिछड़े और दलितों में महादलित खोज निकाले. मुसलमानों में भी अशरफ़ और पसमांदा मुसलमान का फ़र्क किया गया.
- अक्टूबर 27, 2025 18:19 pm IST
-
अब हिंदी में आई यह दलित-कथा ज़रूर देखी जानी चाहिए
'धड़क 2' को देखना भारत में जातिगत उत्पीड़न के उन प्रत्यक्ष और परोक्ष अनुभवों से आंख मिलाना है, जिसे वृहत्तर भारतीय समाज पहचानने से भी इनकार करता है- यह कहता हुआ कि यह तो किसी पुराने ज़माने या पिछड़े इलाक़े की बात लगती है.
- अगस्त 04, 2025 23:00 pm IST
-
‘सैटेनिक वर्सेज़’ पर नहीं चलेगी पाबंदी - किसी भी रचना पर नहीं चलती
उम्मीद करनी चाहिए कि इस बार सलमान रुश्दी की किताब पर नए सिरे से पाबंदी नहीं लगेगी. हमारा समाज और हमारी सरकारें अब यह सयानापन दिखाती हैं कि जो भी पाबंदी हो, वह अलिखित हो, अदृश्य हो. ऐसी कई पाबंदियों का दबाव हमारे लेखक और संस्कृतिकर्मी महसूस करते रहे हैं.
- दिसंबर 26, 2024 19:51 pm IST
-
एक ख़त कमाल के नाम
कमाल साहब, हम दोनों को जो चीज़ जोड़ती थी, वह भाषा भी थी- लफ़्ज़ों के मानी में हमारा भरोसा, शब्दों की नई-नई रंगत खोजने की हमारी कोशिश और अदब की दरबानी का हमारा जज़्बा. पत्रकारिता के सतहीपन ने आपको भी दुखी किया और मुझे भी.
- जनवरी 13, 2023 20:57 pm IST
-
सूर्य कुमार यादव की जाति के बहाने
बेशक, यह स्थिति भी स्थायी नहीं रहेगी. सूर्य कुमार यादव या ऐसे दूसरे खिलाड़ियों का उदय बता रहा है कि पुरानी शक्ति-संरचनाएं टूट रही हैं और नई सामाजिक शक्तियां अपनी आर्थिक हैसियत के साथ अपना हिस्सा मांग और वसूल रही हैं. यह स्थिति सिर्फ किसी खेल में नहीं, हर क्षेत्र में देखी जा सकती है.
- जनवरी 12, 2023 21:54 pm IST
-
अब एक और हिंदी दिवस आ गया!
दिलचस्प यह है कि एक तरफ़ हिंदी के मसाले में रेत की यह मिलावट जारी है और दूसरी ओर शुद्धतावाद और पवित्रतावाद का प्रपंच भी चल रहा है.
- जनवरी 10, 2023 21:21 pm IST
-
अब विदेशी विश्वविद्यालयों से भी लीजिए ज्ञान!
उच्च शिक्षा के निजीकरण के बाद उसके भूमंडलीकरण की इस कोशिश के कुछ निहितार्थ तो स्पष्ट हैं. उच्च शिक्षा अब ग़रीबों की हैसियत से बाहर होने जा रही है. क्योंकि वे जिन सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई करते हैं, वे धीरे-धीरे आर्थिक और बौद्धिक रूप से विपन्न बनाए जा रहे हैं. यह सच है कि भारत के विश्वविद्यालय कभी भी बहुत साधन-संपन्न नहीं रहे.
- जनवरी 06, 2023 22:05 pm IST
-
नया साल और हिंदी-उर्दू का सवाल
यह सच है कि हिंदी और उर्दू को सांप्रदायिक पहचान के आधार पर बांटने वाली दृष्टि बिल्कुल आज की नहीं है. उसका एक अतीत है और किसी न किसी तरह यह बात समाज के अवचेतन में अपनी जगह बनाती रही है कि हिंदी हिंदुओं की भाषा है और उर्दू मुसलमानों की.
- जनवरी 03, 2023 21:42 pm IST
-
अभद्र भाषा से लेकर गंभीर बीमारी तक बस नक़ली चिंता
भारतीय राजनीति ने इस कुत्ता शब्द के और भी बुरे इस्तेमाल देखे हैं. 2014 से पहले प्रधानमंत्री पद की दौड़ में लगे तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा गया कि 2002 के गुजरात दंगों का दर्द उन्हें नहीं है?
- दिसंबर 21, 2022 19:57 pm IST
-
बदरंग आस्था बनाम बेशरम रंग
एक दौर में राज कपूर, देवानंद और दिलीप कुमार की फिल्में भी ‘लड़कों को बिगाड़ने वाली’ मानी जाती थीं. बड़े-बूढ़े तो पूरी फिल्म संस्कृति को संदेह से और नाक-भौं सिकोड़ कर देखते थे.
- दिसंबर 16, 2022 17:34 pm IST
-
ये अर्थव्यवस्था है नादान!
जिस डिजिटल लेनदेन का नगाड़ा अगले कई दिनों तक ज़ोर-शोर से बजाया जाता रहा और जिस तरह राष्ट्रीय मुद्रा में लेनदेन का लगभग अवमूल्यन करते हुए डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया गया, उसका उस पहले भाषण में लेश मात्र भी ज़िक्र नहीं था.
- दिसंबर 14, 2022 21:07 pm IST
प्रियदर्शन
प्रियदर्शन
प्रियदर्शन