अब महात्मा गांधी से प्रधानमंत्री मोदी की तुलना!

गांधी और मोदी की तुलना पर लौटें. प्रधानमंत्री मोदी इस लिहाज से गांधी के मुकाबले कहीं ज़्यादा भाग्यशाली रहे कि अपने निर्णाायक लम्हों में वे कभी अकेले नहीं रहे. उनके पीछे हमेशा विशाल बहुमत का बल रहा, बहुत बड़ी तादाद में लोगों के समर्थन की ताक़त रही. लेकिन मोदी ने क्या जनता का मन समझते हुए फ़ैसले किए?

अब महात्मा गांधी से प्रधानमंत्री मोदी की तुलना!

राजनाथ सिंह की राय है, महात्मा गांधी के बाद पीएम नरेंद्र मोदी देश की जनता का मन समझने वाले इकलौते नेता हैं

राजनाथ सिंह की राय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महात्मा गांधी के बाद देश की जनता का मन समझने वाले इकलौते नेता हैं. ऐसा करते हैं, उनके इस बयान पर हंसते नहीं हैं. इस पर गंभीरता से विचार करते हैं- एक अन्य सिरे से. मसलन, यह देखें कि महात्मा गांधी और नरेंद्र मोदी के बीच वे कौन से नेता हो सकते थे जिनसे राजनाथ सिंह ने जनता को समझने का श्रेय छीन लिया.

हम राजनाथ सिंह से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे नेहरू या इंदिरा गांधी की इस लिहाज से तारीफ़ करेंगे. उन्होंने अब तक साबित किया है कि वे नेहरू को समझने की पात्रता ही नहीं रखते लेकिन जिनको समझने का वे दावा करते हैं या कर सकते हैं, उनको इस सिलसिले में याद करें.इस बयान का एक मतलब तो यह है कि सावरकर गांधी या मोदी की तरह जनता का मन समझने में नाकाम थे. सावरकर देश को मातृभूमि नहीं मानते थे, जर्मनों की तरह पितृभूमि कहते थे. वे द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के प्रथम प्रवर्तकों में एक थे- मानते थे कि हिंदू-मुसलमान दो 'नेशन' हैं. काश कि वे जनता का मन समझते.

राजनाथ सिंह के हिसाब से सरदार पटेल भी गांधी और मोदी की तरह जनता का मन नहीं समझते थे. उन्होंने क़रीब 600 राजों-रजवाड़ों को जोड़कर वह हिंदुस्तान बनाया जो असल में जनता का हो सका. और तो और, जयप्रकाश नारायण भी मोदी या गांधी की तरह जनता का मन नहीं समझ पाए. वे इस देश में दूसरी आज़ादी के जनक कहलाए. उन्होंने इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी. जनता उनके पीछे-पीछे चली. उनकी वजह से केंद्र में पहली बार गैरकांग्रेसी सरकार आई. लेकिन राजनाथ सिंह को वे भी याद नहीं आए. 

जेपी को छोड़ दें, अपनी पार्टी के अटल-आडवाणी को भी भूल गए राजनाथ सिंह. प्रधानमंत्री के रूप में वाजपेयी का काम जैसा भी रहा हो, उनकी लोकप्रियता असंदिग्ध रही. जिस भव्य राम मंदिर के नाम पर बीजेपी अब इतरा रही है, उसकी राजनीतिक बुनियाद रखने वाले, उसे एक आंदोलन में बदलने वाले लालकृष्ण आडवाणी भी राजनाथ को याद नहीं आए.क्या ये सारे लोग जनता का मन नहीं समझते थे? जनता का मन कैसे समझा जाता है? क्या उसे चुनावी जीत के आंकड़ों से साबित किया जा सकता है? तब तो इस देश में जनता का मन समझने वाले सबसे बड़े नेता राजीव गांधी होते क्योंकि अब तक किसी भी लोकसभा चुनाव में 400 से ज़्यादा सीटें जीतने वाले वे इकलौते प्रधानमंत्री रहे हैं. 

बहरहाल, राजनाथ सिंह से इन सवालों के जवाब मिलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. वे इतिहास नहीं लिख रहे थे, वे तथ्य नहीं बता रहे थे, वे बस एक पुस्तक लोकार्पण के कार्यक्रम में अपने प्रधानमंत्री के प्रति चापलूसी को छूती अपनी निष्ठा का प्रदर्शन कर रहे थे. उन्होंने देख लिया है कि जो यह निष्ठा नहीं दिखाते, उनका क्या हश्र होता है. वैसे इसके पहले वे वाजपेयी की गांधी से तुलना कर चुके हैं. वैसे भी इतिहास के प्रति बीजेपी इतनी सदय नहीं रही है- वह अक्सर कुछ इतिहास बदलने, कुछ इतिहास उड़ाने और कुछ इतिहास गढ़ने की कोशिश में ही दिखाई पड़ती है.

लेकिन सवाल तो फिर भी बचा हुआ है. जनता का मन समझने का क्या मतलब होता है? निश्चय ही प्रधानमंत्री मोदी लोकप्रिय नेता हैं. लेकिन लोकप्रियता एक अलग चीज़ है और जनता का मन समझना एक दूसरी चीज़. बहुत सारे खिलाड़ी लोकप्रिय होते हैं, बहुत सारे फिल्मी सितारे लोकप्रिय होते हैं. वे जनता में उम्मीद जगाते हैं, गर्व जगाते हैं, सपना जगाते हैं. नेता भी यही काम करते हैं. उनकी लोकप्रियता का आधार वह उम्मीद होती है जो वे पैदा करते हैं, वे सपने होते हैं जो वे दिखाते हैं. कई बार झूठे सपनों और झूठी उम्मीदों से भी लोकप्रियता आती है. कई बार उन्मादी और जुनूनी किस्म के भाषणों से भी लोकप्रियता आती है. हिटलर और मुसोलिनी भी बहुत लोकप्रिय थे, लेकिन वे जर्मनी और इटली के लोगों का मन समझते थे- यह बात निश्चयपूर्वक नहीं कही जा सकती. बेशक, उन्होंने लोगों का मन बदलने की कोशिश की- उनमें नाज़ीवाद और फासीवाद का ज़हर डाला. 

गांधी और मोदी की तुलना पर लौटें. प्रधानमंत्री मोदी इस लिहाज से गांधी के मुकाबले कहीं ज़्यादा भाग्यशाली रहे कि अपने निर्णाायक लम्हों में वे कभी अकेले नहीं रहे. उनके पीछे हमेशा विशाल बहुमत का बल रहा, बहुत बड़ी तादाद में लोगों के समर्थन की ताक़त रही. लेकिन मोदी ने क्या जनता का मन समझते हुए फ़ैसले किए? आधी रात को अचानक नोटबंदी की उनकी घोषणा से किस जनता को फायदा हुआ? क्या मोदी उस जनता का मन समझ पाए थे जो उनके अचानक घोषित लॉकडाउन के बाद बिल्कुल सडक पर आ गई? लॉकडाउन के बाद अपने गांवों को लौटने को बेबस उन लाखों परिवारों की कहानी याद कर अब भी दिल में हूक पैदा होती है? आख़िर मोदी फ़ैसले थोपते नज़र क्यों आते हैं? वे जनता के मन की थाह लेने की कोशिश क्यों नहीं करते? तीन कृषि कानून उन्होंने लागू कर दिए जिनके ख़िलाफ़ महीनों आंदोलन चला. उत्तर प्रदेश के चुनावों से पहले उन्होंने ये क़ानून वापस लेने की घोषणा करते हुए कहा कि शायद उनकी तपस्या में कोई कमी रह गई होगी. लेकिन यह नहीं बताया कि उन्होंने लोगों का दिल जीतने या मन समझने के लिए कौन सी तपस्या की थी. बल्कि तीनों कृषि कानूनों की वापसी के अलावा किसानों का आंदोलन ख़त्म करने के लिए जो वादे उन्होंने किए थे, उन पर अब तक अमल नहीं किया.

दूसरी तरफ़ गांधी को देखें. अपने आख़िरी दिनों में वे विकट अकेलापन झेल रहे थे. इस बहुत मार्मिक तथ्य को सुधीर चंद्र की किताब 'गांधी एक असंभव संभावना' बड़े करीने से रखती है. अक्सर पूछा जाता था कि अपनी लाश पर देश का विभाजन होने की बात कहने वाले गांधी ने बंटवारे के ख़िलाफ़ आमरण अनशन क्यों नहीं किया. गांधी ने इसका जवाब अपनी प्रार्थना सभाओं में बड़े कारुणिक ढंग से दिया है. उनका कहना था कि वे लोगों पर अपना आदेश या अपनी इच्छा थोपने के लिए अनशन नहीं करते थे, बल्कि इसलिए करते थे कि उन्हें लगता था कि लोग उनके साथ हैं. उन्होंने कहा, “जब मैंने कहा था कि हिंदुस्तान के दो भाग नहीं करने चाहिए तो उस वक्त मुझे विश्वास था कि आम जनता की राय मेरे पक्ष में है; लेकिन जब आम राय मेरे साथ न हो तो क्या मुझे अपनी राय जबरदस्ती लोगों के गले मढ़नी चाहिए?' 

यह अकेला पड़ा गांधी है- अपने सपनों के ख़िलाफ़, अपनी प्रतिज्ञाओं को व्यर्थ जाता देख कुछ उदास, लेकिन फिर भी मनुष्यता और शांति के लिए युद्धरत. देश आज़ादी का जश्न मना रहा है और वे कोलकाता में हैं. वे अकेले वहां शांति कायम करने में कामयाब होते हैं और आख़िरी वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन को कहना पड़ता है कि पंजाब में जो काम हमारी 55000 की फ़ौज नहीं कर पाई, वह बंगाल में अकेले गांधी ने- 'वन मैन आर्मी' ने कर दिखाया.

गांधी से मोदी की तुलना हास्यास्पद ही नहीं, गांधी के लिए अपमानजनक भी है. गांधी लगातार जैसे कम से कम साधनों में काम चलाना चाहते हैं. सादगी उनके लिए बड़ा मूल्य है. वे जब गोलमेज सम्मेलन के दौरान सम्राट की दावत में बुलावे पर जाते हैं तो अपने जाने-पहचाने न्यूनतम कपड़ों में जाते हैं. निकलने के बाद पत्रकार उनसे पूछते हैं- क्या आपको नहीं लगता कि आपने कुछ कम कपड़े पहन रखे हैं?' गांधी का जवाब है- मेरे हिस्से के कपड़े भी सम्राट ने पहन रखे थे. यह है गांधी का चुभता हुआ हास्यबोध. मोदी जब बराक ओबामा से मिलते हैं तो बंद गले का ऐसा सूट पहनते हैं जिस पर  हर जगह उनका नाम सिला हुआ है- उसकीअनुमानित क़ीमत दस लाख रुपये ठहरती है.

 गांधीके भीतर पश्चाताप एक बड़ा मूल्य है. वे हर चीज़ को पछतावे से जोड़ते हैं-आत्मशुद्धि के यज्ञ से. वे चौरीचौरा में 22 पुलिसकर्मियों को थाने में जला दिए जाने से ऐसे आहत होते हैं कि अपना असहयोग आंदोलन वापस ले लेते हैं. मोदी से पूछा जाता है कि गुजरात दंगों पर अफ़सोस हुआ? तो उनका जवाब होता हैकि अगर कुत्ते का पिल्ला भी टायर के नीचे आ जाए तो दुख होता है. तो यहउनके अफ़सोस का स्तर है.

दरअसल यह तुलना ही बेमानी है. बल्कि इस तुलना में एक बात बहुत दिल तोड़ने वाली है. इतिहासकार सुधीरचंद्र बताते हैं कि जीवन भर गांधी को दूर से देखने वाले अमेरिकी पत्रकार विन्सेंट शीन ने अचानक उनके आख़िरी दिनों में अपने ब्रिटिश दोस्त को फोन किया- उन्हें गांधी से मिलना है. दोस्त ने अचानक इस उत्सुकता की वजह पूछी. विंशेंट सीन ने कहा, गांधी मरने वाले हैं. दोस्त ने हैरानी से पूछा, वह ऐसा कैसे कह सकता है? शीन ने कहा, ये गांधी का सुकरात वाला लम्हा है. सुधीरचंद्र बताते हैं कि शीन ने अपनी डायरी में कुछ दिन पहले ही लिखा था- गांधी को मारने वाला कोई हिंदू होगा. 

जिस हिंदू उन्माद ने गांधी की हत्या की, उसके कई रूप आज हमारे सामने हैं. गांधी की हत्या की साज़िश में सावरकर की शिरकत अब कोई राज़ नहीं है. प्रधानमंत्री के नेतृत्व में उनकी पार्टी और सरकार ने इस उन्माद को बढ़ाने का ही काम किया है. तो जिस विचारधारा की वजह से गांधी जान गई, वही इन दिनों अपने यहां तरह-तरह के गांधी बना रही है. यह गांधी के अवमूवल्यन की वही कोशिश है जो बार-बार की जाती है और नाकाम रह जाती है.

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प्रियदर्शन NDTV इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं...
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) :इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.