अब एक और हिंदी दिवस आ गया! 

दिलचस्प यह है कि एक तरफ़ हिंदी के मसाले में रेत की यह मिलावट जारी है और दूसरी ओर शुद्धतावाद और पवित्रतावाद का प्रपंच भी चल रहा है.

अब एक और हिंदी दिवस आ गया! 

हिंदी दिवस को लेकर प्रियदर्शन का ब्लॉग

नई दिल्ली:

एक हिंदी दिवस हम 14 सितंबर को मनाया करते हैं. और इसे मनाते हुए हर साल कहते हैं कि हिंदी दिवस मनाने की ज़रूरत क्या है. अब 10 जनवरी का एक नया अंतरराष्ट्रीय हिंदी दिवस सामने आ गया है. इसमें शक नहीं कि हिंदी को लेकर एक जश्न का माहौल है. इस देश के प्रधानमंत्री हिंदी बोलते हैं, दूसरे बड़े नेता हिंदी बोलते हैं, सबसे बड़े उद्योगपति हिंदी बोलते हैं. हिंदी के लेखक को बुकर मिल रहा है. हिंदी में दुनिया भर की फ़िल्में डब हो कर आ रही हैं. तमाम वेबसाइट्स और बड़ी कंपनियां अब हिंदी में भी कामकाज कर रही हैं. इंटरनेट पर हिंदी का बाज़ार बड़ा हो रहा है. हिंदी में लगातार अनुवाद हो रहे हैं. हिंदी की किताबों के भी अंग्रेज़ी में अनुवाद हो रहे हैं. हिंदी में पुरस्कारों की बाढ़ है. लोगों की एक किताब छपती है, उन्हें एक से ज़्यादा पुरस्कार मिल जाते हैं. अंग्रेजी के अलावा हिंदी और चीनी को आगे बढ़ती हुई भाषा बताया जा रहा है. तो जश्न और गर्व की बात यह है कि दुनिया हिंदी की धमक महसूस कर रही है, उसकी ताक़त को स्वीकार कर रही है.   

लेकिन इस गर्व और धमक के बीच भी मेरी तरह के लोगों की मनहूसियत जाती नहीं. उनके पास कुछ धुंधले संदेह और सवाल रह जाते हैं जो इस चमक-दमक के साथ फैलती भाषा पर मदमाते लोगों को कुछ खिन्न कर सकते हैं.  

मसलन, यह समझने की बात है कि एक भाषा क्या करती है? क्या वह हथियार होती है जिससे दुनिया को जीता जाए? क्या वह ताक़त का उपकरण होती है जिसके आधार पर शासन किया जाए? क्या वह बस कविता-कहानी या साहित्य लिखने का ज़रिया होती है?  

भाषा दरअसल बहुत सारे काम करती है. हिंदी ने इन पंक्तियों के लेखक को बनाया है. इस भाषा ने मुझे रोज़गार ही नहीं दिया, कुछ आधा-अधूरा ही सही, रचने का सुख ही नहीं दिया, इसने मुझे रचा है. इसकी जातीय स्मृति ने मुझे सींचा है. मेरी भाषा में मेरे पुरखे बोलते रहे हैं. इसने बहुत सारी बोलियों और भाषाओं का रस ग्रहण किया है और अपना एक रूप विकसित किया है. 

लेकिन आज की जो हिंदी अपने फैलाव के लिए गुमान करती है, वह इस जातीय स्मृति से लगातार दूर हुई जा रही है. वह एक स्मृतिविपन्न हिंदी है जो मीडिया में इस्तेमाल की जा रही है. हालांकि हिंदी का व्याकरण उदार रहा है और उसने विदेशज शब्दों को मान्यता देकर बहुत सारी दूसरी भाषाओं के शब्दों को जस के तस अंगीकार किया है, लेकिन हाल के दिनों में हिंदी का बिल्कुल तमाशा बनाया जा चुका है. हिंदी को आसान और हल्का बनाने के नाम पर उसमें अंग्रेजी शब्दों की फूहड़ घुसपैठ डरावने स्तर तक पहुंच चुकी है. टीवी चैनलों पर अब ‘बचाव अभियान' नहीं चलता, ‘रेस्क्यू ऑपरेशन' चलता है, दुर्घटना या हादसे को ‘क्रैश' लिखा जाता है, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री पीएम और सीएम हो चुके हैं और इन्हें देवनागरी में नहीं, धड़ल्ले से रोमन लिपि में चलाया जाता है, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट हो चुके हैं- कुल मिलाकर ऐसे शब्दों की भरमार है जिसमें हिंदी के प्रचलित शब्दों को अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्द विस्थापित कर रहे हैं.  

दिलचस्प यह है कि एक तरफ़ हिंदी के मसाले में रेत की यह मिलावट जारी है और दूसरी ओर शुद्धतावाद और पवित्रतावाद का प्रपंच भी चल रहा है. बीते दिनों न्यूयॉर्क से दिल्ली आ रहे एयर इंडिया के विमान में एक वाहियात घटना घटी. एक शख़्स ने शराब के नशे में एक महिला पर पेशाब कर दिया. यह मूत्र विसर्जन हिंदी न्यूज़ चैनलों पर भारी पड़ा. उनको लग रहा था कि इतना गलीज शब्द वे कैसे लिखें. तो उन्होंने हिंदी में ‘यूरीनेट किया' या ‘यूरिनेटर' जैसे शब्दों से काम चलाने की कोशिश की. यह अलग बात है कि जल्द ही उन्हें एहसास हो गया कि उनकी यह अनुवादाश्रित भाषा उनके आशयों के लिए अधूरी पड़ रही है तो मजबूरी में उन्होंने हिंदी का सहारा लिया.  

लेकिन यह अंग्रेज़ी शब्दों को जस के तस हिंदी में लिखने की दयनीयता भर का मामला नहीं है, यह अपनी भाषा में भरोसा खो देने का परिणाम भी है. हमारे बीच भाषा के बीहड़ प्रयोगकर्ता नहीं बचे हैं, वे नए शब्द गढ़ने में असमर्थ हैं, इसलिए वे अंग्रेज़ी शब्दों को ज्यों का त्यों इस्तेमाल करने के पक्षधर हैं. धीरे-धीरे हमारे जन माध्यमों पर अंग्रेज़ी की शब्दावली ही नहीं, उसकी वाक्य-संरचना तक हावी होती जा रही है. बस कुछ शब्दों और क्रिया पदों की वजह से हम इसे हिंदी मान लेते हैं.  

वैसे हिंदी के इस शुद्धतावाद का एक और दिलचस्प पहलू है. बहुत सारे लोग शुद्ध हिंदी से उर्दू के- यानी अरबी-फ़ारसी मूल के- शब्दों को बाहर करने के हिमायती हो गए हैं. उन्हें लगता है कि हिंदी को सिर्फ़ तत्सम शब्दों के सहारे चलना चाहिए. उनके हिसाब से संस्कृत माता है और हिंदी उसकी पुत्री है- इस पुत्री का सौंदर्य अछूता रहे, इसलिए आवश्यक है कि वह संस्कृत शब्दों से शक्ति ग्रहण करती रहे. लेकिन संस्कृत और हिंदी के बीच कई भाषाओं की पीढ़ियां गुजरी हैं- प्राकृत, पाली, अवधी, ब्रज और दूसरी लोकभाषाएं हैं, उर्दू का स्पर्श है- इसे वे भूल जाते हैं. बल्कि हिंदी और उर्दू के बीच का रिश्ता तो इतना अन्योन्याश्रित है कि एक को दूसरे से काटते ही दोनों बेजान होती मालूम पड़ती हैं.  

मगर मामला कुछ शब्दों के लेनदेन या इस्तेमाल भर का नहीं है, एक समाज की भाषा के रूप में हमारी हिंदी किस तरह बची है? मुख्यधारा की हिंदी अपने चरित्र में लगातार सांप्रदायिक होती भाषा है, उसमें उच्चवर्णीय अहंकार भी बोलता है. वह अंग्रेज़ी से डरती है और अंग्रेज़ी जैसी होने की कोशिश करती है. उसमें कला-साहित्य या संस्कृति के प्रति संवेदना बची नहीं दिखती. हिंदी के अख़बार हों या टीवी चैनल- सब विचारविहीन पत्रकारिता में लीन दिखाई पड़ते हैं. सनसनी इस पत्रकारिता का मूल तत्व हो चुकी है और जो सरोकार का दिखावा करते हैं, उनका सतहीपन भी छुपा नहीं रह पाता. सबसे बड़ी बात है कि इस हिंदी को ज्ञान के सारे स्रोत अंग्रेज़ी से मिलते हैं. इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, आधुनिक विज्ञान सबकुछ अंग्रेज़ी की मार्फत हिंदी तक आ रहा है. पूरा का पूरा मध्यवर्ग अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में भेज रहा है. वह अंग्रेजी किताबें खरीदता और पढ़ता है. 50 करोड़ की भाषा होने का दम भरने वाली हिंदी की साहित्यिक किताबें तीन सौ और पांच सौ छप कर रह जाती हैं. जिन किताबों को बेस्टसेलर बताया जाता है, वे भी कुछ हज़ार से ज्यादा नहीं बिक पातीं.  

बेशक, इस मुख्यधारा की हिंदी के बाहर भी हिंदी के कई प्रकार हैं. निश्चय ही साहित्य और संस्कृति की दुनिया की एक हिंदी है जो समृद्ध भी है और संवेदनशील भी. इसमें वैश्विक स्तर की कविता लिखी जा रही है और बहुत महत्वपूर्ण रचनाएं हो रही हैं. इस हिंदी पर कई बार गर्व भी होता है. इसके अलावा हिंदी हाशिए की कई आवाज़ों के भी काम आ रही है. दलित और आदिवासी समाजों की जो पहली पीढ़ी स्कूल-कॉलेज गई, वह अब अपना दर्द हिंदी में ही लिख रही है. यह हिंदी अपने चरित्र में बाज़ार-विरोधी भी है, सांप्रदायिकता विरोधी भी, वह प्रगतिशील और समन्वयवादी है. लेकिन यह हिंदी एक अल्पसंख्यक सी हिंदी है. 

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तो जो जश्न मनाया जा रहा है, वह हिंदी के विस्तार का है, हिंदी की गहराई का नहीं. इसके विस्तार पर वे लोग निसार हैं जो एक ताकतवर भारत के सपने को ताकतवर हिंदी से जोड़ते हैं और यह समझ नहीं पाते कि ताक़त और मज़बूती में अंतर होता है. एक मज़बूत देश, भाषा और समाज होने की बहुत सारी अंदरूनी शर्तें होती हैं जिन पर हमें खरा उतरना होगा. जहां तक हिंदी का सवाल है, वह मनोरंजन की बोली की तरह फैल रही है, ज्ञान की भाषा की तरह नहीं. उसका वास्तविक विस्तार होगा तो राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय हिंदी दिवस बेमानी होते चले जाएंगे.

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