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This Article is From Apr 22, 2014

चुनाव डायरी : 'वोट से ज्यादा जरूरी है पेट'

चुनाव डायरी : 'वोट से ज्यादा जरूरी है पेट'
नई दिल्ली/पटना:

सुबह के पौने सात बजे। बिहार का मधुबनी रेलवे स्टेशन। सैंकड़ों मुसाफिर सरयू यमुना एक्सप्रेस के इंतजार में हैं। इसे शहीद एक्सप्रेस भी कहते हैं। यह ट्रेन बिहार, नेपाल की सरहद पर स्थित जयनगर से पंजाब के अमृतसर तक जाती है, रास्ता दरभंगा, समस्तीपुर, हाजीपुर का लेती है। बिहार के उत्तरी इलाके से दूसरे राज्यों में जाकर काम करने वालों के लिए यह अहम ट्रेन है।

ट्रेन आती है। उतरने और चढ़ने वाले मुसाफिरों के बीच धक्का-मुक्की के बीच हम भी एक बॉगी में सवार होते हैं। ट्रेन चलने के साथ ही हमारी बातचीत भी शुरू होती है। एक नौजवान बताता है कि वह दिल्ली में सिलाई का काम करता है। पिछले 5 साल से। घर आया था वापस काम पर जा रहा है। घर-परिवार से दूर रहना अच्छा नहीं लगता, लेकिन यहां कोई काम भी तो नहीं। बगल में खड़े एक अधेड़ बोल पड़ते हैं। यहां गेंहू काटनी का काम चल रहा था। 16 बोझा काटते थे तो एक बोझा मिलता था। फसल अच्छी हुई तो एक बोझे में डेढ़-दो किलो गेंहू निकलता है। 16 बोझा काटने में परिवार के चारों सदस्य को लगना पड़ता है। बूढ़े मां-बाप और पत्नी। मेहनताने में सिर्फ दो किलो गेंहू से परिवार का भरण-पोषण मुश्किल है। लिहाजा पंजाब जा रहे हैं। दिनभर के काम में 500 से 600 रुपये नकदी की कमाई होती है। इसलिए चाहे मौसम दलहन का हो, तेलहन का, धान का या गेंहू का, खेतिहर मजदूरों की मंजिल पंजाब-हरियाणा होता है। इनसे हमने पूछ लिया कि 30 अप्रैल को मधुबनी में वोट पड़ना है। वोट डालकर जाते। झन्नाटेदार जवाब मिला। 'सर वोट से ज़रूरी पेट है, पेट देखें कि वोट देखें!' इससे ज़्यादा न तो पूछने की हिम्मत हुई और ना ही नसीहत देने की। ऐसे नसीहतों के पोस्टर-प्रचार सामग्री से शहर कस्बा देहात पटा पड़ा है। वोट की अहमियत ये भी जानते होंगे। लेकिन जो इन्होंने कहा, उसका जवाब सरकार ही दे सकती है।

सामने अब छात्र है। मंगरौनी गांव का है, लेकिन पटना में पढ़ता है। बोला वोट डालने आएंगे। पूछ लिया किसको। बोला नीतीश को तो नहीं ही देंगे। क्यों। जवाब मिला क्या किया। शिक्षा व्यवस्था है नहीं। बिहार से दिल्ली जाना पड़ा है। कई साथी दिल्ली चले गए। पैसे की तंगी है फिर भी जूझ रहे हैं। कुछ न कुछ कर लेंगे। बिहार में ही शिक्षा व्यवस्था ठीक होती तो ऐसे दूर नहीं जाना पड़ता।

परिवार के साथ सफर कर रहे एक सज्जन ने कहा, नीतीश ने बहुत कुछ किया है। सड़कें बनाई हैं। बिजली की हालत सुधारी है। तभी एक ने टोका। हां, सही कह रहे हैं। सड़क बनने से यह फायदा तो हुआ है कि समय से स्टेशन पहुंच जाते हैं। ट्रेन छूटती नहीं। पहले तो सड़क पर बस कब ब्रेकडाउन कर जाए पता नहीं। इस टोका-टोकी में कटाक्ष था। सज्जन समझ गए। बगल में खड़े एक और नवयुवक बोला। सड़क बिजली तो ठीक है। कल कारखाना कहां है। नौकरी कहां है। जाना तो बाहर ही है न, अगर ठीक-ठाक कमाना है तो?

बात लालू की चली तो एक ने कहा, लालू जो किए भुगत लिए और भुगत रहे हैं। ये तो जातिवाद है, जिसके चलते वे वापस आने की गुंजाइश में हैं। ऐसा गढ्ढा खोदे थे कि दलदल बन गया था। नीतीश ने थोड़ा भरा है। पता नहीं क्या जरूरत थी उनको बीजेपी से अलग होने की। अब ये भी भुगतेंगे। हम तो मोदी को ही वोट देंगे।

पूछा मोदी ऐसा क्या करेंगे? जवाब मिला वही करेंगे तो गुजरात में किया। गुजरात में क्या किया? जवाब मिला और कुछ किया हो न किया हो गुजरात का हाल ऐसा तो नहीं किया कि गुजराती बिहार में आकर काम ढूंढें।

इस ट्रेन में एक पूरा गांव, पूरा समाज चल रहा था। जितनी मुंह उतनी बातें। एक ने तो लालू को याद किया यह कहकर कि वे रेलमंत्री थे तो किराया कम किया था। बाहर जाकर कमाने वाले को इससे फायदा था। अब तो किराया हर महीने दो महीने पर बढ़ रहा है। हम को तो लालू ही चाहिए।

बातचीत और लंबी चल सकती थी। लेकिन हमें सकरी स्टेशन पर उतरना था। विकास के बिहार मॉडल को समझना है तो बिहार से चलने वाली किसी ट्रेन में सफर कीजिए। एक्सपर्ट्स के कमेंट्स की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

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