विज्ञापन
This Article is From Apr 25, 2014

चुनाव डायरी : ध्रुवीकरण के धुरंधर

चुनाव डायरी : ध्रुवीकरण के धुरंधर
नई दिल्ली:

मुसलमान एक तरफ जाएगा तो उसके खिलाफ हिन्दू दूसरी तरफ जाएगा। इससे मिलता-जुलता विश्लेषण आप टीवी पर खूब सुनते होंगे। मतदान की आती तस्वीरों के साथ टीवी स्टूडियो में बैठे जानकार किस आधार पर यह बात कह रहे होते हैं, समझना मुश्किल है। हमारी राजनीति में धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण एक तथ्य है, मगर यह मिथक भी है। ध्रुवीकरण सतही और सामान्य व्याख्या का ऐसा औज़ार हो गया है, जिसके सहारे जानकार एक मतदाता को साम्प्रदायिक रंग से पेंट कर देते हैं। इसी के साथ एक और मिथक की रचना करने लगते हैं - 'टैक्टिकल वोटिंग' का मिथक।

एक साइड मुसलमान तो दूसरी साइड हिन्दू। ऐसा लगता है कि स्टूडियो में बैठे जानकार एक खास समुदाय की तरफ इशारा कर रहे हैं कि मुसलमान एकजुट हो रहे हैं। भाजपा के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं, लिहाज़ा स्वाभाविक रूप से हिन्दुओं को भी भाजपा के पक्ष में एकजुट हो जाना चाहिए। अख़बारों में भी ऐसी बातें खूब लिखी जा रही हैं। कई बार लगता है कि एक रणनीति के तहत ऐसा किया जा रहा है। मतदान प्रक्रिया का एक अदना-सा एक्सपर्ट भी जान सकता है कि कुछेक अपवादों को छोड़ सामान्य रूप से यह बात सही नहीं है। कई बार लगता है कि चुनाव के समय ऐसे विश्लेषणों के सहारे समाज में साम्प्रदायिकता को भड़काने का काम किया जाता है।

क्या हिन्दू हमेशा यह देखकर वोट देता है कि मुसलमान किस तरफ वोट दे रहा है या मुसलमान यह देखकर वोट देता है कि हिन्दू किस तरफ देता है। इसका वैज्ञानिक आधार क्या है। हर चुनाव में मुस्लिम मतदाता को ब्रांड करने का खेल खेला जाता है। जैसे उसकी अपनी कोई आकांक्षा नहीं है और वह सिर्फ मुसलमान बनकर वोट करता है। अगर ऐसा होता तो यह बात सही होती कि एक आम मुस्लिम मतदाता इमाम बुखारी जैसे धर्मगुरुओं के कहने पर ही वोट कर देता। किसी भी चुनाव का आंकड़ा देखेंगे तो यह गलत साबित होता है। आम मुस्लिम मतदाता बड़े आराम से मतदान के फैसले में मुल्ला-मौलवियों की दखलअंदाज़ी को पसंद नहीं करता। खुलकर बोलता भी है, लेकिन मीडिया ऐसे धर्मगुरुओं के बहाने मुस्लिम मतदाताओं का संप्रदायीकरण करता रहता है।

इसी संदर्भ में एक और बात कहना चाहता हूं। बाबा रामदेव जैसे कई योगगुरु और धर्मगुरु भी तो किसी पार्टी के लिए वोट मांगते हैं। इमाम बुखारी का अपील करना साम्प्रदायिक और बाबा रामदेव या शंकराचार्य का अपील करना राष्ट्रभक्ति। कैसे? मैं दोनों की तुलना नहीं कर रहा, लेकिन मूल बात यह है कि सभी प्रकार के मज़हबी नेता चुनाव के वक्त सक्रिय होते हैं। कोई आशीर्वाद के नाम पर इनके पास जाता है तो कोई अपने भाषणों में देवी-देवताओं के प्रतीकों का इस्तमाल करके धर्म का इस्तमाल करता है। खुद को ईश्वर का दूत बताना क्या है।

आम मतदाता को इससे सचेत होने की ज़रूरत है। यह भी ध्यान में रखने की बात है कि हमारे तमाम धर्मों के गुरुओं का समाज से गहरा नाता होता है। झट से उनके किसी राजनीतिक आचरण को साम्प्रदायिक क़रार देने से पहले देखना चाहिए कि वे क्यों ऐसा कर रहे हैं। उनका आधार सांप्रदायिक है, धार्मिक है या राजनीतिक। अगर विरोध करना है तो एक साथ डेरों, मठों, मस्जिदों की राजनीतिक दखलअंदाज़ी का विरोध कीजिए।

मैं फिर से लौटता हूं, अपनी मूल बात पर। तमाम अध्ययन बताते हैं कि मुस्लिम मतदाता अपनी पसंद के हिसाब से अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टी और नेता को वोट करता है। मुसलमान एक नहीं, कई दलों को वोट करने के साथ-साथ बीजेपी को भी वोट करता है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में भी करता है। हो सकता है कि प्रतिशत के लिहाज़ से कम हो, लेकिन आप यह भी तो देखिए कि बीजेपी ने इन राज्यों में लोकसभा के चुनावी मैदान में कितने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। उत्तर प्रदेश में कितने उतारे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 25-26 प्रतिशत मत मिले थे, शेष और 75 फीसदी मत अन्य दलों को। अगर हिन्दू वोट जैसा कुछ होता तो बीजेपी को 75 फीसदी वोट मिलते। हमारे ये जानकार हिन्दू मतदाताओं के विवेक के साथ भी अन्याय करते हैं। मतदाताओं का अति हिन्दूकरण कर साम्प्रदायिक रंग देते हैं।

चलिए, इस बात को एक और तरीके से देखते हैं। हर समुदाय या जाति के लोग अपने उम्मीदवारों को वोट देते हैं। इसी आधार पर कांग्रेस, बीजेपी सब अपने उम्मीदवार तय करते हैं। तब भी बीजेपी को हराने के लिए मुसलमान किसी मुसलमान उम्मीदवार को वोट नहीं करता है। वह उसी दल या उम्मीदवार को वोट करेगा, जिसके पास पर्याप्त वोट हों। यह वोट कहां से आता है। कथित रूप से हिन्दू समाज से ही न, तो यह बात कैसे उचित ठहराई जा सकती है कि हिन्दू एक तरफ जाते हैं और मुस्लिम दूसरी तरफ। कायदे से तो एक-दूसरे की पार्टी को हराने के लिए दोनों मिल-जुलकर एक-दूसरे के खिलाफ गोलबंद होते हैं। इसके बाद भी सारे मुसलमान किसी एक व्यक्ति या दल को वोट नहीं करेंगे।

मुसलमानों को कथित रूप से बीजेपी के खिलाफ पेश किए जाने के बाद भी जानकार जानते हैं कि वे कहीं भी एकमुश्त वोटिंग नहीं करते। यह संभव भी नहीं है। ऐसा होने लगा तो समझिए कि मुस्लिम समाज के भीतर आपसी टकराव ही समाप्त हो जाएं। आप भी जानते हैं कि मुसलमानों के बीच अगड़े-पिछड़े और दलित मुसलमानों के हक को लेकर ज़बरदस्त टकराव है। पिछले दिनों कई राज्यों - जैसे उत्तर प्रदेश, केरल और असम, में मुस्लिम दलों का उदय हुआ है, और क्या ये सभी बीजेपी के खिलाफ उभरे हैं? नहीं। इनसे चुनौती कांग्रेस, सपा, बसपा, लेफ्ट को भी मिलती है।

इसीलिए जानकारों को ध्रुवीकरण की बेहद सतही और खतरनाक व्याख्या से बचना चाहिए। बनारस में नरेंद्र मोदी जब अपने नामांकन के लिए जा रहे थे तो उस भीड़ में भी कैमरे मुसलमान ढूंढ रहे थे। उनका क्लोज़ अप दिखा रहे थे। मुझे इस बात से आपत्ति है। क्या कैमरे उस भीड़ में शामिल अन्य लोगों को भी उसी निगाह से देख रहे थे। अगर नहीं तो फिर एक या दो मुसलमान की तलाश क्यों हो रही थी। तब भी, जब नरेंद्र मोदी के साथ मुख़्तार अब्बास नकवी नज़र आ रहे थे। बीजेपी भले हिन्दुत्व या संघ के कहने पर चले, पर उसे मिलने वाला हर वोट इसके लिए नहीं मिलता। बीजेपी के कार्यकर्ता चाहें जितना हिन्दुत्व के रंग-रूप में ढलकर आक्रामक हो जाएं, उनकी पार्टी को मिलने वाला हर वोट हिन्दू वोट नहीं है। ज़्यादातर दलित मतदाताओं को खुद को इस पहचान से जोड़कर देखे जाने से आपत्ति हो सकती है, जबकि हो सकता है कि वे वोट बीजेपी को दें।

हमें जनमत का संप्रदायीकरण नहीं करना चाहिए। सांप्रदायिकता और ध्रुवीकरण हमारी राजनीति की ख़तरनाक सच्चाई है, लेकिन ऐसा हर जगह किसी एक फार्मूले के तहत नहीं होता कि मुसलमान इधर गए तो हिन्दू उधर चले जाएंगे। कई बार लगता है कि जानकार मुस्लिम मतदाताओं का मज़हबी चरित्र चित्रण करते हुए गैर-मुस्लिम मतदाताओं को इशारा कर रहे होते हैं कि उन्हें वोट कहां देना चाहिए।

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
रवीश कुमार, रवीश की कलम से, मुस्लिम वोटर, वोटों का ध्रुवीकरण, लोकसभा चुनाव 2014, आम चुनाव 2014, Ravish Kumar, Lok Sabha Polls 2014, General Elections 2014, Muslim Voters