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संजय किशोर

सोच को साझा करने का शौक रहा है. सोच को शब्दों का पंख मिला और फिर परवाज़. क्षितिज की तलाश भारतीय जन संचार संस्थान तक ले आयी. सोच जब विचारों से टकराया तो शब्द और सपने को नई धार मिली. इलेक्ट्रॉनिकिस मीडिया की शुरुआती उड़ान में सीट मिल गई. सोच की छटपटाहट को खेल सीमित नहीं कर पाया. लिहाज़ा लिखता हूं...

  • आईपीएल की 2 नई टीमें तय हो गयी हैं. अगले साल से Indian Premier League में अब 10 टीमें खेलेंगी. संजीव गोयनका की RPSG group ने लखनऊ की टीम ख़रीदी है. इसके लिए ग्रुप ने 7090 करोड़ की बोली लगायी. जबकि दूसरी टीम अहमदाबाद को विदेशी फ़र्म CVC Capitals ने 5625 करोड़ में ख़रीदा है.
  • कौन बनेगा T20 टीम का कप्तान? किसे सौंपनी चाहिए T20 टीम की बागडोर? कौन है सबसे क़ाबिल? क्या सीमित ओवर्स टीम का कप्तान किसी एक खिलाड़ी को नहीं बनाना चाहिए? क्या विराट कोहली से वनडे की भी कप्तानी नहीं ले लेनी चाहिए? सवाल कई हैं जिस पर इन दिनों से चर्चा गर्म है?
  • 18 साल बाद कीवी टीम पाकिस्तान आयी थी. रावलपिंडी में 3 वनडे के बाद लाहौर में 5 T20 खेले जाने थे. आज से सीरीज़ का आग़ाज़ होने जा रहा था.
  • एक दिन पहले ही मैंने ब्लॉग में लिखा था “दबाव में तो हैं कोहली”. उसके 24 घंटे के अंदर कोहली ने T20 टीम की कप्तानी छोड़ने का एलान कर दिया. आईसीसी T20 वर्ल्ड कप के बाद कोहली क्रिकेट के सबसे छोटे फ़ॉर्मेट की कमान छोड़ देंगे. टेस्ट और वनडे में वे कप्तान बने रहेंगे.
  • दबाव में तो हैं भारतीय कप्तान विराट कोहली. ख़ासकर मुख्य कोच रवि शास्त्री के बुक लॉन्च में शामिल होने के बाद उन पर 'बायो बबल ब्रीच' करने का आरोप लगा. इंग्लिश मीडिया और पूर्व इंग्लिश खिलाड़ी पांचवे टेस्ट के रद्द होने के लिए उन्हें सीधे तौर पर ज़िम्मेदार मान रहे हैं.
  • बवाल काटने के लिए ट्रोलर को ‘तूफ़ान’ देखनी पड़ेगी. खेल में दिलचस्पी रखने वालों को भी ‘तूफ़ान’ देखनी चाहिए. ये फ़िल्म खिलाड़ियों और ख़ासतौर पर मुक्केबाज़ों के लिए है. कइयों को लगेगा कि ये उनकी ही कहानी है. कई बार भटकने के बावजूद फ़िल्म आपको सच्चाई के क़रीब ले जाती है.
  • हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को देश वो सम्मान आज भी नहीं दे पाया है जो दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह एडॉल्फ़ हिटलर तक के प्रस्ताव को ठुकरा आया था.
  • 2007 में टीम इंडिया की कप्तानी मिलने के बाद धोनी ने कहा था कि कप्तानी मिलना किसी परीकथा से कम नहीं है. 2004 में करियर की शुरुआत करने के 16 साल बाद जब वह क्रिकेट को अलविदा कह रहे हैं, तो सचमुच उनकी कामयाबी चमत्कार लगती है. प्रेरणादायक भी है और उनकी कहानी में कभी उम्मीद नहीं छोड़ने की सीख भी है.
  • आपने भी वो वीडियो या तस्वीर देखी होगी. कैसे एक मां तपती धूप में गर्म सड़क पर ट्रॉली खींचती चली जा रही है और भूख-प्यास से थक कर उसका बेटा उसी ट्रॉली पर लटका हुआ है. पत्थर दिल भी इस ह्रदय विदारक दृश्य को देखकर पिघल जाए. मगर मेरे एक मित्र को सोते हुए बच्चे और उसकी बेहाल मां का दर्द नज़र नहीं आया. कहता है-वैसे परिस्थिति इनकी क्या है ये तो पता नहीं मगर इनका ट्रॉली बैग जरूर 6 से 8 हजार का होगा.
  • सोशल मीडिया पर वर्चुअल योद्धा सिर्फ नारा बुलंद करते हैं-“वीर तुम बढ़े चलो, हम तुम्हारे साथ हैं.” मगर आगे कोई नहीं आता. शायद इसलिए भी क्योंकि आगे बढ़कर कोई परचम थाम भी ले तो उसके पीछे कोई नहीं जाएगा. खासकर जब मामला संवेदनशील हो. पुलिस और प्रशासन से जुड़ा हुआ हो. कौन कोर्ट, कचहरी और पुलिस के पचड़ों में पड़ना चाहता है. किसके पास फ़ुर्सत है. जो सचमुच उस दर्ज़ी को अवैध क़ब्ज़े से बेदख़ल करना चाहते, वे खुद आगे बढ़कर शिकायत दर्ज करा सकते थे. अपने रसूख़ का इस्तेमाल कर उसको हटवा सकते थे. लेकिन बात वॉट्सएप से आगे न बढ़नी थी, न बढ़ी.
  • सम्पूर्ण लॉकडाउन की स्थिति में भी प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ का काम रुकता नहीं. आपदा के समय आम जन तक सूचना का सही प्रसार बेहद अहम हो जाता है. यह अलग बात है कि आज के दौर में लोकतंत्र के सभी चार खंभों की विश्वसनीयता वेंटिलेटर पर है. इनमें सबसे नाज़ुक स्थिति सूचना-तंत्र की है. आज दर्शकों और पाठकों के सामने एक बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई है. तमाम प्रश्नचिह्नों के बीच घिरे मीडिया में उन्हें अपने लिए सही ख़बर ढूंढना है. अगर आप इसमें नाकाम रहते हैं, तो ख़बरों की आड़ लेकर निहित स्वार्थ और विचारधाराएं आपके दिलोदिमाग़ में घुसकर घर बना लेती हैं. फिर आप उस विचारधारा की कठपुतली बन कर रह जाते हैं. सोचिएगा, फ़िलहाल मुझे सोच से निकलना होगा और घर से भी.
  • आप सोचेंगे कि भला दिल्ली के एक व्यापारी की 1500 किलोमीटर दूर कोलकाता में बैठी पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से क्या रंजिश हो सकती है जो उन्हें आगामी चुनाव में हारते हुए देखना चाहता है!
  • भाजपा और सहयोगी दलों के सांसदों को भी इस बार ये बात समझ लेनी चाहिए कि उन्होंने नरेंद्र दामोदर दास मोदी को प्रधानमंत्री नहीं बनाया, मोदी ने उन्हें संसद तक पहुंचाया है. अमेठी के आसमान में सुराख स्मृति ईरानी ने नहीं किया है.
  • आज सोलह साल हो गए. जीवन में मज़दूर दिवस एक ख़ास तारीख़ बन गई है. डेढ़ दशक जमा एक साल के इस सफ़र में कई दफे नई तारीख़ से रुबरू हुआ. नए और लुभावने मौक़ों से तार्रुफ़ हुआ, लेकिन जिसे ज़िंदगी के बेहतरीन साल समर्पित कर दिए, उससे बेवफ़ाई करने का जी नहीं चाहा. कुछ लगाव रहा और कुछ मजबूरियां भी और साथ लंबा होता चला गया.
  • सौरव गांगुली ने आंख में आंख डालकर बात करना सिखाया तो टीम इंडिया ने जीतना भी सीखा. महेंद्र सिंह धोनी की ‘कूलनेस’ में भी आक्रामकता थी.अब विराट कोहली सीने टकरा रहे हैं. कोहली का सीना उस 56 इंच की तरह खोखला नहीं हैं जहां से सिर्फ बातें और वादे निकलते हैं. इस सीने के अंदर आग है जो सिर्फ जीत से बुझना चाहती है. कामयाबी के लिए ये आत्मविश्‍वास भी जरूरी है-'तुम एक स्टैंडिंग कप्तान हो और मैं दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़!' कोहली ने ये कहा हो या न कहा हो, बंदे में क़ुव्वत है तभी दंभ भी दिखा रहा है.
  • जब बॉल सालाह के बूट से टकराकर गोलपोस्ट के भीतर जाती है, तो लिवरपूल फुटबॉल क्लब स्टेडियम का नज़ारा कुछ ऐसा हो उठता है - पहले जश्न और शोर, फिर कुछ क्षण की खामोशी, फिर हाथ आसमान की तरफ उठता है खुदा को शुक्रिया कहने के लिए, और फिर जब वह धरती को चूमता है, तो उन लम्हों की पवित्रता के लिए ज़रूरी शांति का उसके प्रशंसक सम्मान करते हैं.
  • 'मॉर्निंग वॉक' के समय 'वॉक' कम, 'टॉक' ज़्यादा होने लगा है. पहले यह बीमारी 'काउ बेल्ट' तक सीमित थी, जहां हर चर्चा राजनीति से शुरू होकर राजनीति पर खत्म होती है. इसलिए भी, क्योंकि छोटे शहरों में भागमभाग कम है और समय ज़्यादा. फुर्सत ही फुर्सत. लिहाज़ा, चाय की चुस्की के साथ राजनीति पर बहसबाज़ी सबसे पसंदीदा शगल है.
  • अस्सी के दशक के शुरुआती साल थे. बाज़ार में VHS नया-नया आया था. आज जैसे हर गली और नुक्कड़ पर सेल-फ़ोन की दुकानें हैं. ठीक उसी तरह वीडियो पार्लर कुकुरमुत्तों की भांति मानों रातो-रात उग आए थे. धक्के खाकर बदमिजाज ब्लैकिए से महंगे टिकट खरीदने की बजाए, 10 रुपये में पूरा परिवार घर के सुकून में पूरी फ़िल्म देख रहा था. जो वीसीआर-वीडियो कैसेट्स रिकॉर्डर खरीद नहीं पाए वे भाड़े पर ले आते और 3 से 4 फ़िल्म एक ही रात में देख जाते.
  • नाम में 'किशोर' जोड़ लेने से कुदरत की अदालत से उम्र पर 'स्टे ऑर्डर' थोड़े ही मिल जाता है... ज़िन्दगी का अर्द्धशतक कुछ ही साल के फासले पर इंतज़ार कर रहा है... 'मिड-लाइफ क्राइसिस' जैसी कोई बात नहीं है, शायद इसलिए, क्योंकि बचपना बचा हुआ है.
  • 'व्हॉट अ गाई!' शतक दर शतक के बाद हीरोइन हैरान थी. जवाब में ऐतिहासिक जीत के बाद हीरो ने दुनिया के सामने एक बार फिर अपने इश्क़ का इज़हार कर दिया... “यह दौरा काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है. मैदान के बाहर के लोगों को इसका श्रेय मिलना चाहिए. मेरी पत्नी मुझे लगातार प्रेरित करती रहती है उसे भी काफी श्रेय दिया जाना चाहिए.”
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