रात के अंधेरे में जंगल की सड़क पर कोई सांप अचानक सामने आ जाता है. गश्त कर रहा वनकर्मी रुकता है, उसकी तस्वीर खींचता है, जगह दर्ज करता है और जीपीएस टैग वाली तस्वीर वैज्ञानिकों तक पहुंचा देता है. कहीं शोधकर्ताओं की टीम टॉर्च की रोशनी में जंगल की सड़कें खंगाल रही है, तो कहीं सड़क पर मारे गए सांप भी वैज्ञानिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन रहे हैं. मध्य प्रदेश में इन दिनों जिस कवायद को आम तौर पर "स्नेक सेंसस" कहा जा रहा है, वह वास्तव में सांपों की पारंपरिक गणना नहीं, बल्कि उनकी अलग-अलग प्रजातियों, मौजूदगी, संख्या के रुझान और प्राकृतिक व्यवहार को समझने का देश का एक बड़ा वैज्ञानिक प्रयास है.
मुख्यमंत्री के एक विचार से शुरू हुई वैज्ञानिक पड़ताल
इस पूरे अभियान की शुरुआत एक राजनीतिक विचार से हुई थी. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राज्य में सांपों की गणना कराने की बात कही थी. इसके पीछे बढ़ती सांप काटने की घटनाओं को लेकर चिंता थी. साथ ही यह सवाल भी उठा था कि किंग कोबरा के राज्य से गायब होने के बाद क्या दूसरी सांप प्रजातियों की संख्या बढ़ी है. मुख्यमंत्री ने किंग कोबरा को मध्य प्रदेश में दोबारा लाने की संभावना पर भी चर्चा की थी. यहीं से कई वैज्ञानिक सवाल खड़े हुए. क्या किसी राज्य में सांपों की वास्तविक संख्या गिनी जा सकती है? क्या किंग कोबरा ऐतिहासिक रूप से मध्य प्रदेश में मौजूद था? क्या उसकी अनुपस्थिति का दूसरी प्रजातियों से कोई संबंध है? और सबसे अहम, क्या सांपों की मौजूदगी और उनके व्यवहार को समझकर सांप काटने से होने वाली मौतों को कम किया जा सकता है?
पांच जंगल, पांच अलग दुनिया
देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान और मध्य प्रदेश वन विभाग मिलकर पांच संरक्षित वन क्षेत्रों में यह अध्ययन कर रहे हैं. मार्च 2026 में शुरू हुआ यह काम 2027 के अंत तक चलने की संभावना है.
कहीं घने जंगल हैं, कहीं घास के मैदान और कहीं ऊंचाई वाले नम वन क्षेत्र.कान्हा पूर्वी मध्य प्रदेश के मैकल क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है. सतपुड़ा मध्य भारत के घने जंगलों का हिस्सा है. पन्ना बुंदेलखंड के अपेक्षाकृत सूखे वन क्षेत्र में है. गांधी सागर अपने खुले घास के मैदानों और सवाना जैसे क्षेत्र के लिए जाना जाता है. वहीं अमरकंटक वह उच्चभूमि है जहां विंध्य और सतपुड़ा पर्वत मिलते हैं और जहां से नर्मदा और सोन जैसी नदियां निकलती हैं.
टॉर्च, कैमरा और रोड क्रूजिंग का खेल
करीब 15 शोधकर्ता, यानी प्रत्येक क्षेत्र में लगभग तीन, वन विभाग के कर्मचारियों के साथ काम कर रहे हैं. 100 से अधिक वनकर्मियों को भी प्रशिक्षण दिया गया है. टीमें सुबह और रात के समय सर्वे करती हैं और जंगल की सड़कों पर धीमी गति से वाहन चलाकर सांपों की गतिविधि दर्ज करती हैं. इस तकनीक को रोड क्रूजिंग कहा जाता है. वन विभाग का गश्ती अमला भी इस सर्वे का बड़ा हिस्सा बन गया है.
इस तरह जंगलों में फैला वनकर्मियों का नेटवर्क सांपों की मौजूदगी का बड़ा वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार कर रहा है.
नाम सेंसस का, लेकिन मकसद गिनती नहीं
यही वजह है कि इसे शाब्दिक अर्थ में गणना नहीं कहा जा सकता. किसी जगह सांप की तस्वीर मिलने से यह तो साबित होता है कि वह प्रजाति वहां मौजूद है, लेकिन इससे उसकी कुल संख्या पता नहीं चलती.एक ही सांप कई बार दिखाई दे सकता है, जबकि उसी इलाके में मौजूद कई दूसरे सांप कभी दिखाई ही नहीं देते. इसलिए अध्ययन का फोकस कुल संख्या पर नहीं, बल्कि यह समझने पर है कि कौन-सी प्रजाति कहां मिल रही है, उसकी स्थिति कैसी है और वह किस तरह के प्राकृतिक वातावरण में रहना पसंद करती है?
दो साल में तीन गुना बढ़ गए दर्ज मामले
यह अध्ययन ऐसे समय हो रहा है जब मध्य प्रदेश में सांप काटने के मामले गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता बने हुए हैं. एकीकृत स्वास्थ्य सूचना कार्यक्रम के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 2022 में सांप काटने के 1,208 मामले दर्ज हुए थे. 2023 में यह संख्या 1,479 और 2024 में बढ़कर 3,334 हो गई. यानी दो साल में दर्ज मामलों की संख्या लगभग तीन गुना हो गई.2023 और 2024 दोनों वर्षों में सांप काटने से 12-12 मौतें दर्ज की गईं. हालांकि मामलों की बढ़ोतरी केवल सांपों की संख्या बढ़ने का प्रमाण नहीं मानी जा सकती. बेहतर निगरानी और रिपोर्टिंग के कारण भी अधिक मामले दर्ज हुए हो सकते हैं.
मुआवजे के आंकड़े दिखाते हैं बड़ी तस्वीर
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों से अलग मुआवजा रिकॉर्ड कहीं बड़ी तस्वीर दिखाते हैं. अप्रैल 2020 से मार्च 2022 के बीच मध्य प्रदेश में सांप काटने से हुई 5,779 मौतों पर सरकारी मुआवजा दिया गया. इस अवधि में करीब 231 करोड़ रुपये प्रभावित परिवारों को दिए गए.
स्वास्थ्य निगरानी और मुआवजा रिकॉर्ड के बीच यह अंतर बताता है कि सांप काटने की वास्तविक स्थिति को समझना अपने आप में बड़ी चुनौती है.
मध्य प्रदेश में मिलती हैं करीब 50 प्रजातियां
उज्जैन स्थित सर्प अनुसंधान संगठन के मुताबिक मध्य प्रदेश में लगभग 50 प्रजातियों के सांप पाए जाते हैं. इनमें नौ जहरीली प्रजातियां शामिल हैं. इनमें भारत के चार प्रमुख जहरीले सांप भी शामिल हैं. भारतीय कोबरा, सामान्य करैत, रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर को मिलाकर "बिग फोर" कहा जाता है.
ये 16 जिले सबसे ज्यादा जोखिम वाले
सर्प अनुसंधान संगठन ने राज्य के 16 जिलों को सांप काटने के लिहाज से हॉटस्पॉट माना है. इनमें अलीराजपुर, बड़वानी, बालाघाट, बैतूल, छतरपुर, छिंदवाड़ा, दमोह, धार, झाबुआ, मंडला, पन्ना, सागर, सतना, सिवनी, कटनी और सिंगरौली शामिल हैं. यानी सर्वे ऐसे राज्य में हो रहा है जहां सवाल सिर्फ सांपों की संख्या का नहीं है. असली सवाल यह है कि जहरीली प्रजातियां कहां ज्यादा मिल रही हैं, मानव बस्तियों और खेती वाले इलाकों के साथ उनका संपर्क कहां सबसे ज्यादा है और किन जिलों में जोखिम गंभीर है.
अब सांपों पर लगेंगे रेडियो ट्रैकर
अध्ययन का अगला चरण और अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है. चयनित सांपों, विशेषकर चिकित्सकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण जहरीली प्रजातियों पर रेडियो टेलीमेट्री का इस्तेमाल करने की योजना है.इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि सांप कितना घूमता है, उसका क्षेत्र कितना बड़ा है, वह किन जगहों को पसंद करता है और बचाव के बाद दूसरी जगह छोड़े जाने पर उसका व्यवहार क्या होता है.
हर बचाए गए सांप को जंगल में छोड़ना सही नहीं
यह जानकारी सांपों के बचाव और पुनर्वास के तरीके को भी बदल सकती है. अभी अक्सर किसी घर या गांव से पकड़े गए सांप को किसी दूर जंगल में छोड़ दिया जाता है. लेकिन हर जंगल हर प्रजाति के लिए उपयुक्त नहीं होता.
गलत इलाके में छोड़ा गया सांप भोजन और आश्रय के संकट में पड़ सकता है, वापस आबादी की ओर लौट सकता है या मर सकता है. अगर अध्ययन यह साबित कर सके कि कौन-सी प्रजाति किस प्राकृतिक क्षेत्र में अधिक पाई जाती है, तो बचाए गए सांपों को छोड़ने के स्थान भी वैज्ञानिक आधार पर तय किए जा सकेंगे.
बिना प्रशिक्षण वाले स्नेक रेस्क्यू भी बन रहे खतरा
मध्य प्रदेश के सामने एक और चुनौती बिना प्रशिक्षण के हो रहे सांप बचाव अभियानों की है.सांप दिखते ही कई जगह स्थानीय स्तर पर किसी ऐसे व्यक्ति को बुला लिया जाता है जिसके पास न पर्याप्त प्रशिक्षण होता है, न सही उपकरण. गलत तरीके से पकड़ना, सांप को हाथ में लेकर प्रदर्शन करना या बिना जानकारी के दूसरी जगह छोड़ना इंसान और सांप दोनों के लिए जोखिम पैदा करता है.डर और गलतफहमी के कारण गैर-जहरीले सांप भी मारे जाते हैं. जबकि राज्य में पाई जाने वाली अधिकांश प्रजातियां इंसानों के लिए गंभीर खतरा नहीं हैं.
अस्पतालों की तैयारी में भी काम आएगी यह रिसर्च
अगर यह अध्ययन यह बता सके कि किसी इलाके में रसेल वाइपर या करैत की मौजूदगी ज्यादा है और उसी क्षेत्र में सांप काटने के मामले भी अधिक हैं, तो यह जानकारी वन्यजीव विभाग से आगे बढ़कर स्वास्थ्य विभाग के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है.
सबसे उपयोगी तस्वीर तब बनेगी जब सांपों की मौजूदगी के नक्शे को सांप काटने के मामलों,खेती,बारिश,गांवों,सड़कों,अस्पतालों,एम्बुलेंस और एंटी-वेनम भंडार के आंकड़ों के साथ जोड़ा जाएगा.तब जंगल में तैयार वैज्ञानिक डेटाबेस सीधे अस्पताल की आपात व्यवस्था से जुड़ सकता है.
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किंग कोबरा की वापसी का सवाल भी बना रहेगा
किंग कोबरा का सवाल भी इस अध्ययन के साथ बना रहेगा. वैज्ञानिक यह जांच सकते हैं कि क्या यह प्रजाति कभी मध्य प्रदेश में स्वाभाविक रूप से पाई जाती थी और क्या आज राज्य में उसके लिए उपयुक्त आवास मौजूद हैं.लेकिन किंग कोबरा को वापस लाना अपने आप में सांप काटने की समस्या का समाधान नहीं है. भारत में बड़ी संख्या में सांप काटने की घटनाएं जंगलों से ज्यादा खेतों, गांवों और मानव आबादी वाले इलाकों में होती हैं.
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असली कामयाबी किसी संख्या में नहीं, एक जीवन बचाने में होगी
2027 में जब यह अध्ययन पूरा होगा, तब इसकी सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि मध्य प्रदेश में कुल कितने सांप गिने गए.असल सफलता यह होगी कि क्या राज्य यह बेहतर तरीके से जान पाया कि कौन से जहरीले सांप कहां मिलते हैं, कौन से इलाके सबसे ज्यादा जोखिम वाले हैं, किस मौसम में खतरा बढ़ता है, कहां एंटी-वेनम पहले से रखना चाहिए और बचाए गए सांपों को कहां छोड़ना चाहिए.50 प्रजातियों, नौ जहरीली प्रजातियों, 16 चिन्हित हॉटस्पॉट और दो वर्षों में लगभग तीन गुना बढ़े दर्ज मामलों वाले मध्य प्रदेश में यह महज वन्यजीव जिज्ञासा की कहानी नहीं है."स्नेक सेंसस" की शुरुआत सांपों को गिनने के विचार से हुई थी. लेकिन इसकी असली कामयाबी शायद किसी अंतिम संख्या में नहीं, बल्कि उस वैज्ञानिक नक्शे में होगी जो जंगल में रेंगते सांप को उस खेत, उस गांव और उस अस्पताल से जोड़ सके जहां किसी इंसान की जिंदगी उस जानकारी पर निर्भर हो सकती है.
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