लगातार सात बार देश का सबसे स्वच्छ शहर होने का गौरव हासिल करने वाले इंदौर की साख दांव पर लग गई है. शहर की चमचमाती सड़कों और साफ-सुथरी गलियों में इन दिनों कचरे का अंबार दिखाई दे रहा है. ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि इंदौर नगर निगम के कुल 11,432 सफाई कर्मचारियों में से लगभग 70 फीसदी कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर बेमियादी हड़ताल पर चले गए हैं. इस हड़ताल के कारण इंदौर की चर्चित सफाई व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है और शहर के रिहायशी इलाकों से लेकर मुख्य बाजारों तक में गंदगी का साम्राज्य फैलने लगा है.
सड़कों पर पसरा कचरा और गलियों में बदबू
सफाई कर्मचारियों के काम बंद करने का सबसे ज्यादा असर इंदौर के नेहरू नगर, पाटनीपुरा और कई अन्य रिहायशी इलाकों में देखने को मिल रहा है. पिछले दो दिनों से घरों से कचरा उठाने वाली गाड़ियां जहां की तहां खड़ी हैं. सड़कों के किनारों पर लगे डस्टबिन कचरे से लबालब भर चुके हैं और अब कचरा सड़कों पर फैलने लगा है. स्थानीय निवासियों का कहना है कि बदबू के कारण घरों की खिड़कियां और दरवाजे बंद रखने पड़ रहे हैं. दो दिन की हड़ताल ने ही इंदौर की हालत ऐसी कर दी है कि देखकर पहचानना मुश्किल हो रहा है कि यह वही देश का सबसे साफ शहर है.
नियमितीकरण और 700 कर्मचारियों की बहाली की मांग
इससे पहले सोमवार को वाल्मीकि सेना के नेतृत्व में सफाई कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर नगर निगम मुख्यालय का चौतरफा घेराव किया. आंदोलनकारी सफाई कर्मियों का कहना है कि वे पिछले 23 वर्षों से नियमितीकरण और अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उनकी मुख्य मांग है कि निगम में एनजीओ और निजी कंपनियों के माध्यम से ठेके पर काम कराने की व्यवस्था को तुरंत बंद किया जाए और सीधे निगम के तहत स्थायी रोजगार दिया जाए. इसके अलावा, हाल ही में काम से हटाए गए 700 से अधिक कर्मचारियों को वापस नौकरी पर रखने और मेडिकल ग्राउंड पर अनुकंपा नियुक्तियां देने की मांग पर भी कर्मचारी अड़े हुए हैं.
जब कमिश्नर नहीं आए तो भड़का गुस्सा
हड़ताल के दौरान नगर निगम मुख्यालय के बाहर भारी तनाव की स्थिति बन गई थी. बड़ी संख्या में कर्मचारी हाथों में तख्तियां लेकर निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल से मिलने की मांग कर रहे थे. जब काफी देर तक निगमायुक्त प्रदर्शनकारी सफाई कर्मियों से मिलने अपने दफ्तर से बाहर नहीं आए, तो वहां मौजूद कर्मचारियों का गुस्सा और भड़क गया. इसी बीच, आक्रोशित होकर एक महिला सफाई कर्मचारी ने निगमायुक्त कार्यालय के मुख्य गेट पर अपनी चूड़ियां निकालकर फेंक दीं. इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है, जो कर्मचारियों के भीतर पनप रहे असंतोष को दिखाता है.
क्या इंदौर की रैंकिंग पर पड़ेगा इसका बुरा असर?
इस बड़ी हड़ताल ने इंदौर की राष्ट्रीय स्वच्छता रैंकिंग को लेकर भी एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है. केंद्र सरकार के 'स्वच्छ सर्वेक्षण' के तहत शहरों की रैंकिंग का निर्धारण सालभर चलने वाली सफाई व्यवस्था और जनता के फीडबैक के आधार पर होता है. इंदौर सात बार से लगातार नंबर वन पर बना हुआ है, लेकिन इस तरह की बेमियादी हड़ताल से अगर शहर में कचरा जमा रहता है, तो इससे न केवल शहर का स्कोर कम होगा बल्कि जनता का फीडबैक भी बिगड़ सकता है. कचरे का समय पर निस्तारण न होना और सड़कों पर गंदगी पसरा रहना स्वच्छता सर्वे की गाइडलाइंस का सीधा उल्लंघन है, जिससे इस बार इंदौर के हाथ से देश के सबसे साफ शहर का ताज छिनने का खतरा भी पैदा हो सकता है.
प्रशासनिक अधिकारियों की समझाइश बेअसर
हंगामे और विरोध प्रदर्शन की गंभीरता को देखते हुए इंदौर स्मार्ट सिटी के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) प्रखर सिंह और नगर निगम के अन्य बड़े अधिकारी आंदोलनकारियों के बीच पहुंचे. अधिकारियों ने सफाई कर्मचारियों से चर्चा कर उनकी मांगों का ज्ञापन स्वीकार किया और आश्वासन दिया कि उनकी जायज मांगों को राज्य सरकार के समक्ष विचार के लिए भेजा जाएगा. वाल्मीकि सेना और सफाई कर्मचारियों ने इस आश्वासन को नाकाफी बताते हुए कहा है कि जब तक उनकी मांगों पर कोई ठोस और लिखित फैसला नहीं होता, तब तक वे काम पर वापस नहीं लौटेंगे. दूसरी तरफ शहर की सफाई के लिए निगम की ओर से वैकल्पिक इंतजाम भी किए हैं लेकिन वो नाकाफी साबित हो रहे हैं.
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