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Fanta के बाद KitKat, Maggi और Sting पर भी सवाल ! क्या भारत में अलग रेसिपी से बेच रहे हैं बड़े ब्रांड ?

क्या भारतीय ग्राहकों को पैकेज्ड फूड और कोल्ड ड्रिंक की पूरी जानकारी मिल रही है? Reuters की रिपोर्ट बताती है कि Fanta, Maggi, KitKat और दूसरे उत्पादों की भारतीय व विदेशी बाजारों में बिकने वाली वर्जन में अंतर है. जानिए हेल्थ वॉर्निंग लेबल, FSSAI, फूड कंपनियों और सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी पूरी बहस.

Fanta के बाद KitKat, Maggi और Sting पर भी सवाल ! क्या भारत में अलग रेसिपी से बेच रहे हैं बड़े ब्रांड ?

मान लीजिए आप लंदन के किसी स्टोर से Fanta खरीदते हैं और फिर भारत में उसी ब्रांड की Fanta उठाते हैं. नाम एक, बोतल लगभग एक जैसी, लेकिन अंदर का माल अलग. Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन में बिकने वाली Fanta के मुकाबले भारत में बिकने वाली Fanta में चीनी की मात्रा कई गुना ज्यादा है. इतना ही नहीं, जिस रंग को लेकर यूरोप में कंपनियों को साफ-साफ हेल्थ वॉर्निंग देनी पड़ती है, भारत में उसकी जानकारी पैकेट के पीछे छोटे अक्षरों में लिखी जाती है.लेकिन यह कहानी सिर्फ Fanta की नहीं है. समाचार एजेंसी Reuters का दावा है कि भारत में चिप्स, कोल्ड ड्रिंक और दूसरे पैकेज्ड फूड पर सामने की तरफ साफ चेतावनी देने की कोशिश कई साल से चल रही थी, लेकिन बड़े फूड ब्रांड्स के विरोध के बाद मामला अटक गया. अब बहस सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है, जहां सवाल सिर्फ एक ड्रिंक का नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के हक और सेहत का है. खासकर तब, जब एक स्टडी के मुताबिक 2050 तक देश में 45 करोड़ लोग ओवरवेट या मोटापे की समस्या से जूझ सकते हैं. 

एक Fanta, लेकिन दो देशों में दो कहानी

Reuters की रिपोर्ट में Fanta का उदाहरण सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है. रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन में बिकने वाली Fanta के मुकाबले भारत वाली Fanta में चीनी कहीं ज्यादा है. वहीं इसमें कुछ ऐसे रंगों का इस्तेमाल भी किया जाता है जिनके बारे में यूरोप में ग्राहकों को ज्यादा प्रमुखता के साथ जानकारी दी जाती है. भारत में ऐसी जानकारी पैकेट के पीछे मौजूद होती है, जिसे अधिकांश ग्राहक शायद ही कभी पढ़ते हों. परेशानी ये है कि पिछले कई साल से यह चर्चा चल रही थी कि जिन पैकेट्स में नमक, चीनी या फैट ज्यादा है, उन पर सामने ही बड़े अक्षरों में चेतावनी लिखी जाए.

दुनिया के करीब 20 देशों में ऐसे सिस्टम लागू हैं. कहीं लाल रंग से चेतावनी दी जाती है, कहीं ट्रैफिक लाइट मॉडल अपनाया गया है.मकसद सिर्फ इतना है कि ग्राहक खरीदने से पहले समझ सके कि वह क्या खा रहा है. लेकिन भारत में ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है. 

कंपनियों ने क्यों किया विरोध?

Reuters के मुताबिक मार्च 2026 में हुई एक बैठक में कई बड़ी कंपनियों ने ऐसे Warning Label का विरोध किया. तर्क दिया गया कि पैकेट पर कोई सिंबल लगा देने से लोगों की खानपान की आदतें नहीं बदलेंगी.कंपनियों का कहना था कि लोगों को Portion Control यानी कम मात्रा में खाने के लिए जागरूक करना ज्यादा जरूरी है.लेकिन दिलचस्प बात ये है कि यही कंपनियां यूरोप के कई देशों में ऐसे लेबल का इस्तेमाल भी करती हैं. अब ये पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. जिसमें हेल्थ एक्टिविस्ट चाहते हैं कि भारत में भी ग्राहकों को पैकेट के सामने साफ चेतावनी मिले. जिसके बाद अदालत ने इस मुद्दे पर सरकार और FSSAI से जवाब मांगा है.

सिर्फ Fanta नहीं, KitKat, Maggi, Cerelac और Sting पर भी उठे सवाल

Reuters की रिपोर्ट बताती है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां अक्सर अलग-अलग देशों में एक ही ब्रांड के प्रोडक्ट अलग फॉर्मूले के साथ बेचती हैं. कंपनियों का तर्क है कि हर देश के नियम, लोगों का स्वाद और कीमतें अलग होती हैं, इसलिए रेसिपी में बदलाव करना पड़ता है. लेकिन भारत में यह बहस अब सिर्फ रेसिपी तक सीमित नहीं रही है. सोशल मीडिया पर Food Pharmer के नाम से पहचान बनाने वाले रेवंत हिमतसिंघका जैसे एक्टिविस्ट लंबे समय से भारतीय और विदेशी बाजारों में बिकने वाले कई प्रोडक्ट्स की तुलना करते रहे हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने Fanta, KitKat और Cerelac जैसे ब्रांड्स को लेकर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि कई भारतीय उपभोक्ताओं को यह महसूस होता है कि उन्हें वही ब्रांड तो मिल रहा है, लेकिन उसके अंदर का प्रोडक्ट दूसरे देशों के मुकाबले अलग या कमतर है.

रिपोर्ट में उदाहरण दिया गया है कि ऑस्ट्रेलिया में बिकने वाली KitKat में कोको की मात्रा भारतीय KitKat से काफी ज्यादा है. इसी तरह भारत में बिकने वाली Maggi नूडल्स में पाम ऑयल का इस्तेमाल होता है, जबकि ब्रिटेन में बिकने वाले कई वेरिएंट्स में अपेक्षाकृत महंगा सनफ्लावर ऑयल इस्तेमाल किया जाता है. दिलचस्प बात यह है कि ब्रिटेन में बिकने वाले कुछ Maggi पैकेट भारत में ही बनते हैं, लेकिन वहां उनके पैकेट के सामने नमक की ज्यादा मात्रा को लेकर चेतावनी भी दी जाती है.
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असली लड़ाई Fanta की नहीं, पैकेट पर लिखी सच्चाई की है

Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक असली लड़ाई इस बात को लेकर है कि ग्राहक को खरीदारी के समय कितनी जानकारी मिले और वह कितनी आसानी से उसे समझ पाए. ीफिलहाल भारत में ज्यादातर पैकेटबंद खाने-पीने की चीजों पर सामग्री और न्यूट्रीशन की जानकारी पीछे छोटे अक्षरों में दी जाती है. दूसरी तरफ दुनिया के करीब 20 देशों में ऐसे सिस्टम लागू हैं, जहां ज्यादा चीनी, ज्यादा नमक या ज्यादा फैट वाले प्रोडक्ट्स पर सामने ही रंगों और संकेतों के जरिए चेतावनी दी जाती है.

हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब ग्राहक दुकान में खड़ा होकर फैसला ले रहा होता है, तब सबसे ज्यादा असर उसी जानकारी का होता है जो उसे सबसे पहले दिखाई देती है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत का पैकेज्ड फूड और बेवरेज बाजार 100 अरब डॉलर से ज्यादा का हो चुका है. उद्योग जगत के अनुमान बताते हैं कि इस बाजार के करीब 80 फीसदी प्रोडक्ट्स में नमक, चीनी या फैट की मात्रा इतनी है कि अगर रंग आधारित चेतावनी प्रणाली लागू हुई तो बड़ी संख्या में पैकेटों पर लाल निशान दिखाई दे सकते हैं.

यही वजह है कि इस बहस को सिर्फ स्वास्थ्य नहीं, बल्कि कारोबार से भी जोड़कर देखा जा रहा है.इसी मुद्दे पर सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता और फूड इंडस्ट्री आमने-सामने हैं. एक पक्ष कहता है कि ग्राहक को साफ और सीधी जानकारी मिलनी चाहिए. दूसरा पक्ष मानता है कि ऐसे लेबल लोगों को भ्रमित कर सकते हैं और भारतीय खानपान की जटिलता को सही तरीके से नहीं दिखाते. Reuters के अनुसार मार्च में हुई बैठक के बाद FSSAI ने रंग आधारित चेतावनी वाले प्रस्ताव से दूरी बना ली थी, लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया.इस बहस की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि Lancet की एक स्टडी का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि 2050 तक भारत में करीब 45 करोड़ लोग ओवरवेट या मोटापे की समस्या से जूझ सकते हैं. ऐसे में सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि Fanta में कितनी चीनी है. बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में ग्राहकों को वही जानकारी मिल रही है, जिसके आधार पर वे अपनी और अपने बच्चों की सेहत से जुड़ा फैसला ले सकें. 
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