AI Detects Pancreatic Cancer: मौजूदा दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तेजी से हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ रहा है, खासकर मेडिकल साइंस में इसकी भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है. अब एक नई उपलब्धि में AI ने पैंक्रियाटिक कैंसर जैसी खतरनाक और जानलेवा बीमारी की पहचान को आसान बना दिया है. अमेरिका के मेयो क्लिनिक (Mayo Clinic) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा AI मॉडल तैयार किया है, जो क्लिनिकल डायग्नोसिस से करीब 3 साल पहले ही कैंसर के संकेत पहचान सकता है. इस AI सिस्टम को रेडियोमिक्स-बेस्ड अर्ली डिटेक्शन मॉडल (REDMOD) कहा जाता है. REDMOD को हेल्थ सेक्टर में एक बड़ी क्रांतिकारी सफलता माना जा रहा है.
नॉर्मल CT स्कैन में भी पकड़ लेता है बीमारी (How AI Model Detect Pancreatic Cancer)
यह AI मॉडल रूटीन एब्डॉमिनल CT स्कैन को एनालाइज करके उन छोटे सिग्नल्स को भी पहचान सकता है, जो आमतौर पर डॉक्टरों की नजर से छूट जाते हैं. खास बात यह है कि AI मॉडल तब भी कैंसर के संकेत पकड़ लेता है, जब ट्यूमर दिखाई नहीं देता और इलाज की संभावना सबसे ज्यादा होती है. रिसर्च के दौरान लगभग 2,000 CT स्कैन को एनालाइज किया गया. इनमें कई ऐसे मरीज शामिल थे, जिनके स्कैन पहले ठीक बताए गए थे, लेकिन बाद में उनमें पैंक्रियाटिक कैंसर का पता चला.

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73% मामलों में पहले ही दे दी चेतावनी (Pancreatic Cancer Early Warnings)
इस AI सिस्टम ने करीब 73% मामलों में कैंसर का संकेत औसतन 16 महीने पहले ही दे दिया. यह रेट उन स्पेशलिस्ट डॉक्टरों से लगभग दोगुना था, जिन्होंने बिना AI की मदद के वही स्कैन देखे थे. इस दौरान चौंकाने वाली बात यह रही कि जिन स्कैन को डायग्नोसिस से दो साल पहले लिया गया था, उनमें AI ने तीन गुना ज्यादा मामलों में शुरुआती कैंसर की पहचान की.
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क्यों खतरनाक है पैंक्रियाटिक कैंसर? (Why Is Pancreatic Cancer Dangerous?)
पैंक्रियाटिक कैंसर को सबसे घातक कैंसरों में गिना जाता है, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण आसानी से नजर नहीं आते. नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के अनुसार, 85% से ज्यादा मरीजों में इसका पता तब चलता है, जब बीमारी फैल चुकी होती है. इसका 5 साल का सर्वाइवल रेट 15% से भी कम है. अनुमान है कि 2030 तक यह अमेरिका में कैंसर से होने वाली मौतों का दूसरा सबसे बड़ा कारण बन सकता है.
कैसे काम करता है यह AI मॉडल? (How this AI Model Works)
REDMOD सैकड़ों इमेजिंग फीचर्स को एनालाइज करता है, जो टिशू की बनावट और स्ट्रक्चर में हो रहे छोटे बदलावों को पकड़ते हैं. यह उन शुरुआती बॉयोलोजिकल बदलावों को पहचान सकता है, जो कैंसर बनने से पहले शुरू हो जाते हैं. यह मॉडल खासतौर पर उन मरीजों के लिए बेहतर है, जिनमें जोखिम ज्यादा होता है, जैसे कि अचानक डायबिटीज होने वाले लोग. यह उनके पुराने CT स्कैन को एनालाइज कर भविष्य के खतरे की चेतावनी दे सकता है.
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क्लिनिकल ट्रायल की ओर अगला कदम (Clinical Trial Started)
अब इस तकनीक को AI-PACED नाम के प्रोजेक्ट के जरिए क्लिनिकल लेवल पर परखा जा रहा है. इस स्टडी का मकसद यह समझना है कि डॉक्टर इस AI टेक्नोलॉजी को मरीजों के इलाज में कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं. यह रिसर्च मेयो क्लिनिक की प्रीक्योर पहल का हिस्सा है, जिसका मकसद बीमारियों को लक्षण आने से पहले ही पहचानना और रोकना है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर यह टेक्नोलॉजी बड़े पैमाने पर लागू होती है, तो पैंक्रियाटिक कैंसर जैसे घातक रोगों से होने वाली मौतों में बड़ी कमी लाई जा सकती है.
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