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ईरान सीजफायर के बाद ट्रंप का नया टारगेट ग्रीनलैंड, NATO पर बरसे- 'पेपर टाइगर' बताया

ट्रंप ने NATO की भूमिका पर बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, 'जब हमें नाटो की जरूरत थी तब वे मौजूद नहीं थे, और अगर हमें उनकी दोबारा जरूरत पड़ी तो वे मौजूद नहीं होंगे.' इसके साथ ही ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर अपनी महत्वाकांक्षा को फिर दोहराया.

ईरान सीजफायर के बाद ट्रंप का नया टारगेट ग्रीनलैंड, NATO पर बरसे- 'पेपर टाइगर' बताया
नई दिल्ली:

ईरान के साथ तनाव कम होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है. ट्रंप ने न सिर्फ NATO सहयोगियों पर तीखा हमला बोला, बल्कि ग्रीनलैंड को लेकर अपनी पुरानी महत्वाकांक्षा को भी फिर हवा दे दी. उनके बयान से साफ संकेत मिल रहा है कि युद्धविराम के बाद अमेरिका की रणनीति अब नए भू-राजनीतिक मोर्चों की ओर मुड़ रही है.

ईरान युद्धविराम के बाद बदला फोकस

हाल ही में ईरान के साथ संघर्ष के बाद हुए युद्धविराम ने अमेरिका को राहत जरूर दी है, लेकिन इसके तुरंत बाद ट्रंप का आक्रामक रुख फिर सामने आ गया. ट्रंप ने दावा किया कि 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के दौरान अमेरिका को अपने सहयोगियों से अपेक्षित समर्थन नहीं मिला. उनका यह बयान सीधे तौर पर पश्चिमी सैन्य गठबंधन की एकता पर सवाल खड़ा करता है. खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक सुरक्षा चुनौतियां बढ़ रही हैं.

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NATO पर हमला: 'जब जरूरत थी, कोई नहीं आया'

ट्रंप ने NATO की भूमिका पर बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, 'जब हमें नाटो की जरूरत थी तब वे मौजूद नहीं थे, और अगर हमें उनकी दोबारा जरूरत पड़ी तो वे मौजूद नहीं होंगे.' यह सिर्फ आलोचना नहीं, बल्कि NATO की विश्वसनीयता पर सीधा हमला है. 'पेपर टाइगर' शब्द का इस्तेमाल कर ट्रंप यह संकेत देते रहे हैं कि यह गठबंधन दिखने में मजबूत है, लेकिन असली संकट के वक्त बेअसर साबित हो सकता है.

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ग्रीनलैंड पर ट्रंप की नजर पुरानी

ट्रंप के बयान का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा था ग्रीनलैंड को लेकर उनकी टिप्पणी. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, 'ग्रीनलैंड को याद रखो, वह विशाल, अव्यवस्थित ढंग से प्रबंधित बर्फ का टुकड़ा.' यह कोई सामान्य टिप्पणी नहीं है. यह सीधे तौर पर उस विवादित प्रस्ताव की ओर इशारा है, जब ट्रंप ने डेनमार्क से ग्रीनलैंड खरीदने की बात कही थी. जिसे डेनमार्क ने साफ तौर पर खारिज कर दिया था.

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क्यों अहम है ग्रीनलैंड?

ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की दिलचस्पी सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि गहरी रणनीतिक सोच का हिस्सा मानी जाती है.

भौगोलिक महत्व: आर्कटिक क्षेत्र में स्थित, जहां से रूस और चीन की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है.

सैन्य उपयोग: अमेरिका का पहले से वहां एयर बेस मौजूद है.

खनिज संपदा: दुर्लभ खनिज और ऊर्जा संसाधनों का बड़ा भंडार.

नई जियोपॉलिटिक्स: आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा.

यानी ग्रीनलैंड पर नजर दरअसल भविष्य की वैश्विक ताकत की लड़ाई से जुड़ी है.

NATO बनाम 'अमेरिका फर्स्ट' रणनीति

ट्रंप का यह रुख उनके पुराने 'America First' एजेंडे को फिर सामने लाता है. उनके मुताबिक, अमेरिका को ऐसे गठबंधनों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए जो संकट के समय साथ न दें. यह बयान पश्चिमी देशों के बीच दरार को और गहरा कर सकता है. खासकर तब जब रूस-यूक्रेन और मिडिल ईस्ट जैसे मुद्दों पर एकजुटता जरूरी मानी जाती है.

क्या बढ़ेगा ट्रांस-अटलांटिक तनाव?

ट्रंप के बयान से तीन बड़े असर हो सकते हैं:

1. NATO में भरोसे की कमी

2. अमेरिका-यूरोप रिश्तों में तनाव

3. ग्रीनलैंड को लेकर नई कूटनीतिक खींचतान

डेनमार्क और यूरोपीय देशों के लिए यह बयान असहज करने वाला है, क्योंकि यह उनकी संप्रभुता पर भी अप्रत्यक्ष सवाल उठाता है.

अब कहां जा रही है अमेरिकी रणनीति?

ईरान के साथ युद्धविराम के बाद ट्रंप का यह बयान बताता है कि अमेरिका अब मिडिल ईस्ट से आगे बढ़कर आर्कटिक और यूरोप पर फोकस कर सकता है. पारंपरिक गठबंधनों की जगह एकतरफा रणनीति को प्राथमिकता दी जा सकती है. आने वाले समय में वैश्विक राजनीति और ज्यादा अनिश्चित और टकरावपूर्ण हो सकती है.

ईरान के साथ तनाव कम होते ही ट्रंप का NATO और ग्रीनलैंड पर हमला यह दिखाता है कि अमेरिकी विदेश नीति में स्थिरता नहीं, बल्कि आक्रामक और बदलती प्राथमिकताएं हावी हैं. ग्रीनलैंड का जिक्र सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि आने वाले बड़े भू-राजनीतिक खेल की झलक हो सकता है.

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