- अमेरिका लगभग 200 वर्षों से ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की रणनीति पर काम कर रहा है और 5 प्रयास कर चुका है.
- द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डा स्थापित किया. सुरक्षा के लिए इसका उपयोग किया
- शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने ग्रीनलैंड को नाटो के उत्तरी ढाल का हिस्सा बनाकर अपनी सुरक्षा नीति मजबूत की
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आर्कटिक क्षेत्र के देश ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए यूरोप या किसी भी महाशक्ति से टकराने के मूड में हैं और पीछे हटने को कतई तैयार नहीं हैं. लेकिन ये अचानक नहीं है, करीब 200 सालों से अमेरिका ग्रीनलैंड को हड़पने की फिराक में है. नार्वे और डेनमार्क के बीच 434 साल पुरानी राजनीतिक संधि टूटने के बाद से ही अमेरिका की इस पर निगाह है.1814 की कील संधि के तहत डेनमार्क के हाथों से नार्वे तो निकल गया था, लेकिन ग्रीनलैंड उसके पास रह गया. सवाल है कि 50 हजार आबादी वाला देश ग्रीनलैंड क्या यूरोपीय देशों के बलबूते अमेरिका को मिशन ग्रीनलैंड से रोक पाएगा या नहीं, क्या ये दुनिया में तीसरे विश्व युद्ध की आहट तो नहीं है?
वेनेजुएला के बाद ग्रीनलैंड का नंबर
ट्रंप ने पहली बार 2019 में ग्रीनलैंड पर कब्जे का ख्याल जाहिर किया था और फिर वेनेजुएला के बाद दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर अमेरिकी झंडा गाड़ दिया है. अमेरिकी राष्ट्रपति एंड्रयू जैक्सन ने 1832 में इसे खरीदने का प्रस्ताव दिया था. उस वक्त अमेरिका भी धड़ाधड़ अपना दायरा बढ़ा रहा था. लुइसियाना परचेज और मुनरो डॉक्ट्रिन के तहत अमेरिका दूसरे देशों के इलाकों और द्वीपों पर कब्जे की होड़ में शामिल है.
अलास्का भी अमेरिका का हुआ
अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम सेवर्ड ने 1867 में अलास्का क्षेत्र के साथ ग्रीनलैंड को खरीदने का ऐलान किया. अलास्का के लिए उन्होंने रूस से बातचीत की. अलास्का पर कब्जे के जरिये अमेरिका का प्लान था कि कनाडा को घेरकर उस पर दबाव डाला जाए ताकि वो अमेरिका का हिस्सा बन जाए, लेकिन ब्रिटेन और कई अन्य यूरोपीय देश इसके खिलाफत कर रहे थे.
प्रथम विश्व युद्ध में पहला प्रयास
प्रथम विश्व युद्ध से पहले भी अमेरिका ने फिर ग्रीनलैंड और डेनिश वेस्ट इंडीज को खरीदने की कोशिश की. वो ऐसे सामरिक समुद्री इलाकों पर अपना अधिकार चाहता था ताकि जर्मनी के खिलाफ सैन्य अड्डों की तरह उसका इस्तेमाल किया जा सके. जर्मनी पर युद्ध की घोषणा से कुछ दिन पहले 31 मार्च 1917 को डेनिश वेस्ट इंडीज को अमेरिका को सौंपा था. अमेरिका ने उस वक्त ग्रीनलैंड पर डेनमार्क के कब्जे को मान्यता देने से इनकार कर दिया था.
द्वितीय विश्व युद्ध में दोबारा कोशिश
द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ होते ही व्हाइट हाउस में ग्रीनलैंड के कब्जे को लेकर दोबारा चर्चा तेज हो गई. नाजियों ने अप्रैल 1940 में डेनमार्क पर कब्जा करने (ग्रीनलैंड पर नहीं) के बाद अमेरिका ने ग्रीनलैंड की राजधानी नुउक में तुरंत एक वाणिज्यिक दूतावास बना लिया. डेनमार्क ने नाजी जर्मन के डर से 1941 में अमेरिका को ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डा बनाने की मंजूरी दे दी. दूसरे विश्व युद्ध में हिटलर की हार हुई तो अमेरिकी प्रेसिडेंट हेनरी ट्रूमैन ने 1946 में ग्रीनलैंड को खरीदने का औपचारिक प्रस्ताव रखा. लेकिन जर्मनी का डर हटा तो डेनमार्क ने फिर से इसे नामंजूर कर दिया. लेकिन नाजी खतरा हटा तो सोवियत संघ के कब्जे का डर उसे सताने लगा.
अमेरिका और सोवियत संघ में शीत युद्ध
अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध शुरू हुआ तो नाटो और वारसा संधि सामने आई. सोवियत खतरे को देखते हुए अमेरिका ने तय किया कि सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड पर कब्जा जरूरी है. नाटो का सदस्य डेनमार्क भी अन्य यूरोपीय देशों की तरह अमेरिका के साथ सुरक्षा संधि का पक्षधर था. यही वजह है कि 1951 की रक्षा संधि के जरिये ग्रीनलैंड में अमेरिका का धुले एयरबेस (Pituffik Space Base) बनाया गया. लेकिन ग्रीनलैंड की इसमें राय नहीं ली गई. पूरे शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने ग्रीनलैंड को सुरक्षा कवच बनाया.
यह नाटो के उत्तरी ढाल का हिस्सा था और परमाणु हथियारों की होड़ तेज होने के साथ ही डेनमार्क की 1957 की परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र नीति के बावजूद अमेरिकी परमाणु हथियार इस अड्डे पर रखे गए थे.
सोवियत संघ के विघटन के बाद शांति
सोवियत संघ के विघटन और अमेरिका के एकमात्र महाशक्ति के तौर पर उभरने के साथ ग्रीनलैंड पर अमेरिका कुछ शांत हुआ. लेकिन रूस के यूक्रेन पर हमले, चीन की समुद्र में बढ़ती आक्रामकता को देखते हुए अमेरिका फिर से ग्रीनलैंड पर सोचने को मजबूर हो गया है. ट्रंप का आरोप है कि चीन और रूस की निगाह इस आर्कटिक इलाके पर है. चीन सरकार खुद को आर्कटिक देश कहता है. चीन और रूस की जुगलबंदी ने भी अमेरिका को दहशत में ला दिया है.
आर्कटिक काउंसिल 2019 में दी थी चेतावनी
डोनाल्ड ट्रंप की पहली सरकार में विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने 2019 में आर्कटिक काउंसिल की मंत्रिस्तरीय बैठक में ग्रीनलैंड खरीदने की पेशकश की. अमेरिका ने चेतावनी दी थी कि आर्कटिक काउंसिल सिर्फ एनवायरमेंट और साइंस रिसर्च के भरोसे नहीं बैठी रह सकती है. चीन और रूस की विस्तारवादी नीतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अब ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अमेरिकी कब्जे में लेने का गंभीर अभियान छेड़ दिया है. उन्होंने ग्रीनलैंड के हर नागरिक को 1 मिलियन डॉलर देने की पेशकश की है.साथ ही सेना की तैनाती बढ़ा दी है.
ग्रीनलैंड पर 5 बड़े सवाल
- सवाल है कि क्या 50 हजार आबादी वाला देश ग्रीनलैंड अमेरिकी फौज को रोक पाएगी
- क्या ब्रिटेन, फ्रांस जैसे देश यूरोप ट्रंप को रोकने की मुहिम में युद्ध के स्तर तक जाएंगे
- रूस यूक्रेन युद्ध में फंसा यूरोप ट्रंप के मिशन ग्रीनलैंड पर कितना विरोध करेगा
- रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन की अमेरिका के प्लान पर चुप्पी के पीछे क्या कोई डील है
- क्या यूक्रेन पर अमेरिकी शांति प्रस्ताव पर यूरोपीय देशों के विरोध से ट्रंप खिसियाए हैं
चीन और रूस के इरादे भी नेक नहीं
विशेषज्ञों का कहना है कि रूस और चीन की आर्कटिक को लेकर इरादे नेक नहीं हैं, लेकिन इस आधार पर किसी लोकतांत्रिक देश के संप्रभु अधिकारों और आत्मनिर्णय के अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अमेरिका द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से लोकतांत्रिक अधिकारों की पैरोकारी करता रहा है, लेकिन वेनेजुएला, ईरान जैसे घटनाक्रम के बीच ग्रीनलैंड पर अमेरिकी अभियान इस साख पर बट्टा लगा रहा है.
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