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ईरान पर आर्थिक दबाव बनाना के लिए क्या चीन को टारगेट करने वाले हैं ट्रंप?

ट्रंप ने बार-बार उन देशों से आने वाले सामान पर टैरिफ लगाने की धमकी दी है जो ईरान के साथ व्यापार करते हैं, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे टैक्स के कानूनी आधार को खारिज कर दिया था.

ईरान पर आर्थिक दबाव बनाना के लिए क्या चीन को टारगेट करने वाले हैं ट्रंप?
ट्रंप किसी भी तरह ईरान को झुकाने की कोशिशों में हैं.
  • अमेरिका ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए चीन की स्वतंत्र रिफाइनरियों पर कड़े प्रतिबंध लगा सकता है
  • चीन की स्वतंत्र रिफाइनरियां ईरान से तेल खरीदने में सक्रिय हैं और अमेरिका सेकेंडरी प्रतिबंध लगा सकता है
  • अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने चीन के दो बड़े बैंकों को ईरानी फंडिंग में मदद के आरोप में चेतावनी दी है

अमेरिका लगातार ईरान को काबू करने की कोशिशों में लगा हुआ है. अब अमेरिका इस बात के संकेत दे रहा है कि ईरान को और आर्थिक रूप से कमजोर किया जाएगा. एनालिटिक्स फर्म Kpler के 2025 के डेटा के अनुसार, ईरान से भेजे जाने वाले तेल का 80% से ज्यादा हिस्सा चीन खरीदता है. स्वतंत्र रिफाइनरियां इस व्यापार का बड़ा हिस्सा संभालती हैं, जिससे उन पर तथाकथित 'सेकेंडरी प्रतिबंधों' का खतरा मंडराता रहता है. ये प्रतिबंध उन संस्थाओं पर लगाए जाते हैं जो प्रतिबंधों के मुख्य निशाने पर मौजूद किसी संस्था की मदद करती हैं.

चीन की स्वतंत्र रिफाइनरियों को "टीपॉट" कहा जाता है. ये चीन की कुल रिफाइनिंग क्षमता का एक-चौथाई हिस्सा संभालती हैं. ये बहुत कम और कभी-कभी नुकसान वाले मुनाफे के मार्जिन पर काम करती हैं. अमेरिका के पिछले प्रतिबंधों ने बड़ी स्वतंत्र रिफाइनरियों को ईरानी तेल खरीदने से रोका है. लेकिन प्रतिबंधों के जानकारों का कहना है कि स्वतंत्र रिफाइनरियां इस मामले में कुछ हद तक सुरक्षित हैं क्योंकि अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से उनका लेना-देना बहुत कम है. अब अमेरिका इन टीपॉट पर कड़े प्रतिबंध लगा सकता है. इससे चीन के लिए ईरान से तेल खरीदना काफी मुश्किल हो जाएगा.

चीनी बैंकों पर प्रतिबंध

OFAC ने चीन और हांगकांग की छोटी संस्थाओं पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाए हैं. इन पर ईरानी तेल के अरबों डॉलर के लेन-देन और हथियार खरीदने के लिए फंड जुटाने में मदद करने का आरोप है. ट्रेजरी विभाग ने चीन के दो बड़े बैंकों को चेतावनी दी है कि अगर उनके सिस्टम से ईरानी फंड का लेन-देन होता पाया गया, तो उन पर सेकेंडरी प्रतिबंध लग सकते हैं; हालांकि, अभी उन्हें आधिकारिक तौर पर प्रतिबंधित संस्थाओं की सूची में शामिल नहीं किया गया है.

प्रतिबंधों के जानकारों का कहना है कि अगर उन दो बैंकों पर कार्रवाई की जाती है (जिनकी पहचान अमेरिकी अधिकारियों ने सार्वजनिक नहीं की है) या कोई अन्य प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो इसका असर बड़े वित्तीय संस्थानों पर भी पड़ सकता है. हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि इससे बीजिंग की ओर से जवाबी कार्रवाई भी हो सकती है.

ट्रंप प्रशासन के अधिकारी इस साल के आखिर में ट्रंप और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाली संभावित बैठक से पहले वाशिंगटन और बीजिंग के बीच तनाव को कम करने की कोशिश कर रहे हैं. उन्हें चिंता है कि चीन उन जरूरी खनिजों के निर्यात में कटौती कर सकता है जो एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के उत्पादन के लिए बहुत अहम हैं, खासकर ऐसे समय में जब अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी अभी भी अपनी सप्लाई चेन विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं.

'व्हैक-अ-मोल' 

अमेरिका ईरान के उन लोगों और संस्थाओं, साथ ही चीन और खाड़ी देशों में मौजूद उन लोगों को निशाना बनाना जारी रख सकता है जो तेहरान को युद्ध के लिए पैसे जुटाने और प्रतिबंधों से बचने में मदद कर रहे हैं. ट्रेजरी ने हाल ही में उन कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए हैं जो ईरान के तेल से होने वाली कमाई का इस्तेमाल आयात के लिए करने में मदद कर रही हैं. लेकिन ऑब्सीडियन रिस्क एडवाइजर्स के मैनेजिंग प्रिंसिपल ब्रेट एरिक्सन का कहना है कि ऐसे कदम 'व्हैक-अ-मोल' (एक को रोकने पर दूसरे का उभरना) जैसे हैं, जिनसे ईरान के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया है; क्योंकि तेहरान बस उनकी जगह नई संस्थाएं बना लेता है.

'फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज' के प्रतिबंध विशेषज्ञ मियाद मालेकी ने कहा कि बेसेंट शायद तेल शिपर्स, खरीदारों और करेंसी एक्सचेंजर्स के खिलाफ सख्ती बढ़ाने का संकेत दे रहे थे, जो ईरान को आयात के लिए भुगतान करने में मदद करते हैं. उन्होंने कहा कि विमानन (एविएशन) से जुड़े और प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं, जिनका मकसद ईरान की व्यापार करने की क्षमता को कम करना होगा, खासकर तब जब अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से शिपिंग को रोक दिया है.

जमीनी नाकेबंदी 

कुछ अमेरिकी और इजरायली अधिकारियों ने जमीनी नाकेबंदी की संभावना जताई है, जिसके लिए ईरान के पड़ोसी देशों - इराक, तुर्की, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अजरबैजान और आर्मेनिया - की मदद की जरूरत होगी.

ट्रंप प्रशासन के अफगानिस्तान को छोड़कर बाकी सभी देशों के साथ अलग-अलग स्तर के करीबी संबंध हैं, लेकिन वह सीमा पहाड़ी है और वहां गश्त करना वैसे भी बहुत मुश्किल है. ट्रंप का पाकिस्तान पर कुछ हद तक दबाव हो सकता है, जिसने हाल ही में ट्रेजरी से 10 अरब डॉलर की करेंसी स्वैप लाइन मांगी थी, और तुर्की पर भी, जो अमेरिकी F-35 लड़ाकू विमान कार्यक्रम में फिर से शामिल होना चाहता है.

जमीनी नाकेबंदी से ईरान के लोगों पर दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि इससे भोजन, ऊर्जा और कपड़ों का आयात रुक जाएगा, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे कदम को लागू करना मुश्किल होगा और हो सकता है कि इससे विरोध-प्रदर्शन या आंतरिक दबाव न बने.

सेकेंडरी टैरिफ

ट्रंप ने बार-बार उन देशों से आने वाले सामान पर टैरिफ लगाने की धमकी दी है जो ईरान के साथ व्यापार करते हैं, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे टैक्स के कानूनी आधार को खारिज कर दिया था. सीनेट ने पिछले हफ्ते रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने वाला एक बिल पास किया. इसमें ईरान पर नए प्रतिबंध भी शामिल थे और इससे ट्रंप को टैरिफ लगाने की नई शक्तियां मिलतीं, जिनका इस्तेमाल वे उन देशों के खिलाफ कर सकते थे जो ईरान के व्यापार और हथियार खरीदने में मदद करते हैं.

इस कानून को अभी अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स से पास होना बाकी है. टैरिफ के उपायों को लेकर डेमोक्रेट्स और कुछ रिपब्लिकन के बीच व्यापक चिंताओं को देखते हुए, इसे पास कराना चुनौतीपूर्ण हो सकता है.

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