- शिवसेना UBT बनाम शिंदे गुट: सुप्रीम कोर्ट ने स्पीकर को भेजा नोटिस
- 6 सांसदों के विलय विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
- संसद में शिवसेना की संख्या घटने पर उठे सवाल, सांसदों के विलय विवाद पर दो सप्ताह बाद फिर सुनवाई
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट और एकनाथ शिंदे गुट के बीच राजनीतिक और कानूनी संघर्ष एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. सर्वोच्च अदालत ने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा शिवसेना (UBT) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे की शिवसेना में विलय को मान्यता देने के फैसले के खिलाफ दाखिल याचिका पर लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय और संबंधित सांसदों को नोटिस जारी किया है. हालांकि अदालत ने फिलहाल इस फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया. न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सभी पक्षों से जवाब मांगा और अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद तय की है.
क्या है पूरा मामला?
संसद के मानसून सत्र से पहले लोकसभा अध्यक्ष ने शिवसेना (UBT) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट में विलय को मान्यता दे दी थी. इस फैसले के बाद लोकसभा में उद्धव ठाकरे गुट के सांसदों की संख्या घटकर केवल तीन रह गई. लोकसभा अध्यक्ष के इस निर्णय को शिवसेना (UBT) की ओर से सांसद अरविंद सावंत ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. याचिका में कहा गया है कि इस फैसले से संसद में पार्टी का राजनीतिक अस्तित्व और कामकाज गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है.
सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना के नेता उद्धव बालासाहेब ठाकरे (UBT) की याचिका पर नोटिस जारी किया है। याचिका में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसमें महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना में 6 बागी सांसदों के मर्जर को मान्यता दी गई थी।
— ANI_HindiNews (@AHindinews) July 22, 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की प्रारंभिक सुनवाई के बाद लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय और पार्टी छोड़ने वाले छह सांसदों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. हालांकि अदालत ने इस चरण पर हस्तक्षेप करते हुए स्पीकर के फैसले पर रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की. कोर्ट ने कहा कि पहले सभी पक्षों का पक्ष सुनना जरूरी होगा. मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी.
शिवसेना (UBT) ने क्या दलील दी?
शिवसेना (UBT) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने अदालत में कहा कि मामला केवल सांसदों के दल बदलने का नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता और संसदीय व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है. उन्होंने कहा कि छह सांसद शिवसेना (UBT) के चुनाव चिह्न पर जीतकर संसद पहुंचे थे और उनके खिलाफ कोई अयोग्यता की कार्यवाही भी लंबित नहीं है. कामत ने दलील दी कि ये सांसद एकतरफा निर्णय लेकर यह नहीं कह सकते कि पूरी पार्टी का किसी दूसरे राजनीतिक दल में विलय हो गया है.
'विलय हुआ ही नहीं'
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि वास्तविकता में कोई विलय हुआ ही नहीं है. अदालत को बताया गया कि जिस सर्कुलर के आधार पर यह निर्णय सामने आया, उस पर एक संयुक्त सचिव के हस्ताक्षर हैं और उसमें यह भी स्पष्ट नहीं है कि लोकसभा अध्यक्ष ने औपचारिक आदेश पारित किया था या नहीं. कामत ने कहा कि पूरा घटनाक्रम सुनियोजित प्रतीत होता है और समय बीतने के साथ ऐसे मामलों का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है. इसलिए मामले में तत्काल हस्तक्षेप जरूरी है.
स्पीकर के अधिकार क्षेत्र पर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान यह भी तर्क दिया गया कि यह मामला दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता से जुड़ा नहीं है. शिवसेना (UBT) की ओर से कहा गया कि लोकसभा अध्यक्ष के पास किसी राजनीतिक दल के विलय को मान्यता देने का अधिकार क्षेत्र नहीं है, खासतौर पर तब जब मूल राजनीतिक संगठन का किसी अन्य दल में विलय ही नहीं हुआ हो.
फिलहाल राहत नहीं
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए नोटिस जरूर जारी किया, लेकिन फिलहाल लोकसभा अध्यक्ष के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. इसका मतलब है कि छह सांसदों के शिंदे गुट में विलय को मिली मान्यता फिलहाल प्रभावी रहेगी, जब तक कि अदालत मामले में आगे कोई आदेश जारी नहीं करती. अब सभी की नजरें दो सप्ताह बाद होने वाली अगली सुनवाई पर हैं, जहां इस राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण विवाद पर विस्तृत बहस होने की संभावना है.
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