राजधानी दिल्ली में संसद भवन से कुछ ही दूर है 18वीं सदी का प्रसिद्ध खगोलीय स्मारक जंतर-मंतर. आजकल यहां कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में शिक्षा व्यवस्था की खामियों, परीक्षा पेपर लीक, नीट जैसी परीक्षाओं में अनियमितताओं और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर जबरदस्त प्रदर्शन चल रहा है. युवा छात्र, अभिभावक, सामाजिक कार्यकर्ता और जलवायु योद्धा सोनम वांगचुक तंबुओं में रहकर, बारिश में भी नारे लगा रहे हैं. संस्थापक अभिजीत दिपके समेत हजारों लोग यहां डटे हुए हैं. यह कोई अचानक शुरू हुआ आंदोलन नहीं, बल्कि जंतर-मंतर की उस लंबी और गौरवशाली परंपरा की नवीनतम कड़ी है जो 1993 से आज तक जारी है.
किसने बनवाया था जंतर-मंतर
महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय खगोल विज्ञान के गहरे ज्ञाता थे. उन्होंने दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में पांच वेधशालाएं बनवाईं. दिल्ली वाली 1724 में सबसे पहले तैयार हुई. सम्राट यंत्र, जयप्रकाश यंत्र और राम यंत्र जैसे पत्थर के विशाल उपकरण इसकी शान बढ़ाते हैं. कभी ग्रहों, तारों और समय की सटीक गणना के लिए बनी यह विशाल वेधशाला आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन राष्ट्रीय स्मारक है. पर्यटक यहां आते हैं, लेकिन आम भारतीयों के लिए यह अब आंदोलन का पर्याय बन चुका है.
दिल्ली में जंतर-मंतर से पहले कहां होते थे प्रदर्शन
1980 के दशक तक दिल्ली में बड़े प्रदर्शनों का पसंदीदा स्थल बोट क्लब लॉन्स था. राजपथ के पास स्थित इन लॉन्स से संसद, राष्ट्रपति भवन और केंद्रीय सचिवालय साफ दिखते थे. 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में भारतीय किसान यूनियन के लगभग पांच लाख किसानों ने बोट क्लब पर कब्जा कर लिया. वे हफ्ते भर रहे, गाय-भैंस लेकर आए, खाना पकाया और पूरा इलाका जाम कर दिया. इस प्रदर्शन ने सरकार को झकझोर दिया. सुरक्षा और स्वच्छता के कारण 1993 में बोट क्लब पर प्रदर्शन करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. उसी साल बिना किसी औपचारिक घोषणा के जंतर-मंतर को नई दिल्ली का आधिकारिक प्रदर्शन स्थल बना दिया गया. यह जगह संसद के काफी करीब थी ताकि आवाज सत्ता तक पहुंचे, लेकिन इतनी नियंत्रित भी कि पुलिस आसानी से बैरिकेडिंग कर सके. दो मुख्य प्रवेश-निकास द्वार होने से भीड़ प्रबंधन आसान था. सेक्शन 144 यहां आमतौर पर नहीं लगाया जाता था. इस तरह एक खगोलीय स्मारक धीरे-धीरे भारत का अनौपचारिक 'हाइड पार्क' बन गया.
सबको जगह देता है जंतर-मंतर
1993 के बाद छात्र संगठन, मजदूर यूनियन, किसान समूह और महिला संगठन यहां पहुंचने लगे. 2006 से 2010 के बीच अकेले 13,000 से ज्यादा धरने और 5,000 से अधिक रैलियां हुईं. सैकड़ों सांसद और विधायक भी यहां प्रदर्शन करते हुए हिरासत में लिए गए. सबसे चमकीला अध्याय पांच अप्रैल 2011 को लिखा गया. अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ और जन लोकपाल बिल की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की. अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण, किरण बेदी जैसे लोग जुड़ गए. हजारों युवा सड़कों पर उतर आए. यह आंदोलन देशव्यापी बना और अंततः आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ. जंतर-मंतर से शुरू हुई इस लहर ने भारतीय राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया.
16 दिसंबर 2012 के निर्भया कांड के बाद जंतर-मंतर महिलाओं की सुरक्षा और कठोर कानूनों की मांग का केंद्र बन गया. युवा और महिलाएं मोमबत्तियां जलाकर जमा हुईं. परिणामस्वरूप आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम 2013 पारित हुआ. 2015-16 में पूर्व सैनिकों ने वन रैंक वन पेंशन (ओआरओपी) की मांग को लेकर लंबा धरना दिया और सफल रहे. 2017 में तमिलनाडु के कर्जग्रस्त किसानों ने 40 दिनों तक प्रदर्शन किया. उन्होंने मानव खोपड़ियां और मुंह में मरे चूहे रखकर नाटकीय विरोध किया. दलित परिवारों, रोहित वेमुला मामले के छात्रों और 2017 के 'नॉट इन माय नेम' अभियान के लोगों ने भी यहां आवाज उठाई.
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पर कब रोक लगी थी
प्रदर्शनों की भीड़ बढ़ने से शोर, गंदगी और प्रदूषण की शिकायतें बढ़ीं. अक्टूबर 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन प्रतिबंधित कर दिए और रामलीला मैदान को विकल्प घोषित किया. लेकिन 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन के मौलिक अधिकार को बहाल करते हुए जंतर-मंतर को फिर खोल दिया. यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बड़ी जीत थी. दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ विशाल भीड़ यहां जमा हुई तो 2023 में ओलंपिक पदक विजेता पहलवानों जैसे विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया ने बृज भूषण शरण सिंह पर यौन उत्पीड़न के आरोपों के खिलाफ महीनों लंबा धरना दिया. उन्होंने पदक गंगा में विसर्जित करने की धमकी तक दी. और अब सीजेपी शिक्षा सुधार, पेपर लीक और छात्र हितों को लेकर डटी हुई है. यह साबित करता है कि जंतर-मंतर नई पीढ़ी के लिए अभी भी सबसे प्रभावी और पहली पसंद है.
बेशक, जंतर-मंतर सिर्फ एक भौतिक जगह नहीं, बल्कि एक विचार और जीवंत परंपरा है. यह जगह साबित करती है कि लोकतंत्र में असहमति की जगह न सिर्फ जरूरी है बल्कि उसे संरक्षित भी किया जाना चाहिए. चाहे अण्णा हजारे हों, पहलवान हों, किसान हों या आज के छात्र सभी ने यहां आकर दिखाया कि सत्ता तक अपनी आवाज पहुंचाने का सबसे सशक्त और लोकतांत्रिक तरीका अभी भी सड़क है. चुनौतियां भी कम नहीं हैं. जगह अत्यंत संकरी है, बुनियादी सुविधाएं लगभग न के बराबर हैं, पुलिस बैरिकेडिंग अक्सर होती है और कभी-कभी हिंसा भी भड़क जाती है. फिर भी लोग बार-बार लौटते हैं क्योंकि जंतर-मंतर पर होना मतलब सुना जाना, दिखाई देना और इतिहास का हिस्सा बनना है.
दिल्ली बनाने वालों के घर कहां हैं
पर जंतर-मंतर में सिर्फ धरने-प्रदर्शन ही नहीं होते. देश की नई राजधानी नई दिल्ली के निर्माण के लिए यहां आए कुछ ठेकेदारों ने जंतर-मंतर में अपने भव्य आशियाने बनवाए थे. इनमें धरम सिंह सेठी, सोभा सिंह, बैसाखा सिंह और नारायण सिंह थे. धरम सिंह को राष्ट्रपति भवन, साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक के लिए राजस्थान के धौलपुर और आगरा से पत्थरों की नियमित आपूर्ति का ठेका मिला था. सोभा सिंह ने धरम सिंह के साथ वाले प्लाट पर अपना बंगला बनवाया, जिधर बाद में केरल हाउस बना. इस बंगले का डिज़ाइन वाल्टर जॉर्ज ने बनाया था. बैसाखा सिंह अमृतसर से आए थे और नॉर्थ ब्लॉक के मुख्य ठेकेदार बने. उन्होंने अनेक निजी भवन भी बनाए. नई दिल्ली की चौड़ी-चौड़ी सुंदर सड़कों का जब भी उल्लेख होता है, तो सरदार नारायण सिंह का नाम याद नहीं किया जाता. उन्होंने यहां की सभी सड़कों का निर्माण करवाया था. उनका बंगला सोभा सिंह और बैसाखा सिंह के बंगलों के ठीक सामने था.
बंटवारा और जंतर-मंतर
जंतर-मंतर का संबंध भारत के बंटवारे से भी है. यहां स्थित सात जंतर-मंतर वाले बंगले में 1947 से 1971 तक कांग्रेस का मुख्यालय रहा. महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल आदि यहां आते-जाते थे. राज खन्ना ने अपनी चर्चित कृति 'आजादी के पहले, आजादी के बाद' में 15 जून 1947 को ब्रिटिश सरकार की विभाजन-योजना पर हुई बैठक का विस्तृत वर्णन किया है. यहीं कांग्रेस ने देश के बंटवारे पर अपनी मुहर लगाई थी. आगे चलकर सात जंतर-मंतर जनता दल और मोरारजी देसाई द्वारा स्थापित अखिल भारतीय सेवा दल का भी मुख्यालय रहा. कांग्रेस में विभाजन के बाद यहां कांग्रेस (ओ) का अधिकार हो गया, जिसका आगे चलकर जनता पार्टी में विलय हो गया.
बहरहाल, एक समय था जब जंतर-मंतर का नाम आते ही राजा जयसिंह द्वितीय द्वारा 1724 में निर्मित उस खगोलीय वेधशाला का ख्याल जेहन में आता था. अब वह बात नहीं रही. इस परिसर में एक सुंदर पार्क भी है, जहां हनुमान रोड, बाबा खड़क सिंह मार्ग, जनपथ, जनपथ लेन, राजा बाजार और कनॉट प्लेस के निवासी प्रातः सैर के लिए आया करते थे. पर जब से प्रवेश शुल्क लागू हुआ, सैर के शौकीनों ने अन्य जगहों का रुख कर लिया.
जंतर-मंतर का सफर 18वीं सदी की खगोलीय वेधशाला से 21वीं सदी के लोकतंत्र चौक तक का है. 1993 से लेकर 2026 तक यहां हुए हजारों प्रदर्शनों ने न सिर्फ कई कानून बदले बल्कि समाज की सामूहिक चेतना को भी जगाया. अन्ना आंदोलन ने राजनीति बदली, निर्भया ने कानून बदला, पहलवानों ने खेल प्रशासन को हिलाया और आज सीजेपी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठा रही है. जब तक देश में अन्याय और असंतोष रहेगा, जंतर-मंतर जिंदा रहेगा.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)