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दिल्ली पुलिस Vs शिमला पुलिस: आखिर किसी की गिरफ्तारी के लिए कहां तक जा सकती है पुलिस? जानें- क्या कहता है कानून

दिल्ली और शिमला पुलिस कांग्रेस कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर आमने‑सामने हैं, एक-दूसरे पर कानूनी प्रक्रिया न मानने का आरोप लगा रही हैं. ऐसे विवादों पर सुप्रीम कोर्ट संघीय सौहार्द और आपसी बातचीत से समाधान की बात करता है. BNSS की धाराएं 43, 77, 78 और 185 अंतर‑राज्यीय गिरफ्तारी और वारंट तामील की प्रक्रिया तय करती हैं.

दिल्ली पुलिस Vs शिमला पुलिस: आखिर किसी की गिरफ्तारी के लिए कहां तक जा सकती है पुलिस? जानें- क्या कहता है कानून
  • दिल्ली पुलिस और शिमला पुलिस के बीच कांग्रेस कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को लेकर विवाद चल रहा है.
  • BNSS की धारा 43 के तहत किसी भी राज्य की पुलिस आरोपी का पीछा कर पूरे देश में गिरफ्तारी कर सकती है.
  • दूसरे राज्य में गिरफ्तारी के लिए स्थानीय पुलिस को सूचना देना और उनकी मौजूदगी जरूरी मानी गई है.
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नई दिल्ली:

कांग्रेस कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को लेकर दिल्ली पुलिस और शिमला पुलिस आपस में भिड़ी हैं. दोनों एक-दूसरे पर नियम-कानूनों के उल्लंघन कर सहयोग ना करने का आरोप लगा रहे हैं. ऐसे में अब सवाल ये है कि आखिर कौन सही है, कौन गलत... खास बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसे मामलों की बात की है जिसमें उसने संघीय सौहार्द की बात करते हुए उच्च स्तर पर इसे आपसी बातचीत से हल निकालने की बात की है.

क्या कहता है कानून?

कानूनी जानकारों के मुताबिक पहले आपराधिक प्रक्रिया संहिता यानी CrPC में अंतर-राज्यीय गिरफ्तारी/कार्रवाई से जुड़ी प्रक्रिया दी गई थी और अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में अंतर-राज्यीय गिरफ्तारी/कार्रवाई से जुड़ी प्रमुख धाराएं बनाई गई हैं. इसके मुताबिक धारा 43 के तहत किसी भी राज्य की पुलिस आरोपी का पीछा कर भारत में कहीं भी गिरफ्तारी कर सकती है.

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धारा 77 के तहत दूसरे राज्य में वारंट की तामील की प्रक्रिया दी गई है जो स्थानीय मजिस्ट्रेट/पुलिस के माध्यम से किया जाएगा. धारा 78 में वारंट की तामील के बाद निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी/ट्रांजिट रिमांड का प्रावधान है जबकि धारा 185 में दूसरे राज्य के थाने/अधिकारी को जांच/तलाशी/सबूत के लिए लिखित अनुरोध करने का प्रावधान रखा गया है. 

लोकल पुलिस की मौजूदगी जरूरी

दरअसल स्थानीय पुलिस को सूचना देने के बाद दूसरे राज्य की पुलिस कार्रवाई कर सकती है. व्यावहारिक व न्यायिक मानकों के अनुसार संबंधित राज्य/क्षेत्र की पुलिस को सूचित कर, उनकी उपस्थिति में कार्रवाई होगी.

वरिष्ठ वकील आर के सिंह के मुताबिक पुलिस एक संस्था के नाते राज्यों के अधिकार छेत्र में आती है. चूंकि अपराध की प्रवृत्ति किसी क्षेत्र की परिधि में नहीं बांधी जा सकती है, इसलिए संविधान निर्माताओं ने एक अद्भुत व्यवस्था बनाई, जो अमेरिका में भी नहीं है.

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US में भी नहीं ये व्यवस्था

पुलिस को राज्य सूची के एंट्री 2 में रखा. जरूर लेकिन इसको संविधान के सातवीं सूची में डाल दिया और इसके अधिकार क्षेत्र को खास कर जांच और गिरफ्तारी को पैन इंडिया यानी अखिल भारतीय बना  दिया. ये व्यवस्था अमेरिका में भी नहीं है.

आर के सिंह के मुताबिक दिल्ली पुलिस सीधे केंद्र सरकार/गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है, जबकि शिमला पुलित हिमाचल में आती है और राज्य सरकार के अधीन है. इसलिए दोनों अलग प्रशासनिक नियंत्रण में हैं, लेकिन आपराधिक प्रक्रिया कानून एक ही है. 

वरिष्ठ वकील ने बताया कि अगर दो राज्यों की पुलिस के बीच टकराव हो तो उसे डीजीपी या वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा बातचीत से सुलझाया जाना चाहिए. 

BNSS में इसके लिए कोई अलग धारा नहीं है. ये संघीय सौहार्द के सिद्धांत से संचालित होती हैं. हालांकि विवाद बढ़ने पर मामले में सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट में भी अर्जी लगाई जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में ऐसे मामलों में संघीय सौहार्द के सिद्धांत की बात की है 

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