- सुप्रीम कोर्ट ने NCERT की विवादित किताब मामले में जमकर फटकार लगाई
- CJI सूर्यकांत ने इसे न्यायपालिका की गरिमा को कमजोर करने वाला सोचा-समझा कदम बताया है
- NCERT ने कहा विवादित चैप्टर तैयार करने वाले लेखकों को मंत्रालय से अलग करेंगे
NCERT के विवादित चैप्टर पर सुप्रीम कोर्ट में आज भी सुनवाई गर्म रही. चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इसे न्यायपालिका की गरिमा को चोट पहुंचाने वाली सोची‑समझी चाल बताते हुए केंद्र और NCERT को कड़ी फटकार लगाई. कोर्ट ने साफ कहा कि जब तक वह संतुष्ट नहीं होता, तब तक मामले की सुनवाई जारी रहेगी. वहीं NCERT ने बिना शर्त माफी की पेशकश की है. कोर्ट ने कहा कि इस किताब में बॉयस नैरेटिव है. किताब के कटेंट सिर्फ छात्रों तक सीमित नहीं रहेंगे बल्कि अगली पीढियों तक पहुंचेंगे.
'जिन्होंने चैप्टर तैयार किए वो मंत्रालय से नहीं जुड़ेंगे'
कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि जो 32 किताबें बिकी थीं, उनको वापस ले लिया है. आगे भी इस किताब को वापस ले लिया गया है. सीजेआई ने कहा कि ये 8 वीं क्लास के बच्चों की बात नहीं हैं. ये कैल्कुलेटेड मूव यानी सोचा समझा तरीका है. सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि जिन दो लोगों ने ये चैप्टर तैयार किए हैं, वे इस मंत्रालय से दोबारा कभी नहीं जुड़ेंगे. किसी दूसरी मिनिस्ट्री से भी नहीं.

'मुझे भी किताब की एक कॉपी मिली'
CJI ने कहा, 'मैंने एजुकेशन सेक्रेटरी का भेजा हुआ कम्युनिकेशन पढ़ा है. जब हम पर हमला होता है, तो हम जानते हैं कि कैसे जवाब देना है. आप कहते हैं कि पब्लिकेशन वापस ले लिया गया है. लेकिन यह बाजार में है, यह सोशल मीडिया में है. मुझे भी किताब की एक कॉपी मिली. CJI ने कहा कि अगर आप पूरी टीचिंग कम्युनिटी और स्टूडेंट्स को सिखा रहे हैं कि ज्यूडिशियरी करप्ट है तो इससे क्या मैसेज जाएगा? इससे टीचर्स और पेरेंट्स क्या सीखेंगे.'
'किताब में जो लिखा, वो बहुत लापरवाही से लिखा'
सीजेआई ने विवादित चैप्टर को लेकर कहा कि इसमें ज्यूडिशियरी के खिलाफ मिली सैकड़ों शिकायतों का खास तौर पर जिक्र है, जिससे लगता है कि कोई एक्शन नहीं लिया गया और एक पूर्व सीजेआई के भाषण के कुछ शब्द लिए गए हैं, जिससे लगता है कि ज्यूडिशियरी ने खुद ट्रांसपेरेंसी की कमी और इंस्टीट्यूशनल करप्शन को माना है. आर्टिकल में आगे कहा गया है कि लोग ज्यूडिशियरी में अलग-अलग लेवल के करप्शन का अनुभव करते हैं. किताब में जो कुछ भी लिखा गया है वो बहुत ही लापरवाही से लिखा गया है, उस पर अपनी राय देने के बजाय, डायरेक्टर ने कंटेंट का बचाव करते हुए जवाब दिया है.

'यह सोची समझी चाल'
सीजेआई सूर्यकांत ने आगे कहा कि पब्लिकेशन में हमारे समाज में ज्यूडिशियरी की भूमिका पर पूरा चैप्टर है, लेकिन इसमें सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट के अच्छे इतिहास को छोड़ दिया गया है और डेमोक्रेटिक ताने-बाने को बचाने में इंस्टीट्यूशन की भूमिका को भी नहीं बताया गया है. हमें ऐसा लगता है कि इंस्टीट्यूशनल अथॉरिटी को कमजोर करने और ज्यूडिशियरी की गरिमा को कम करने की एक सोची-समझी चाल है. अगर इसे बिना रोक-टोक के चलने दिया गया, तो यह आम जनता और युवाओं के आसानी से समझ में आने वाले मन में न्यायपालिका की पवित्रता को खत्म कर देगा.
कोर्ट ने कहा, यह चुप्पी बहुत बुरी है क्योंकि इस कोर्ट ने कई बड़े अधिकारियों को करप्शन, सरकारी पद का गलत इस्तेमाल करने या फंड की हेराफेरी के लिए पकड़ा है. हमें लगता है कि किताब में शब्दों, बातों का चुनाव, शायद अनजाने में हुई गलती या सच्ची गलती नहीं है. हम यह भी कहना चाहते हैं कि हम किसी भी सही आलोचना या ज्यूडिशियरी की जांच करने के अधिकार को दबाने के लिए Suo motu कार्यवाही का प्रस्ताव नहीं रखते हैं. हमारा पक्का यकीन है कि सख्त बातचीत से संस्थान की जान बनी रहती है.
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