अस्पताल का नाम आते ही बीमारी के साथ इलाज के खर्च की चिंता भी सामने आ जाती है. लेकिन सवाल यह है कि नौबत अस्पताल तक पहुंचे, उससे पहले हम अपनी सेहत के लिए क्या कर सकते हैं? और गंभीर बीमारी हो जाए तो इलाज का खर्च किसी परिवार पर इतना भारी क्यों पड़े कि उसकी पूरी आर्थिक स्थिति बिगड़ जाए?
NDTV World Summit 2026 में लीलावती अस्पताल के परमानेंट ट्रस्टी राजीव मेहता ने इन्हीं सवालों पर खुलकर बात की. समय पर जांच से लेकर अस्पतालों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल, इलाज के खर्च और स्वास्थ्य बीमा के दावों तक उन्होंने कई अहम मुद्दे उठाए.
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उनकी बात का पूरा निचोड़ अस्पताल के उस एक वाक्य में छिपा था- इलाज अपनी जगह ठीक है, पर सबसे पहले इंसानियत जरूरी है.
कार की सर्विसिंग तो याद रहती है, अपनी क्यों नहीं?
राजीव मेहता ने मंच से एक बहुत ही निजी दर्द साझा किया. उन्होंने बताया कि उनका परिवार दवा और अस्पताल के इस काम में आखिर आया कैसे. किस्सा उनकी अपनी दादी से जुड़ा था, जो चंडीगढ़ घूमने गई थीं और वहीं अचानक स्ट्रोक आने से चल बसीं.
उस वक्त उनकी उम्र सिर्फ 52 साल थी. मेहता ने कहा कि दादी का यूं अचानक चले जाना पूरे घर को भीतर तक हिला गया. इसी सदमे से मेरे दादाजी और मेरे पिता किशोर मेहता के मन में यह बात बैठी कि एक ऐसा अस्पताल खड़ा करना है, जहां किसी दूसरे के अपने को ऐसे बेबस न मरना पड़े. साल 2026 में लीलावती अस्पताल को पूरे 30 बरस हो चुके हैं. आज वहां 400 से ज्यादा डॉक्टर और लगभग 3500 का स्टाफ मरीजों की देखरेख में लगा रहता है.
कार की सर्विसिंग तो याद रहती है, अपनी क्यों नहीं?
बातचीत के दौरान मेहता ने सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया कि अस्पताल की सीढ़ियां तब मत चढ़िए जब शरीर जवाब दे जाए. उन्होंने कहा कि हमें इलाज के पीछे भागने के बजाय बीमारी को रोकने की आदत डालनी होगी.
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात याद दिलाते हुए कहा कि आज के दौर में परहेज और समय पर जांच ही सबसे बड़ा इलाज है.
बात समझाने के लिए उन्होंने रोजमर्रा की मिसाल दी-
कई गंभीर बीमारियों में समय पर जांच और चिकित्सकीय सलाह अहम हो सकती है. मेहता ने इसी संदर्भ में नियमित स्वास्थ्य जांच और बीमारी की रोकथाम पर जोर दिया.
अस्पताल में AI कैसे बदल रहा मरीजों की जांच का तरीका?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई पर मेहता ने हवा-हवाई बातें करने के बजाय जमीनी हकीकत बताई. उन्होंने साफ कहा कि एआई कोई कल की बात नहीं है, यह आज का औजार है. इससे डॉक्टरों को बीमारी की जड़ तक जल्दी पहुंचने में मदद मिल रही है.
उन्होंने लीलावती का ही उदाहरण दिया कि पहले मरीज को एमआरआई की उस तंग नली में 40-42 मिनट तक घुटकर लेटना पड़ता था. अब नई मशीनों से वही काम सिर्फ साढ़े आठ मिनट में निबट जाता है.
छोटे बच्चों की जांच के लिए ऐसी मशीनें लगाई गई हैं जहां मां बच्चे के साथ रह सकती है, ताकि मासूम डरे नहीं और रोना-धोना न हो. तकनीक का असली मतलब यही है कि मरीज की घबराहट थोड़ी कम हो सके.
इलाज के बढ़ते खर्च और स्वास्थ्य बीमा पर क्या बोले राजीव मेहता?
अस्पतालों की भारी भरकम फीस और आम आदमी की मजबूरी पर भी मेहता ने लाग-लपेट के बिना बात रखी. कैंसर जैसी भयानक और महंगी बीमारियों के इलाज पर उन्होंने साफ कहा कि एक ऊपरी सीमा यानी कैपिंग तय होनी ही चाहिए.
उन्होंने जोर देकर कहा कि अस्पताल के बिल पर एक हद बंधनी चाहिए, ताकि कोई कंगाल न हो जाए.
हेल्थ इंश्योरेंस वालों को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य सेवा कोई आम दुकानदारी या धंधा नहीं है. यहां लोगों की जान दांव पर होती है.
मेहता का साफ कहना था कि बीमा कंपनियों को अपने कागजी पचड़ों से बाहर निकलना पड़ेगा. जब किसी का मरीज आईसीयू में हो, उस वक्त फाइलों में नुक्स निकालकर क्लेम अटकाना सरासर गलत और अमानवीय है.
लीलावती अस्पताल के विस्तार को लेकर क्या है योजना?
जब उनसे पूछा गया कि बड़े-बड़े फिल्मी सितारे और वीआईपी लीलावती में ही क्यों दिखते हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि यह सिर्फ बड़े नामों की बात नहीं है. एक आम मजदूर से लेकर अमीर तक यहां इसलिए आते हैं क्योंकि उन्हें संस्थान की नीयत और डॉक्टरों के हाथ पर भरोसा है.
उन्होंने यह भी बताया कि अस्पताल का दायरा अब मुंबई से बाहर निकल रहा है. साल 2026 के आखिर तक अहमदाबाद में नया अस्पताल चालू हो जाएगा. इसके बाद इंदौर और फिर देश के बाहर अफ्रीका, यूरोप और रूस तक शाखाएं ले जाने का प्लान है. अपनी बात खत्म करते हुए उन्होंने एक ही बात कही कि दवा तो कोई भी दे सकता है, पर मरीज को सबसे ज्यादा जरूरत उस वक्त अपनेपन और ढांढस की होती है.
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