- भारत-जर्मनी के बीच रक्षा संबंधों को और मजबूत करने के लिए दोनों देश डिफेंस इंडस्ट्रियल रोडमैप पर काम कर रहे हैं
- पनडुब्बियों का डिजाइन भारतीय मझगांव डॉक लिमिटेड और जर्मन TKMS शिपयार्ड मिलकर तैयार करेंगे और तकनीक साझा करेंगे
- पनडुब्बियों की लंबी अवधि के मेंटेनेंस और रिफिट में भी जर्मनी से तकनीकी सहयोग और साझेदारी जारी रहेगी
भारत में जर्मनी के राजदूत डॉ. जैस्पर वीक एनडीटीवी वर्ल़्ड समिट में आए तो उन्होंने भारत-जर्मनी रक्षा संबंधों पर कई बातें शेयर की. उन्होंने भारत के साथ सैन्य संबंधों को महत्वपूर्ण बताते हुए इसे और गहरा करने की प्रतिबद्धता जताई. डॉ. जैस्पर वीक ने पनडुब्बी सौदे से लेकर डिफेंस इंडस्ट्रियल रोडमैप के बारे में भी बताया.
डिफेंस इंडस्ट्रियल रोडमैप पर मिलकर हो रहा काम
जर्मनी के राजदूत ने कहा, "हम दुनिया भर में अपने भरोसेमंद साझेदारों के साथ संबंधों को और गहरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, और भारत इसका एक बेहतरीन उदाहरण है. दशकों से हमारी एक बहुत ही भरोसेमंद साझेदारी रही है, और हमारे द्विपक्षीय संबंधों में, जिसमें रक्षा क्षेत्र भी शामिल है, अपार संभावनाएं हैं. हमारी एक पुरानी साझेदारी रही है—उदाहरण के लिए, 4 पनडुब्बियां, जिनमें से 2 को 1980 के दशक में भारत में ही बनाया गया था. अब हम 'डिफेंस इंडस्ट्रियल रोडमैप' (रक्षा औद्योगिक रोडमैप) के जरिए इस साझेदारी को और आगे बढ़ाने जा रहे हैं. इसमें रक्षा उद्योग के कई अन्य क्षेत्र भी शामिल हैं, जैसे सेंसर तकनीक, मानवरहित सिस्टम, सिग्नलिंग और संचार जैसे कई आयाम हैं."
ट्रांसपोर्ट प्लेन और मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर पार्टनरशिप
डॉ. जैस्पर वीक ने आगे बताया, "आज भारत में एयरबस ट्रांसपोर्ट प्लेन और मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर बना रही है. हम वास्तव में इस साझेदारी में निवेश करना चाहते हैं. यह दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद स्थिति है; हम अपनी तकनीक साझा करने में खुश हैं, और इसके बदले हमें एक नया बाजार और एक नई सप्लाई चेन मिलती है. भारतीय रक्षा उद्योग ने भी बहुत शानदार प्रगति की है, इसलिए यह एक बेहतरीन तालमेल है और हम इस रास्ते पर आगे बढ़ना जारी रखने के लिए बहुत उत्साहित हैं."
पनडुब्बी समझौते में क्या टेक्नोलॉजी मिलेगी
एक अन्य कार्यक्रम में जर्मनी के राजदूत ने बताया कि अभी भारत के साथ जर्मनी का कोई पनडुब्बी समझौता साइन नहीं हुआ है. हालांकि, उन्होंने इशारा किया कि इस पर बातचीत चल रही है. उन्होंने कहा, "अगर यह समझौता हो जाता है, तो ये छह पनडुब्बियां इसका एक बेहतरीन उदाहरण होंगी. इन पनडुब्बियों को भारत में काफी हद तक स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके बनाया जाएगा. पहली पनडुब्बी में 40% स्थानीय सामग्री होगी, जो छठी पनडुब्बी तक बढ़कर 60% या 70% तक पहुंच जाएगी. इसके लिए भारत में कई सहायक कंपनियों के साथ साझेदारी की जा रही है, जिसमें टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी शामिल है, ताकि वे इन पनडुब्बियों के लिए जरूरी पुर्जे उपलब्ध करा सकें."
पनडुब्बियों का डिजायन भारत-जर्मनी मिलकर बनाएंगे
डॉ. जैस्पर वीक ने बताया कि ये छह पनडुब्बियां पहले से बनी-बनाई नहीं हैं. इन्हें विशेष रूप से भारत की जरूरतों के हिसाब से तैयार किया जाएगा. इनका अंतिम डिजाइन भारतीय शिपयार्ड (जैसे मझगांव डॉक लिमिटेड) और जर्मन शिपयार्ड (TKMS) मिलकर तैयार करेंगे. उन्होंने बताया, "इसमें टेक्नोलॉजी शेयरिंग की भी बात है, और फिर दशकों तक चलने वाले मेंटेनेंस और रिफिट का काम भी इसमें शामिल है. आमतौर पर पनडुब्बियों को 40-50 सालों तक इस्तेमाल किया जाता है, खासकर जर्मन पनडुब्बियों को; और इस दौरान, दशकों तक उनके मेंटेनेंस, रिफिट और अपडेट के काम में काफी टेक्नोलॉजी शेयरिंग होती है. तो अगर यह डील पक्की हो जाती है, तो इसमें पूरी तरह से टेक्नोलॉजी शेयरिंग होगी. और शायद इसीलिए इसमें इतना इंतजार करना पड़ रहा है."
यह भी पढ़ें | UK की नौकरी जाने पर टूट गया भारतीय इंजीनियर, गांव में बैठे पिता को बताया तो मिला भावुक करने वाला जवाब
यह भी पढ़ें | Video: चीन की AI फिल्म हुई सुपर फ्लॉप तो एलन मस्क का 'प्रयोग' नहीं खींच पाया दर्शक; आखिर क्यों
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं