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'मेरा कोलेस्ट्रॉल बढ़ गया है'... क्या इसका मतलब हार्ट अटैक तय है? कार्डियोलॉजिस्ट ने दिया जवाब

क्या हर बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल खतरनाक होता है? जानिए LDL और HDL में अंतर, ट्राइग्लिसराइड्स का असर, हार्ट अटैक का जोखिम और कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करने के उपाय.

'मेरा कोलेस्ट्रॉल बढ़ गया है'... क्या इसका मतलब हार्ट अटैक तय है? कार्डियोलॉजिस्ट ने दिया जवाब

Good vs Bad Cholesterol: क्या रिपोर्ट में कोलेस्ट्रॉल बढ़ा आना मतलब हार्ट अटैक का खतरा है? क्या हर तरह का कोलेस्ट्रॉल नुकसान पहुंचाता है? कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. विवेक टंडन बता रहे हैं कि LDL, HDL और ट्राइग्लिसराइड्स में क्या फर्क है, कौन सा कोलेस्ट्रॉल दिल का दुश्मन है और इसे कंट्रोल करने के लिए क्या करना चाहिए.

कोलेस्ट्रॉल मोम जैसा एक चिकना पदार्थ है जो लिवर में बनता है. यह हमारे शरीर की हर एक कोशिका (सेल) की बाहरी दीवार बनाने, जरूरी हॉर्मोन्स का बैलेंस बनाए रखने और धूप से विटामिन डी सोखने के लिए बहुत आवश्यक है. परेशानी कोलेस्ट्रॉल से नहीं, बल्कि खून में इसके बिगड़ते संतुलन से होती है. जब इसका लेवल हद से ज्यादा बढ़ जाता है, तो यह धमनियों में चिपकने लगता है और दिल के दौरे का खतरा पैदा करता है. इसलिए इसे सिर्फ अच्छा या बुरा कहकर नहीं, बल्कि इसके पूरे गणित को समझना जरूरी है.

कोलेस्ट्रॉल के प्रकार: कौन दोस्त है और कौन दुश्मन?

जब आप लिपिड प्रोफाइल टेस्ट कराते हैं, तो उसमें तीन-चार नाम लिखे आते हैं जिन्हें देखकर लोग अक्सर उलझ जाते हैं. इन्हें आसान भाषा में ऐसे समझिए:

एलडीएल (लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन) यानी बैड कोलेस्ट्रॉल: इसे खराब कोलेस्ट्रॉल इसलिए कहते हैं क्योंकि यह खून की नलियों (धमनियों) की दीवारों पर कचरे की तरह जमने लगता है. इसे मेडिकल भाषा में प्लाक कहते हैं. जैसे-जैसे प्लाक बढ़ता है, नसों में खून बहने का रास्ता संकरा हो जाता है. अगर यह नली पूरी तरह ब्लॉक हो जाए, तो हार्ट अटैक या ब्रेन स्ट्रोक आ सकता है.
एचडीएल (हाई-डेंसिटी लिपोप्रोटीन) यानी गुड कोलेस्ट्रॉल: यह हमारा सच्चा मददगार है. इसका काम खून में घूम रहे फालतू कोलेस्ट्रॉल को बटोरकर वापस लिवर तक पहुंचाना है, जहां लिवर उसे फिल्टर करके शरीर से बाहर निकाल देता है. इसका स्तर जितना अच्छा होगा, आपका दिल उतना ही सुरक्षित रहेगा.
ट्राइग्लिसराइड्स: यह खून में मौजूद एक अलग तरह की वसा है. जब हम जरूरत से ज्यादा तला-भुना, मीठा या कार्बोहाइड्रेट खाते हैं, तो शरीर बची हुई कैलोरी को ट्राइग्लिसराइड्स में बदल देता है. अगर खून में ट्राइग्लिसराइड्स ज्यादा हैं और साथ में एचडीएल कम है, तो यह दिल के लिए बहुत बड़ा अलार्म है.

हाई कोलेस्ट्रॉल की सबसे खतरनाक बात : अधिकांश लोगों में हाई कोलेस्ट्रॉल का कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होता. कई बार हार्ट अटैक या ब्लॉकेज का पता चलने के बाद ही समस्या सामने आती है.

खामोश खतरा: कोई लक्षण नहीं दिखता

कोलेस्ट्रॉल की सबसे धोखेबाज बात यह है कि इसका कोई साफ लक्षण नहीं होता. जब तक धमनियां 70-80 फीसदी तक बंद नहीं हो जातीं, इंसान को पता भी नहीं चलता कि अंदर क्या गड़बड़ चल रही है. लोग बाहर से बिल्कुल चुस्त-दुरुस्त और सामान्य महसूस करते हैं.

यही वजह है कि 30 साल की उम्र के बाद हर किसी को साल में कम से कम एक बार लिपिड प्रोफाइल जांच जरूर करानी चाहिए. खासकर उन लोगों को जिनके परिवार में किसी को कम उम्र में दिल का दौरा पड़ा हो, या जिन्हें हाई बीपी, शुगर (डायबिटीज) और मोटापे की समस्या हो.

कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के मुख्य कारण और बचाव के उपाय

कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के पीछे हमारी रोजमर्रा की गलत आदतें सबसे ज्यादा जिम्मेदार होती हैं. अगर हम अपनी लाइफस्टाइल में थोडा सुधार कर लें, तो इस खतरे को काफी हद तक टाल सकते हैं:

थाली से हटाएं नुकसानदेह फैट: समोसे, कचौरी, पिज्जा, बर्गर, डालडा घी और पैकेटबंद चिप्स जैसी चीजों में ट्रांस फैट और सैचुरेटेड फैट बहुत ज्यादा होता है. ये सीधे तौर पर एलडीएल को बढ़ाते हैं. इनकी जगह खाने में हरी सब्जियां, फल, दालें, ओट्स और फाइबर वाली चीजें बढ़ाएं.
मुट्ठी भर मेवे खाएं: बादाम और अखरोट जैसे नट्स में अच्छे फैट्स होते हैं, जो एचडीएल यानी अच्छे कोलेस्ट्रॉल को सुधारने में मदद करते हैं.
रोज आधा घंटा पसीना बहाएं: )दिनभर एक ही जगह बैठे रहने से फैट बर्न नहीं होता. हफ्ते में कम से कम पांच दिन 30 से 40 मिनट तेज चाल में टहलें, साइकिल चलाएं या हल्की कसरत करें. इससे वजन भी काबू में रहेगा और मेटाबॉलिज्म भी ठीक होगा.
बीड़ी, सिगरेट और शराब से दूरी: तंबाकू और सिगरेट धमनियों की अंदरूनी परत को खुरदुरा बना देते हैं, जिससे बैड कोलेस्ट्रॉल वहां आसानी से चिपकने लगता है. वहीं बहुत ज्यादा शराब ट्राइग्लिसराइड्स को तेजी से बढ़ाती है.

क्या सिर्फ डाइट और कसरत से काम चल जाएगा?

कई बार मरीज मुझसे बहस करते हैं कि हम तो रोज टहलते हैं और सादा खाना खाते हैं, फिर भी कोलेस्ट्रॉल क्यों बढ़ा हुआ है? समझने वाली बात यह है कि करीब 75 से 80 फीसदी कोलेस्ट्रॉल हमारा लिवर खुद बनाता है. कुछ लोगों में जेनेटिक कारणों (पारिवारिक इतिहास) की वजह से लिवर जरूरत से ज्यादा कोलेस्ट्रॉल बनाने लगता है.

ऐसी स्थिति में सिर्फ खान-पान बदलने से बात नहीं बनती. वहां डॉक्टर स्टेटिन जैसी दवाएं शुरू करने की सलाह देते हैं. यह दवा लिवर में कोलेस्ट्रॉल के प्रोडक्शन को रोकती है और नसों में जमे प्लाक को स्थिर करती है ताकि वह टूटे नहीं. अक्सर लोग अफवाहों के चक्कर में आकर या किसी के कहने पर अपनी दवा बीच में ही बंद कर देते हैं, जो बहुत खतरनाक साबित हो सकता है. डॉक्टर की सलाह के बिना कोलेस्ट्रॉल की दवा कभी बंद न करें.

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रिपोर्ट की संख्या से न डरें, रिस्क को समझें

एक बार रिपोर्ट में एलडीएल बढ़ा आने का मतलब यह कतई नहीं है कि कल ही कोई अनहोनी हो जाएगी. हम डॉक्टर सिर्फ एक नंबर देखकर इलाज तय नहीं करते. हम मरीज की उम्र, उसका ब्लड प्रेशर, शुगर लेवल, स्मोकिंग की आदत और फैमिली हिस्ट्री सब मिलाकर यह देखते हैं कि अगले 10 सालों में उस मरीज को दिल का दौरा पड़ने का कुल खतरा (ओवरऑल कार्डियोवैस्कुलर रिस्क) कितना है.

कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने का मकसद सिर्फ टेस्ट रिपोर्ट में एक नंबर को नीचे लाना नहीं है, बल्कि अपनी खून की नलियों को लचीला, साफ और दिल को सालों-साल जवान रखना है. डरने के बजाय वक्त पर जांच कराएं, सही खाना खाएं, एक्टिव रहें और अगर डॉक्टर दवा की सलाह दें, तो बिना झिझक उसका नियमित सेवन करें. सेहतमंद दिल ही एक लंबी और खुशहाल जिंदगी की बुनियाद है.

(लेखक: डॉ. विवेक टंडन, डायरेक्टर एवं हेड, कार्डियोलॉजी, शारदाकेयर - हेल्थसिटी)

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