Viral Story: दिल्ली में 30 हजार रुपये की सैलरी पाने वाले एक जेन-जी ग्राफिक डिजाइन को थार गाड़ी से ऑफिस आता देख प्रिंटिंग प्रेस का मालिक खुद को छोटा महसूस करने लगा. कुछ ही दिनों में उसने अपनी ऑल्टो गाड़ी बेच दी और होंडा सिटी गाड़ी खरीदकर ले आया. जब जेन-जी ने अपने बॉस को नई गाड़ी से आता देखा तो उसने में नई कार से ऑफिस आने का मन बना लिया. बस फिर क्या था, अगले दिन जब बॉस अपनी होंडा सिटी कार से ऑफिस पहुंचा तो जेन-जी को ढाई करोड़ रुपये की रेंज रोवर कार से उतरता देख वो फिर हैरान रह गया.
कौन है ये जेन-जी? पता लगाने में जुटे लोग
इस कहानी को पड़ोस की प्रिंटिंग प्रेस मालिक के भांजे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट पर शेयर किया है, जो खूब सुर्खियां बटोर रही है. उसका कहना है कि अब प्रिंटिंग प्रेस का मालिक और आसपास बिजनेस चलाने वाले बाकी लोग यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके बीच इतना अमीर आदमी कौन आ गया है? क्योंकि देखने में तो उसके कपड़े एकदम साधारण से लगते हैं, लेकिन वो जिस गाड़ी को ट्रैवल करता है, वो बिल्कुल भी आम नहीं है.
'सैलरी के बदले छोले भटूरे मांगता है'
शख्स आगे लिखता है, 'मेरे मामा अक्सर उससे ग्राफिक डिजाइनिंग करवाते हैं, लेकिन बदले में उसने कभी पैसे नहीं मांगे. जब भी मामा ने उसे पैसे देने की कोशिश की तो वो साफ मना कर देता और सिर्फ छोले भटूरे खिलाने की डिमांड करता. उसने मेरे मामा को अपनी रेंज रोवर में घुमाया भी था. काम करते हुए वो खूब बातें करता है, लेकिन कभी पैसे नहीं मांगाता.'
पिता जज, चाचा डीसीपी-तहसीलदार
युवक ने आखिर में बताया कि इस जेन-जी के पिता जज हैं. एक चाचा DCP हैं और दूसरे तहसीलदार हैं, जो जमीन के प्लॉट वगैरह बांटते हैं. कुछ लोगों की जिंदगी तो सच में जन्म से ही सेट होती है.
A ₹30k employee shows up in a ₹2.5 CR range rover.
by u/GreenAuroraa in delhi
सोशल मीडिया पर छिड़ी गोल्डन स्पून वाली बहस
युवक के जिंदगी सेट होने वाली लाइन ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है. अब कुछ लोग जज, डीसीपी और तहसीलदार की सैलरी में ये गाड़ियां अफोर्ड करने पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि कुछ गोल्डन स्पून वाली बात पर अपनी-अपनी राय दे रहे हैं.
एक यूजर ने लिखा, 'डिस्ट्रिक्ट जज J5 लेवल पर होते हैं. उनकी सैलरी 2.5-2.7 लाख रुपये होती है. इसी तरह DCP पे लेवल 12 पर होते हैं. उनकी सैलरी लगभग 1.2-2 लाख रुपये प्रति महीना होती है. वहीं, तहसीलदार लेवल 8-10 पर होते हैं, जिनकी सैलरी 75 हजार से 1 लाख रुपये प्रति महीना होती है. अब जरा सोचिए, उस रेंज रोवर का खर्च कौन उठाता है.'
दूसरे यूजर ने लिखा, 'मैंने ऐसे लोग भी देखे हैं जो अमीर घर में पैदा हुए हैं. जैसे स्कूल में मेरा एक क्लासमेट था. पढ़ाई-लिखाई में कमजोर, बहुत बुरा बर्ताव और बाद में उसने अपने पिता का बिजनेस संभाल लिया. आज उसके पास 3 कारें हैं. जबकि मैं अच्छे ग्रेड्स और जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए कड़ी मेहनत करता रहा हूं.'
तीसरे यूजर ने लिखा, 'प्राइवेट स्कूल में मेरे एक क्लासमेट की सालाना फीस 10 लाख रुपये थी. अब वह अपनी फ़ैमिली की दुकानों पर चिप्स के पैकेट सजाता है, लेकिन उसके पास एक शानदार ऑडी कार और 5 बच्चे हैं. वहीं स्कॉलरशिप पर एडमिशन पाने वाला मैं आज भी आज भी अपनी अच्छी जिंदगी बनाने की कोशिश कर रहा हूं.'
चौथे यूजर ने लिखा, 'कम से कम वह विनम्र तो है, और एक अच्छा इंसान लगता है. कुछ लोग इसके लायक नहीं होते, फिर भी बहुत डींगें मारते हैं.'
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