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1918 के स्पैनिश फ्लू के साए में जी रही दुनिया? वैज्ञानिक क्यों मानते हैं- फ्लू कभी खत्म नहीं होगा!

बदलते मौसम के साथ एक बार फिर देशभर में स्वाइन फ्लू के मामले बढ़ने लगे हैं. स्वाइन फ्लू 2009 में एक महामारी बनकर आया था. वैज्ञानिक मानते हैं कि इसकी जड़ें 1918 के स्पैनिश फ्लू से जुड़ी हैं.

1918 के स्पैनिश फ्लू के साए में जी रही दुनिया? वैज्ञानिक क्यों मानते हैं- फ्लू कभी खत्म नहीं होगा!
दिल्ली में स्वाइन फ्लू के केस तेजी से बढ़ रहे हैं.
AFP
नई दिल्ली:

आज से 108 साल पहले यानी 1918 में जो 'स्पैनिश फ्लू' फैला था, वह आज भी किसी न किसी तरह से हमारे बीच घूम रहा है. स्पैनिश फ्लू 500 सालों की सबसे खतरनाक महामारी थी, जिसमें 50 करोड़ से ज्यादा लोग संक्रमित हुए थे और तकरीबन 5 करोड़ की मौत हो गई थी. वैज्ञानिक मानते हैं कि यह बीमारी आज भी किसी न किसी रूप में हमारे बीच हैं. 

अभी जो स्वाइन फ्लू फैल रहा है, उसकी जड़ें भी 1918 के स्पैनिश फ्लू से ही जुड़ी हुई हैं. स्वाइन फ्लू से 2009 में महामारी आई थी. यह पहले जितना खतरनाक तो नहीं रहा, लेकिन दुनियाभर में अब भी फैल रहा है.

यह सारी बातें इसलिए क्योंकि एक बार फिर मौसम बदलने के कारण देश में स्वाइन फ्लू के मामले बढ़ने लगे हैं. अकेले दिल्ली में ही इस साल अब तक इन्फ्लुएंजा-A के 2,300 से ज्यादा मामले आ चुके हैं, जिनमें 1,777 तो H1N1 यानी स्वाइन फ्लू के मामले हैं.

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) का कहना है कि H1N1 का कोई नया स्ट्रेन नहीं मिला है और घबराने की जरूरत नहीं है. न्यूज एजेंसी PTI ने ICMR के सूत्रों के हवाले से बताया है कि अभी जो इन्फ्लुएंजा के स्ट्रेन फैल रहे हैं, उसके लिए वैक्सीन है. 

तो क्या घबराने की बात नहीं है?

स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि इससे घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि H1N1 समेत मौसमी फ्लू ज्यादातर अपने आप ही ठीक हो जाता है. इसके आम लक्षणों में बुखार, खांसी, सिरदर्द और शरीर में दर्द शामिल हैं. ज्यादातर लोग सही देखभाल और आराम से ठीक हो जाते हैं.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी X पर एक पोस्ट कर बताया कि इन्फ्लुएंजा A यानी H1N1 के कारण बुखार, खांसी, गले में खराश, नाक बहना, सिरदर्द, शरीर में दर्द, थकान, जी मिचलाना, उल्टी और दस्त जैसे लक्षण हो सकते हैं. 

स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी कहा कि स्वस्थ लोगों में इन्फ्लुएंजा आमतौर पर अपने आप ठीक हो जाता है. हालांकि, अगर 5-6 दिनों में लक्षणों में सुधार न हो या बच्चे-बुजुर्ग हैं या पहले से कोई बीमारी है तो अपने डॉक्टर से सलाह लें या नजदीकी अस्पताल में जाएं.

फ्लू होने पर वही सब करना चाहिए, जो हमने कोविड के दौर में किया था. स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी सलाह दी है कि फ्लू से संक्रमित होने पर दूसरों के संपर्क में आने से बचें. घर में बच्चे, बुजुर्ग या पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों के करीब जाने में सावधानी बरतें. खांसी या छींक आने पर मुंह और नाक को ढककर रखें. हाथों को बार-बार साबुन से अच्छी तरह धोएं और हैंड सैनेटाइजर का भी इस्तेमाल करते रहें.

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क्यों ये अभी खतरनाक नहीं है?

स्वाइन फ्लू के मामले भले ही बढ़ रहे हों लेकिन वैज्ञानिक इसे अभी खतरनाक नहीं मान रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की पूर्व चीफ साइंटिस्ट और ICMR की पूर्व डीजी डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने कहा कि H1N1 इन्फ्लुएंजा का जाना-पहचाना स्ट्रेन है, न कि कोई नया वायरस.

डॉ. स्वामीनाथन ने न्यूज एजेंसी PTI से कहा, 'ऐसा कोई सबूत नहीं है कि वायरस में कोई बड़ा एंटीजेनिक बदलाव आया है या यह ज्यादा खतरनाक हो गया है.' 

उन्होंने कहा कि अभी जो मामलों में बढ़ोतरी हुई है, वह मौसमी फ्लू के पैटर्न के हिसाब से हो रही है. एम्स के पूर्व डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया ने भी कहा कि दिल्ली में H1N1 के मामले बढ़ रहे हैं लेकिन मानसून जाते ही इसमें कमी आने लगेगी.

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लेकिन हर साल क्यों फैलता है स्वाइन फ्लू?

स्वाइन फ्लू पहली बार 2009 में फैला था. तब यह महामारी बन गया था. इस वायरस से 5 लाख से ज्यादा मौतें हुई थीं. अब भले ही स्वाइन फ्लू उतना जानलेवा न रहा हो लेकिन अब भी यह हर साल फैल रहा है.

आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश में हर साल स्वाइन फ्लू के हजारों मामले आते हैं और कइयों की मौत होती है. नेशनल सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल (NCDC) के मुताबिक, 2019 से 30 सितंबर 2025 के बीच ही देशभर में स्वाइन फ्लू के 77,389 मामले सामने आए थे. इसी दौरान इससे 2,174 लोगों की मौत हुई थी. 

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आंकड़े बताते हैं कि स्वाइन फ्लू की अब तक की सबसे जबरदस्त लहर 2015 में आई थी. उस साल देशभर में 42,592 मामले सामने आए थे और 2,990 लोगों की जान चली गई थी. आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि हर दूसरे साल स्वाइन फ्लू के मामलों में एक बड़ा उछाल आता है. 

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तो ये खत्म क्यों नहीं होता?

इंसान सदियों से फ्लू जैसी बीमारी से जूझ रहा है. इनमें से कुछ महामारियां बनकर आए और लाखों-करोड़ों लोगों की जान लेकर चले गए. 1918 में सबसे खतरनाक 'स्पैनिश फ्लू' फैला था, जिससे 50 करोड़ से ज्यादा लोग संक्रमित हुए थे और 5 करोड़ से ज्यादा की मौत हुई थी. अकेले भारत में तकरीबन 1.7 करोड़ लोगों की जान चली गई थी.

स्पैनिश फ्लू के बाद 1957-58 में एशियन फ्लू या H2N2 वायरस, 1968 में हॉन्कॉन्ग फ्लू या H3N2 वायरस, 2009 में स्वाइन फ्लू या H1N1 और 2020 में कोविड फैला. इस बीच सार्स और मर्स जैसी बीमारियां भी फैलीं, लेकिन इतनी जानलेवा नहीं थी और जल्द ही इन पर काबू पा लिया गया.

जब भी कोई फ्लू फैलता है तो उसमें लक्षण हर बार लगभग एक ही होते हैं. कई बार गंभीर लक्षण हो जाते हैं और जानलेवा हो जाते हैं. 

वैज्ञानिक मानते हैं कि फ्लू कभी खत्म नहीं हो सकता, क्योंकि यह लगातार बदलता रहता है. इन्फ्लुएंजा वायरस में लगातार बदलाव होते रहते हैं, जिसे 'एंटीजेनिक ड्रिफ्ट' कहा जाता है. इससे शरीर में बनी पुरानी इम्युनिटी और कभी-कभी वैक्सीन की सुरक्षा भी कम हो जाती है. इसलिए हर साल नए स्ट्रेन आते रहते हैं और वैक्सीन भी अपडेट करनी पड़ती है.

इसका दूसरा कारण यह है कि इन्फ्लुएंजा वायरस सिर्फ इंसानों में ही नहीं पाया जाता, बल्कि पक्षियों, सुअरों और कई जानवरों में भी पाया जाता है. कभी-कभी दो अलग फ्लू वायरस एक ही जानवर से मिलकर नया वायरस बना लेते हैं. 2009 का स्वाइन फ्लू इसी तरह उभरा था. इसलिए अगर इंसानों से वायरस खत्म भी हो जाए तो वह दोबारा जानवरों से वापस आ सकता है.

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क्या 1918 का दौर खत्म नहीं होगा?

1918 में जो 'स्पैनिश फ्लू' फैला था, 12 महीनों में उसकी तीन लहरें आई थीं. लेकिन क्या तीसरी लहर के बाद यह फ्लू खत्म हो गया? इस बारे में अमेरिकी वायरोलॉजिस्ट जेफरी टॉबेनबर्गर ने history.com से कहा था- 'बिल्कुल नहीं.'

टॉबेनबर्गर ने कहा था कि यह वायरस पूरी दुनिया में फैल गया था और इसके खिलाफ नैचुरल इम्युनिटी बन गई थी, इसलिए 1918 वाले स्ट्रेन में 'एंटीजेनिक ड्रिफ्ट' होने लगा. इसके कई सालों बाद तक इसके कई स्ट्रेन आए लेकिन वे खतरनाक नहीं थे और मौसमी फ्लू जैसे ही थे.

वह कहते हैं, 'आज फैलने वाले मौसमी फ्लू में आप अभी भी 1918 वाले वायरस के जेनेटिक निशान देख सकते हैं. पिछली एक सदी में इंसानों में इन्फ्लुएंजा A का हर संक्रमण 1918 के उसी फ्लू से निकला है.'

टॉबेनबर्गर कहते हैं, 'अगर कोई जानवर एक ही समय में दो अलग-अलग इन्फ्लुएंजा वायरस से संक्रमित हो जाता है - मान लीजिए एक वायरस पक्षी से और दूसरा इंसान से - तो उनके जीन आपस में मिलकर एक बिल्कुल नया वायरस बना सकते हैं जो पहले कभी नहीं देखा गया था.'

ऐसा ही 1957 में हुआ था जब 1918 के फ्लू (जो H1N1 वायरस था) ने एक दूसरे बर्ड फ्लू वायरस के साथ जीन का आदान-प्रदान किया, जिससे H2N2 महामारी फैली और दुनिया भर में दस लाख लोगों की जान चली गई. 1968 में फिर से ऐसा ही हुआ, जब 'हॉन्गकॉन्ग फ्लू' नाम का H3N2 वायरस बना, जिसने और दस लाख लोगों की जान ले ली.

2009 की 'स्वाइन फ्लू' महामारी की कहानी और भी गहरी है. जब इंसान 1918 की महामारी वाले फ्लू से संक्रमित हुए - जो असल में बर्ड फ्लू था - तो हमने इसे सूअरों में भी फैला दिया.

वह कहते हैं, '1918 के फ्लू की एक शाखा हमेशा के लिए सूअरों के शरीर में ढल गई और स्वाइन फ्लू बन गई.' वह 1918 के फ्लू को एक 'जिद्दी वायरस' कहते हैं. टॉबेनबर्गर कहते हैं, 'आज भी हम उसी दौर में जी रहे हैं जिसे मैं '1918 वाली महामारी का दौर' कहूंगा, और मुझे नहीं पता कि यह कब तक चलेगा.'

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