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This Article is From Dec 05, 2025

रिश्ता तय होते समय बायोडाटा में लिखना चाहिए था... तलाक मामले की सुनवाई के दौरान बरेली कोर्ट की अजीब सलाह

कोर्ट का कहना है कि अगर लड़की अपने बायोडाटा में इस बात का जिक्र करती है तो शादी के बाद होने वाले विवाद काफी हद तक कम हो जाएंगे. 

रिश्ता तय होते समय बायोडाटा में लिखना चाहिए था... तलाक मामले की सुनवाई के दौरान बरेली कोर्ट की अजीब सलाह
बरेली:

अगर शादी के बाद किसी लड़की को जॉइंट फैमिली में नहीं रहना और वो सिर्फ अपने पति के साथ ही रहना चाहती है तो उसे रिश्ता तय करते समय ये बात अपने बायोडाटा में लिखना चाहिए. ये सलाह हम नहीं दे रहे हैं बल्कि ऐसा कहना है बरेली के जिला अदालत का. जिला कोर्ट ने एक मामले में तलाक मंजूर करते हुए ये सलाह दी है. कोर्ट का कहना है कि अगर लड़की अपने बायोडाटा में इस बात का जिक्र करती है तो शादी के बाद होने वाले विवाद काफी हद तक कम हो जाएंगे. आपको बता दें कि कोर्ट ने यह सलाह बदायूं के रहने वाले युवक शुभाशीष सिंह और फरीदपुर की रहने वाली शिक्षिका दीक्षा वर्मा के केस में फैसला सुनाते हुए दी है.दोनों की शादी फरवरी 2019 में हुई थी.

शुरू में सब कुछ ठीक था, लेकिन कुछ ही समय गुजरने के बाद  माहौल बिगड़ने लगा. शुभाशीष ने अदालत में बताया कि उनकी पत्नी को उनके माता-पिता के साथ संयुक्त परिवार में रहना पसंद नहीं था. शादी के कुछ दिनों बाद ही वह फोन पर अक्सर मायके वालों से बात करने लगीं  थी और ससुराल के माहौल से दूरी महसूस करने लगीं थी.अक्टूबर 2020 में दीक्षा ससुराल से अलग हो गईं और लगातार अलग ही रहती रहीं. पति ने कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन वह दोबारा परिवार के साथ रहने को तैयार नहीं हुईं.

आखिरकार मामला पारिवारिक विवाद से बढ़कर कोर्ट तक पहुंच गया. दीक्षा ने अपने पति और ससुरालवालों पर कई आरोप लगाए. उनका कहना था कि ससुराल वाले उनके पति की दूसरी शादी कराने की योजना बना रहे थे. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उनके पिता ने शादी में 25 लाख रुपये खर्च किए थे, लेकिन फिर भी उनकी इज्जत नहीं हुई.

बरेली कोर्ट ने इन आरोपों की जांच की और पाया कि युवती के पिता खुद एक निजी कार चलाकर परिवार चलाते हैं और उनके पास बहुत अधिक जमीन या बड़ी आय नहीं है. ऐसे में 25 लाख रुपये खर्च करने वाला दावा सही नहीं पाया गया. इस तरह के आरोपों को अदालत ने तथ्यों के विपरीत और बिना आधार का बताया.सुनवाई के दौरान अपर प्रधान न्यायाधीश ज्ञानेंद्र त्रिपाठी ने समाज की मौजूदा स्थिति पर भी टिप्पणी की. उन्होंने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि इंसान जानता है कि असंख्य लोग रोज मरते हैं, फिर भी वह सोचता है कि वह हमेशा जिएगा. उसी तरह आज लोग अकेलापन चुन रहे हैं, जबकि संयुक्त परिवार अकेलेपन को खत्म करता है और जीवन में सहारा बनता है.

न्यायाधीश ने यह भी कहा कि आजकल कई लोग वृद्धाश्रमों में या बंद फ्लैटों में अकेले जीवन जी रहे हैं. ऐसे में अगर कोई लड़की शादी के बाद केवल पति के साथ रहना चाहती है और परिवार की जिम्मेदारियों से दूर रहना चाहती है, तो इसे शादी से पहले ही साफ-साफ बता देना चाहिए. उन्होंने कहा अगर युवती को ऐसा पति चाहिए जिसके माता-पिता या भाई-बहन की जिम्मेदारी न हो, तो इसे बायोडाटा में स्पष्ट रूप से लिखें, ताकि भविष्य में विवाद न पैदा हों.दोनों पक्षों की बात और परिस्थितियों को समझने के बाद पारिवारिक न्यायालय ने इस विवाह को टूट चुका ही मानते हुए तलाक को स्वीकृति दे दी . अदालत ने कहा कि दोनों लंबे समय से अलग रह रहे हैं और अब साथ रहने की कोई संभावना नहीं बची है. इस प्रकार मामला खत्म हुआ और दोनों को अलग-अलग जीवन जीने की अनुमति दे दी गई.

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