शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई हुई. शिंदे गुट के वकील नीरज किशन कौल ने चुनाव चिह्न धनुष बाण पर अपने दावे के समर्थन में मिले वोट और सीटों के बहुमत पर तर्क रखे. उन्होंने कहा- 13 सांसद और विधायकों, कार्यकर्ताओं और सांगठनिक इकाइयों में भी बहुमत हमारे साथ है.
कौल ने कहा कि शिंदे गुट के विधायकों या सांसदों के खिलाफ चल रही अयोग्यता की कार्यवाही का चुनाव चिह्न विवाद से कोई लेना-देना नहीं है. कौल ने पूछा कि क्या दोनों अंतरिम चुनाव चिन्हों को स्थायी चुनाव चिन्ह के रूप में जारी नहीं रखा जा सकता था? ECI का विचार था कि ऐसा नहीं किया जा सकता.
क्या सभी विकल्पों पर विचार किया गया?
जस्टिस बागची ने कहा- सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग ने किसी प्रासंगिक पहलू को ध्यान में रखा और क्या उस संभावित नतीजे पर विचार किया. हम यह नहीं कह रहे कि इस वजह से ECI का फैसला गलत हो जाएगा. लेकिन, न्यायिक समीक्षा के दृष्टिकोण से यह देखना जरूरी है कि क्या सभी विकल्पों पर विचार किया गया था.
चुनाव आयोग उच्च संवैधानिक संस्था है
वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने कहा- सिर्फ विधायी बहुमत हमेशा उचित कसौटी नहीं हो सकता, खासकर तब जब अयोग्यता की कार्यवाही लंबित हो. लेकिन, चुनाव आयोग एक उच्च संवैधानिक संस्था है, अगर सभी उपलब्ध कसौटियों पर विचार करने के बाद आयोग यह निष्कर्ष निकालता है कि विशेष परिस्थितियों में अन्य कसौटियां लागू नहीं हो सकतीं, तो वह व्यावहारिक कसौटी अपना सकता है.
इस मामले में संगठनात्मक ढांचा बड़े पैमाने पर नामित सदस्यों से बना था और यह पार्टी या उसके कैडर की आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित नहीं करता था. कैडर की संख्या इतनी अधिक थी कि प्रत्येक सदस्य को आयोग के समक्ष लाना संभव नहीं था. निर्वाचित प्रतिनिधि भी बंटे हुए थे और उनमें से कुछ के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही लंबित थी. इसलिए तीनों कसौटियों की अपनी सीमाएं थीं.
दोनों गुटों को चिन्ह का लाभ नहीं देते
जस्टिस जॉयमाल्य बागची- अगर, तीनों कसौटियों की सीमाएं थीं तो एक और विकल्प उपलब्ध था. दोनों गुटों को आरक्षित चुनाव चिन्ह का लाभ देने की जरूरत नहीं थी. दोनों को अलग-अलग चुनाव चिन्ह चुनकर अपने दम पर चुनाव लड़ने के लिए कहा जा सकता था. बालासाहेब के नाम और विरासत के आधार पर नहीं.
'असली पार्टी कौन सी है'
कौल ने दलील दी कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत पार्टी का पंजीकरण, चुनाव चिन्ह आदेश के तहत पार्टी की मान्यता से भिन्न है. सादिक अली के फैसले में यह स्वीकार किया गया है कि चुनाव चिन्ह आदेश के तहत पार्टी को मान्यता मिलना आवश्यक है, ताकि मतदाताओं के मन में चुनाव चिन्ह के जरिए पार्टी की पहचान बनी रहे. सामान्यतः चुनाव आयोग को यह तय करने के लिए कि 'असली पार्टी कौन सी है', केवल एक ही टेस्ट तक सीमित नहीं रहना चाहिए, लेकिन अदालत ने यह मामला चुनाव आयोग के विवेक पर छोड़ दिया है. विधायिका में दल की संख्या को मापदंड माना जाए या नहीं, यह चुनाव आयोग पर निर्भर करता है.
क्या चुनाव आयोग ने अपने विवेक का उचित प्रयोग किया?
जस्टिस बागची ने कहा- हमारा प्रश्न है कि क्या चुनाव आयोग ने इस मामले में अपने विवेक का उचित प्रयोग किया? न्यायिक समीक्षा के दौरान जब विवेक की जांच की जाती है, तो हम यह सवाल करते हैं कि क्या विवेक का इस्तेमाल सही तरीके से किया गया था? क्या कोई दूसरा विचार या विकल्प संभव था? क्या सभी विकल्पों पर विचार किया गया था? अब चुनाव आयोग यह कह सकता है कि अस्थायी चुनाव चिन्ह देने के विकल्प को किसी भी कारण से नहीं चुना गया.
आयोग शायद किसी कठिन स्थिति से सर्वोत्तम रास्ता निकालने की कोशिश कर रहा था. वे शिवसेना के सभी कार्यकर्ताओं के जनमत संग्रह में जाने में सक्षम नहीं रहे होंगे. यह एक ऐसा मामला है जहां लोकतांत्रिक क्षमता को खुद पार्टी कार्यकर्ताओं की आकांक्षाओं का मापदंड माना गया है. अयोग्यता की कार्यवाही लंबित होने के बावजूद चुनाव आयोग ने 'विधायी बहुमत मापदंड' को चुनने का कारण स्पष्ट नहीं किया है".
'पार्टी का संरक्षण' अधिक महत्वपूर्ण हो गया
10वीं अनुसूची में स्थित दलबदल विरोधी कानून लागू होने के बाद व्यक्तिगत उम्मीदवारों की तुलना में 'पार्टी का संरक्षण' अधिक महत्वपूर्ण हो गया है. जब 10वीं अनुसूची प्रभावी है, तब यह सवाल उठता है कि जब आपने पार्टी से अलग होने का विकल्प चुना है, तो क्या पार्टी की नीति से असंतोष या पहचान बनी रहती है?
जांच की आवश्यकता होगी
जस्टिस बागची- जब सुभाष देसाई फैसला यह कहता है कि पार्टी अध्यक्ष सचेतक नियुक्त करता है और फैसला यह स्पष्ट करता है कि सचेतक पार्टी का होता है न कि विधायकों का, ऐसी स्थिति में अपना खुद का सचेतक नियुक्त करने का कार्य क्या अयोग्यता तय करने में एक कारक नहीं होगा? अयोग्यता याचिका पर विचार करते समय इन मुद्दों पर ध्यान देना होगा.
जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि संवैधानिक मूल्यों के संरक्षक के रूप में चुनाव आयोग को यह ध्यान में रखते हुए अपना निर्णय लेना होगा ताकि 10वीं अनुसूची का मूल दर्शन भी प्रभावित न हो. क्योंकि आपने यह मापदंड तब अपनाया जब 10वीं अनुसूची पहले ही लागू है, ऐसी स्थिति में 'विधायिका दल मापदंड' को लागू करने के लिए अत्यंत सख्त और उच्च स्तरीय जांच की आवश्यकता होगी.
चुनाव आयोग का फैसला अनुमान पर
वकील कौल ने दलील दी कि केवल जीती गई सीटों पर ही नहीं, बल्कि मिले कुल वोटों पर भी विचार किया गया था. इस पर जस्टिस बागची ने फिर पूछा लेकिन वे वोट तो अविभाजित शिवसेना के लिए मिले थे, जब पार्टी में विभाजन होता है, तो आप यह नहीं जान सकते कि मतदाता ने पार्टी को वोट दिया था या उम्मीदवार को. आज स्थिति यह है कि एक तरफ मतदाता हैं और दूसरी तरफ विभाजित और खंडित पार्टी. ऐसे में यह अनुमान ही लगा सकते हैं कि विभाजन के बाद मतदाता अब भी उस उम्मीदवार को वोट देगा या उस पार्टी को. चुनाव आयोग ने अपना फैसला इस अनुमान पर आधारित किया है कि वोट उम्मीदवार के लिए ही पड़े थे.
इंग्लैंड में कोई भी उम्मीदवार बदल सकता है पार्टी
चुनाव आयोग के पास उपलब्ध विकल्प
वकील कौल- सुभाष देसाई मामले में कसौटियों को लेकर दी गई टिप्पणियां चुनाव चिन्ह आदेश के तहत चुनाव आयोग के लिए कोई बाध्यकारी निर्देश नहीं हैं, यदि सुभाष देसाई फैसला अयोग्यता की कार्यवाही लंबित होने के बावजूद विधायी बहुमत के मापदंड को खुला छोड़ता है, तो इस मापदंड को न तो कमजोर किया जा सकता है और न ही इसे अलग करके देखा जा सकता है. यह चुनाव आयोग के पास एक उपलब्ध विकल्प है".
22 सितंबर को होगी सुनवाई
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि क्या सुभाष देसाई फैसले के वे अनुच्छेद केवल 10वीं अनुसूची से संबंधित हैं? क्या देसाई फैसले ने उन तर्कों को खारिज कर दिया था कि अयोग्यता की कार्यवाही लंबित होने पर भी चुनाव आयोग अपनी कार्यवाही जारी रख सकता है? सुप्रीम कोर्ट में लंबी चली बहस के बाद अब मामले की सुनवाई मंगलवार 22 सितंबर को होगी.
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