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'घूस की रकम मिली लेकिन...', 4 साल सजा काट चुका कर्मचारी सुप्रीम कोर्ट से बरी; 16 साल से चल रहा था केस

रिश्वत लेने के मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद 4 साल की सजा काटने वाले सरकारी कर्मचारी को अब सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी को घूस लेने के आरोपों से बरी कर दिया है.

'घूस की रकम मिली लेकिन...', 4 साल सजा काट चुका कर्मचारी सुप्रीम कोर्ट से बरी; 16 साल से चल रहा था केस
सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी कर्मचारी को घूस के आरोपों से बरी कर दिया है.
IANS
नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने 16 साल पुराने रिश्वत मामले में एक सरकारी कर्मचारी को बड़ी राहत देते हुए उसकी सजा रद्द कर दी है. खास बात यह है कि कर्मचारी अजित कुमार चार साल की जेल की सजा पहले ही पूरी कर चुका था. इसके बावजूद उसने अपना नाम साफ कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील जारी रखी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार करने का तथ्य साबित होना जरूरी है. केवल कथित रिश्वत की रकम बरामद हो जाना दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकता.

जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने अजित कुमार की अपील मंजूर करते हुए झारखंड की विशेष अदालत और झारखंड हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया. कोर्ट ने घोषित किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 13 के तहत अजित कुमार के खिलाफ आरोप साबित नहीं हुए.

क्या था पूरा मामला?

अजित कुमार सरायकेला के जिला शिक्षा कार्यालय में सहायक के पद पर तैनात था. अभियोजन के मुताबिक, सरकारी हाई स्कूल में चपरासी के तौर पर नियुक्त दुर्गापद सिंह मुंडा का वेतन जारी नहीं हुआ था. आरोप था कि वेतन जारी कराने के लिए अजित कुमार ने उससे 5,000 रुपये रिश्वत की मांग की.

शिकायतकर्ता ने 19 अप्रैल 2010 को विजिलेंस ब्यूरो में शिकायत की. इसके बाद 20 मई 2010 को ट्रैप कार्रवाई की गई.

अभियोजन के अनुसार, केमिकल लगे 5,000 रुपये शिकायतकर्ता ने आरोपी को दिए और बाद में यह रकम आरोपी के घर से बरामद हुई. आरोपी के हाथों को घोल में डुबोने पर घोल के गुलाबी होने की बात भी सामने आई.

विशेष अदालत ने फरवरी 2021 में अजित कुमार को धारा 7 और 13(2) के तहत दोषी ठहराया था और चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी. झारखंड हाई कोर्ट ने जुलाई 2022 में दोषसिद्धि बरकरार रखा. 

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‘किसी ने रिश्वत मांगते या लेते नहीं देखा'

सुप्रीम कोर्ट ने गवाहों के बयानों की पड़ताल करते हुए पाया कि किसी भी गवाह ने अजित कुमार को रिश्वत मांगते या शिकायतकर्ता से 5,000 रुपये लेते हुए नहीं देखा था. 

कोर्ट ने कहा कि ट्रैप के दौरान शिकायतकर्ता और आरोपी कार्यालय से निकलकर आरोपी के घर गए थे. बाद में दोनों कार्यालय लौटे. अभियोजन के गवाहों के बयानों में इस बात को लेकर भी विरोधाभास था कि आरोपी को उसके घर से पकड़ा गया या कार्यालय लौटने के बाद गिरफ्तार किया गया. 

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि कुछ गवाहों ने स्वीकार किया कि उन्होंने विजिलेंस अधिकारियों के कहने पर जब्ती से संबंधित दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए थे. 

सुप्रीम कोर्ट ने पहले के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 13 के तहत अपराध साबित करने के लिए रिश्वत की मांग का प्रमाण sine qua non यानी अनिवार्य शर्त है.

बेंच ने कहा कि रिश्वत की मांग साबित करने में अभियोजन की विफलता घातक है और आरोपी से कथित रिश्वत की रकम बरामद होना अपने आप में दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है.

कोर्ट ने संविधान बेंच के एक फैसले का भी हवाला दिया. इसमें साफ किया गया था कि अभियोजन को सरकारी कर्मचारी द्वारा रिश्वत की मांग और उसके बाद स्वीकार किए जाने, दोनों को तथ्य के रूप में साबित करना होगा.

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सजा पूरी होने के बाद भी जारी रखी कानूनी लड़ाई

इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि जब 24 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया, तब अजित कुमार के वकील ने अदालत को बताया कि वह अपनी जेल की सजा और जुर्माना पहले ही भुगत चुका है, लेकिन अपना नाम साफ कराने के लिए वह अपील जारी रखना चाहता है.

23 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने अपील पर सुनवाई की और फैसला सुरक्षित रखा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग और स्वीकार किए जाने को तथ्य के रूप में साबित नहीं कर पाया. लिहाजा यह नहीं कहा जा सकता कि अजित कुमार के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित हुए हैं.

बेंच ने विशेष अदालत और हाई कोर्ट के फैसले रद्द करते हुए अजित कुमार को धारा 7 और 13 के आरोपों से बरी कर दिया और अपील मंजूर कर ली.

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