- असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को पिछली बार की तुलना में दस सीटों का नुकसान हुआ और केवल इक्कीस सीटें मिलीं
- कांग्रेस नेतृत्व संकट, आंतरिक कलह और गठबंधन में असमंजस के कारण पार्टी का मनोबल कमजोर और प्रदर्शन प्रभावित हुआ
- बीजेपी ने विकास, अस्मिता और घुसपैठ विरोधी नारों के माध्यम से असम के विभिन्न वर्गों में मजबूत आधार बनाया
Assam Election Result: असम में कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई भी अपनी सीट नहीं बचा पाए. पार्टी का प्रदर्शन पिछली बार से भी खराब रहा है. असम में बीजेपी की हैट्रिक के लिए कहीं न कहीं कांग्रेस भी जिम्मेदार है. कांग्रेस इस चुनाव में छह दलों के विपक्षी गठबंधन के साथ मैदान में बीजेपी के सामने उतरी थी. ऐसे में उम्मीद की जा रही थी कि हिमंता बिस्वा सरमा को कड़ी टक्कर मिलेगी. लेकिन कांग्रेस के गठबंधन का 'रायजोर पार्टी' ही एकमात्र अन्य दल रहा, जो अपना खाता खोल पाने में सफल रहा और उसे दो सीट पर जीत हासिल हुई. कांग्रेस से आखिर असम में कहां चूक हुई...? असम में मिली हार से कांग्रेस पार्टी को क्या संदेश मिला है?
कांग्रेस का पिछली बार से भी खराब प्रदर्शन
असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सिर्फ 21 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की झोली में 31 सीटें आई थीं यानि इस बार 10 सीटों का नुकसान हुआ है. वहीं, बीजेपी को 102 सीटों पर जीत मिली है, जो पिछली बार से 29 सीट ज्यादा है. गौरव गोगोई ने पार्टी की हार स्वीकार करते हुए कहा, "सभी विजयी उम्मीदवारों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं. आशा है कि वे जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे और राज्य की प्रगति, शांति व समृद्धि के लिए काम करेंगे." गोगोई ने कहा कि कांग्रेस अपनी हार के कारणों का विश्लेषण करेगी और मजबूत टीम के साथ जनता के बीच वापस आएगी. अपनी हार पर उन्होंने कहा, "मैं विनम्रतापूर्वक जनता के फैसले को स्वीकार करता हूं."

कांग्रेस की हार के कारण
नेतृत्व का संकट और गुटबाजी: कांग्रेस में भूपेन बोरा और प्रद्युति बोरदोलोई जैसे बड़े नेताओं का पार्टी छोड़ना या आंतरिक कलह ने कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ा. गौरव गोगोई ने पूरी ताकत झोंकी, लेकिन वे संगठन की दरारों को नहीं भर पाए. इसका परिणाम ये हुआ कि बीजेपी को इसका फायदा पहुंचा. अगर कांग्रेस और उनके साथी दल अनुशासन दिखाते, तो असम में तस्वीर आज कुछ ओर हो सकती थी.
क्लीयर नैरेटिव की कमी: असम में बीजेपी ने जहां 'विकास और अस्मिता' को अपना मुद्दा बनाया. वहीं, कांग्रेस का अभियान मुख्य रूप से महंगाई और बेरोजगारी पर केंद्रित रहा, लेकिन जनता के बीच वह बीजेपी के 'कल्याणकारी मॉडल' का कोई ठोस विकल्प पेश नहीं कर पाई. दरअसल, महंगाई और बेरोजगारी का मुद्दा हरियाणा और बिहार जैसे राज्यों में फेल हो चुके हैं. ऐसे में असम के लिए कांग्रेस को अपना अटैक का स्टाइल और मुद्दा बदलना चाहिए था, जो उसने नहीं किया. इसका खामियाजा गौरव गोगोई को उठाना पड़ा.
गठबंधन का असमंजस: असम में कांग्रेस कभी AIUDF के साथ जाती है, तो कभी उन्हें कोसती है. इस "दुविधा" के कारण असमिया हिंदू मतदाता कांग्रेस से छिटक गए है. असम के वोटर्स को लगा कि कांग्रेस अभी भी घुसपैठ का समर्थन करने वाली ताकतों के करीब है. असम चुनाव में ये एक बड़ा मुद्दा साबित हुआ है.
विकल्प की कमी: कांग्रेस ने भ्रष्टाचार और बेरोजगारी पर सरकार को घेरा, लेकिन जनता को यह विश्वास नहीं दिला पाई कि उनके पास बीजेपी से बेहतर 'मैकेनिज्म' क्या है. वे केवल 'विरोध' की राजनीति तक सीमित रह गए. एक ठोस रोडमैप पेश करने में कांग्रेस सफल नहीं हो पाई, ऐसे में वोटर्स में वो विश्वास नहीं जागा, जो वोटों में तब्दील हो पाता.
पंजे के लिए क्या संदेश
असम में कांग्रेस को बहुत मेहनत करने की जरूरत है. इसकी शुरुआत जिनती जल्दी हो जाए, उतना अच्छा है. सबसे पहले एक फायर ब्रांच नेता कांग्रेस को असम में खड़ा करना पड़ेगा, जो हिमंता को टक्कर दे सके. ऐसा नेता, जो शुरुआत से हिमंता की छोटी से छोटी कमी को जनता के सामने रख सके. असम में पार्टी को अकेले मजबूत संगठन खड़ा करना पड़ेगा, दूसरे के सहारे चलने से बचना चाहिए. असम में कांग्रेस को गंभीर मुद्दों को लेकर आगे बढ़ना होगा. गौरव गोगोई को हार की समीक्षा करने के बाद तुरंत काम में जुट जाना चाहिए, तभी अगले चुनाव में जीत का आधार बन पाएगा.

बीजेपी की जीत के कारण
- असम में बीजेपी ने सिर्फ चुनाव नहीं लड़ा, बल्कि समाज के हर वर्ग तक अपनी पैठ बनाई है. 'अरुणोदय' योजना के तहत लगभग 25-30 लाख महिलाओं को मिलने वाली मासिक वित्तीय सहायता ने भाजपा के लिए एक वफादार महिला वोट बैंक तैयार किया है. ग्रामीण इलाकों में महिलाओं ने जाति-धर्म से ऊपर उठकर भाजपा को वोट दिया.
- असम की लगभग 40-45 सीटों पर चाय बागान श्रमिकों (Tea Tribes) का प्रभाव है. पहले यह कांग्रेस का गढ़ था, लेकिन भाजपा ने उनकी मजदूरी बढ़ाने और उन्हें पक्के घर, बिजली व स्वास्थ्य सुविधाएं देकर इस गढ़ को पूरी तरह ढहा दिया.
- हिमंत बिस्वा सरमा ने खुद को असमिया हितों के सबसे बड़े संरक्षक के रूप में स्थापित किया है. मदरसों को सामान्य स्कूलों में बदलना, अवैध अतिक्रमण हटाना और 'मियां' राजनीति के खिलाफ कड़ा रुख अपनाना. इन कदमों ने हिंदू मतदाताओं (चाहे वो असमिया भाषी हों या बंगाली भाषी) को एकजुट कर दिया.
- सरकार द्वारा संदिग्ध क्षेत्रों से अतिक्रमण हटाने और सरकारी जमीनों को 'कब्जामुक्त' कराने की कार्रवाई को जनता ने घुसपैठ के खिलाफ एक ठोस कदम के रूप में देखा.
- भाजपा ने घुसपैठ को केवल कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि असमिया संस्कृति और 'स्वदेशी' (Indigenous) लोगों के अस्तित्व पर खतरे के रूप में पेश किया, जिससे स्थानीय लोग एकजुट हुए. 'मियां' राजनीति और घुसपैठियों के खिलाफ आक्रामक बयानों ने मतदाताओं के बीच एक स्पष्ट विभाजन पैदा किया, जिसका सीधा चुनावी लाभ भाजपा को मिला. भाजपा ने यह नैरेटिव सेट करने में सफलता पाई कि कांग्रेस का 'वोट बैंक' ही घुसपैठिए हैं, जिससे आम मतदाता के मन में कांग्रेस के प्रति अविश्वास पैदा हुआ.
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कुल नतीजों से भाजपा के पक्ष में एक निर्णायक जनादेश सामने आया, जिसने विधानसभा की 126 सीटों में से 82 सीटें जीतीं. कांग्रेस 19 सीटों के साथ पीछे रही, जबकि बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) और असम गण परिषद (एजीपी) जैसी क्षेत्रीय पार्टियों ने 10-10 सीटें हासिल कीं. ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) और रायजोर दल ने दो-दो सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की, जबकि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (एआईटीसी) ने एक सीट जीतकर अपना खाता खोला. इस शानदार जीत के साथ भाजपा असम में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के लिए तैयार है, जिससे इस पूर्वोत्तर राज्य में उसका दबदबा और मज़बूत हुआ है और विपक्ष को एक बड़ा झटका लगा है.
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