- UGC के नए नियमों के खिलाफ सवर्ण समाज और छात्र संगठनों ने व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं.
- वाराणसी में प्रदर्शनकारियों ने कानून वापस न लेने पर आगामी चुनावों में भाजपा को नुकसान पहुंचाने की चेतावनी दी.
- करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने अर्धनग्न होकर प्रदर्शन किया और राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन बढ़ाने की योजना बनाई है.
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की ओर से हाल ही में अधिसूचित 'उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता का संवर्द्धन विनियम, 2026' ने देश की राजनीति और शैक्षणिक गलियारों में एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है. 13 जनवरी को लागू हुए इन नियमों के खिलाफ सवर्ण समाज और विभिन्न छात्र संगठनों ने 'आर-पार' की जंग छेड़ दी है. PM मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से लेकर देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर तक विरोध प्रदर्शनों की तस्वीरें सामने आई है.
'27 में भगाएंगे, 29 में लोकसभा से हटाएंगे'
बाबा विश्वनाथ की नगरी वाराणसी में प्रदर्शनकारियों का गुस्सा सातवें आसमान पर है. यहां प्रदर्शन कर रहे सवर्ण समाज के नेताओं ने सरकार को खुली चेतावनी देते हुए कहा कि अब तक तो उन्होंने बहुत कुछ सहा. लेकिन अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है. प्रदर्शनकारियों ने यूजीसी के इन नियमों को 'काला कानून' करार देते हुए संकल्प लिया कि यदि इसे वापस नहीं लिया गया, तो 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ेगा. प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि यह कानून सवर्णों के खिलाफ अत्याचार को बढ़ावा देने वाला है और वे इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे.
करणी सेना का उग्र प्रदर्शन: अर्धनग्न होकर सड़कों पर उतरे कार्यकर्ता
विरोध की आग सिर्फ वाराणसी तक सीमित नहीं है. करणी सेना ने भी इस आंदोलन में पूरी ताकत झोंक दी है. कई जगहों पर करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने कपड़े उतारकर अर्धनग्न अवस्था में प्रदर्शन किया. उनके नेताओं का कहना है कि यह कानून सामान्य वर्ग के बच्चों के भविष्य को बर्बाद कर देगा. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जरूरत पड़ी तो वे अपनी जान देने से भी पीछे नहीं हटेंगे. उनका अगला पड़ाव दिल्ली का जंतर-मंतर है, जहां वे इसे राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन बनाने की तैयारी कर रहे हैं.
क्या है विवाद की जड़?
यूजीसी के नए नियमों के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए 'इक्विटी कमेटी', 'इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर' और 24/7 हेल्पलाइन बनाना अनिवार्य कर दिया गया है.
- सवर्ण समाज का आरोप: प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इन नियमों में केवल SC, ST और OBC छात्रों को ही सुरक्षा दी गई है, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों को 'नेचुरल ऑफेंडर' (संभावित अपराधी) के रूप में देखा जा रहा है.
- झूठे मामलों का डर: प्रदर्शनकारियों को डर है कि इन नियमों का गलत इस्तेमाल कर सवर्ण छात्रों को झूठे मामलों में फंसाया जाएगा, जिससे उनका करियर तबाह हो सकता है.
सवालों से बचते नजर आए मंत्री नित्यानंद राय
जैसे-जैसे बवाल बढ़ रहा है, सरकार के मंत्रियों की घेराबंदी भी तेज हो गई है. हाल ही में बिहार के हाजीपुर में जब मीडियाकर्मियों ने केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय से यूजीसी नियमों पर सवर्ण समाज के आक्रोश को लेकर सवाल पूछा, तो वे काफी असहज नजर आए. मंत्री जी ने सीधे जवाब देने के बजाय 'हर-हर महादेव' और 'भारत माता की जय' के नारे लगाकर सवाल को टालने की कोशिश की. उनके इस रुख ने प्रदर्शनकारियों के गुस्से को और हवा दे दी है.
इस्तीफों का दौर और कानूनी लड़ाई
इस विवाद का असर प्रशासनिक स्तर पर भी दिख रहा है. बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इन नियमों के विरोध में अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. वहीं, सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) भी दायर की गई है, जिसमें इन नियमों को भेदभावपूर्ण बताते हुए चुनौती दी गई है.
कुल मिलाकर, यूजीसी के इन नए नियमों ने समाज को दो ध्रुवों में बांट दिया है. एक तरफ सरकार इसे शैक्षणिक संस्थानों में समानता लाने वाला कदम बता रही है, वहीं दूसरी तरफ सवर्ण संगठनों ने इसे अस्तित्व की लड़ाई बना लिया है.
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