हिंदी सिनेमा की वह आवाज, जिसमें फकीरी भी है और रोमांस भी. जिसमें अल्हड़पन भी है और संजीदगी भी. मस्ती भी है और दर्द भी. लेकिन सवाल यह है कि वह कौन-सा दर्द है जिसने अपने करियर की ऊंचाई पर पहुंचकर, सिनेमा के सुरों से दूरी बना लेने का फैसला करवाया?
जिंदगी के संगीत में वह कौन-सा मोड़ आया, जहां से फिल्मों में आवाज देने से पीछे हटने का मन बना? इस सवाल का जवाब शायद बहुत से लोगों को समझ न आए, लेकिन जो लोग अरिजीत सिंह को जानते हैं, उनके लिए यह फैसला कोई बहुत बड़ी हैरानी नहीं है.
शुरुआत से शिखर तक का सफर
अरिजीत सिंह के इस निर्णय को समझने के लिए उनके करियर पर एक नजर डालना जरूरी है.
उन्होंने पहली बार प्लेबैक सिंगिंग 2010 में रिलीज तेलुगु फिल्म ‘केडी' से की. बॉलीवुड में उनकी आवाज पहली बार ‘मर्डर 2' में सुनाई दी.
तब से लेकर अब तक—फिल्मों और उनके सिंगल्स को मिलाकर—अरिजीत 800 से ज्यादा गानों को अपनी आवाज़ दे चुके हैं. यानी औसतन हर साल करीब 53 से ज्यादा गाने. इतना ही नहीं, वह कई फिल्मों में संगीत भी दे चुके हैं.
इसके अलावा देश-विदेश में लगातार लाइव शोज और टूर—यानी अगर बीते डेढ़ दशक को देखा जाए तो शायद ही कोई ऐसा साल रहा हो जब संगीत प्रेमियों को अरिजीत की आवाज सुनने को न मिली हो.
यही वजह है कि आज के दौर में उन्होंने संगीत की दुनिया में वह मुकाम बनाया, जो कभी किशोर कुमार, मोहम्मद रफी और सोनू निगम जैसे गायकों की पहचान रहा है. आज जब रियलिटी शोज और अलग-अलग मंचों से आए गायकों के बीच अपनी पहचान बनाना मुश्किल हो गया है, वहां अरिजीत ने अपनी आवाज को लोगों की जहन में दर्ज करा दिया.
फकीरी आवाज में भी, शख्सियत में भी
शुरुआत में जिस शब्द का इस्तेमाल किया गया—फकीरी—वह सिर्फ अरिजीत की गायकी तक सीमित नहीं है. उनकी शख्सियत में भी वही सादगी और वैराग्य साफ झलकता है. मुंबई की चमक-दमक से दूर, पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में जन्मे अरिजीत के सुर वहीं पले-बढ़े और फिर मुंबई होते हुए पूरी दुनिया में गूंजे. न उन्हें मुंबई की पार्टियों में दिलचस्पी रही और न ही मीडिया इंटरव्यूज में.
अपनी ही धुन में मग्न अरिजीत ज्यादातर अपने मुर्शिदाबाद स्थित स्टूडियो में ही गाने रिकॉर्ड करते रहे. जरूरत पड़ने पर ही मुंबई आना—या फिर शोज और टूर के लिए बाहर निकलना—यही उनकी दुनिया रही. उनके करीबी बताते हैं कि अरिजीत ने अपने करियर का शिखर भी देखा, शोहरत भी और पैसा भी. लेकिन लगातार 15 साल तक इतना काम करने के बाद, कोई भी कलाकार भीतर से थक सकता है.
जब फिल्मी संगीत बंधन बन जाए
फिल्मों के गानों में कई तरह के बंधन होते हैं, निर्माता, निर्देशक, कहानी और बाजार की मांग. कई बार ये सीमाएं कलाकार को उसकी मर्जी का काम करने नहीं देतीं. और फिर एक वक्त आता है, जब कलाकार इन बंधनों को तोड़कर सिर्फ अपने लिए गुनगुनाना चाहता है, अपने मन के सुरों में. अरिजीत के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ.
उन्होंने संगीत से संन्यास नहीं लिया है, बल्कि फिल्मों से दूरी बनाने का फैसला किया है ताकि वह अपने मन के मुताबिक संगीत रच सकें और वह सब कर सकें जो सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है.
अरिजीत सिंह का बयान
अपने सोशल मीडिया पोस्ट में अरिजीत सिंह ने लिखा:
“सभी को नववर्ष की शुभकामनाएं
पिछले इतने सालों में श्रोताओं के तौर पर आपने मुझे जो प्यार दिया है, उसके लिए मैं आप सभी का दिल से धन्यवाद करता हूं.
मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि अब मैं आगे से प्लेबैक सिंगर के तौर पर कोई नया काम स्वीकार नहीं करूंगा.
मैं यहीं इस सफर को विराम दे रहा हूं. यह एक बेहद खूबसूरत यात्रा रही है.”
गूंज बनी रहेगी, मगर एक खालीपन के साथ
डेढ़ दशक तक सिनेमाघरों और रेडियो से गूंजती रही यह आवाज श्रोताओं के दिलों में हमेशा जिंदा रहेगी. लेकिन साथ ही एक खालीपन भी छोड़ जाएगी कि फिल्मों की दुनिया में चमक और रंग तो होंगे, मगर अरिजीत सिंह की आवाज का रंग अब वहां नजर नहीं आएगा.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं