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आधी रात को ट्रक का ताला तोड़कर कब्जा नहीं ले सकता फाइनेंसर; सुप्रीम कोर्ट ने फाइनेंस कंपनियों को लगाई फटकार

अगर आपने वाहन लोन लिया है तो सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण है. अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि फाइनेंस कंपनियां कर्ज वसूली के नाम पर रात में वाहन का ताला तोड़कर उसे जब्त नहीं कर सकतीं.

आधी रात को ट्रक का ताला तोड़कर कब्जा नहीं ले सकता फाइनेंसर; सुप्रीम कोर्ट ने फाइनेंस कंपनियों को लगाई फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने फाइनेंस कंपनियों को लगाई फटकार, आधी रात को वाहन जब्ती गैरकानूनी
NDTV
नई दिल्ली:

देश की सर्वोच्च अदालत ने कर्ज वसूली के मामलों में वित्तीय कंपनियों की कार्रवाई की सीमा स्पष्ट करते हुए अहम टिप्पणी की है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऋणदाता संस्था को हाइपोथिकेट किए गए वाहन को कब्जे में लेने का अधिकार हो सकता है, लेकिन वह कानून हाथ में लेकर यह कार्रवाई नहीं कर सकती. अदालत ने एक ट्रक मालिक के मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि बिना नोटिस, बिना उचित प्रक्रिया और आधी रात को वाहन का ताला तोड़कर उसे ले जाना पूरी तरह गलत है. कोर्ट ने संबंधित वित्तीय कंपनी को मुआवजा देने और बिक्री राशि लौटाने का भी आदेश दिया.

2019 के वाहन लोन से जुड़ा है मामला

मामला एक व्यावसायिक ट्रक के लिए वर्ष 2019 में लिए गए लोन से जुड़ा है. ट्रक मालिक ने एक वित्तीय कंपनी से वाहन खरीदने के लिए ऋण लिया था. बाद में जून 2021 में उसे अतिरिक्त ऋण भी दिया गया. रिकॉर्ड के अनुसार, किस्तों के भुगतान में चूक होने पर कंपनी ने वर्ष 2022 में ट्रक को अपने कब्जे में ले लिया था. हालांकि कुछ भुगतान होने के बाद वाहन वापस कर दिया गया, लेकिन इसके बाद भी भुगतान में अनियमितता जारी रही और कंपनी की ओर से नोटिस जारी किए गए.

रात एक बजे ट्रक का लॉक तोड़कर ले गए

अदालत के समक्ष रखे गए तथ्यों के अनुसार, 9 अप्रैल 2023 को रात करीब एक बजे चार अज्ञात लोग उस स्थान पर पहुंचे जहां ट्रक खड़ा था. बताया गया कि सीसीटीवी निगरानी वाले क्षेत्र में खड़े ट्रक का स्टीयरिंग लॉक तोड़ा गया और वाहन वहां से ले जाया गया. ट्रक मालिक ने उसी दिन इलेक्ट्रॉनिक रिपोर्ट दर्ज कराई और बाद में पुलिस अधीक्षक से भी शिकायत की. बाद में उसे कानूनी नोटिस के माध्यम से जानकारी मिली कि वित्तीय कंपनी ट्रक को अपने कब्जे में लेकर बेच चुकी है. वाहन बेचने के बाद भी कंपनी ने उस पर अतिरिक्त बकाया राशि होने की बात कही.

हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत

ट्रक मालिक ने मामले को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया था, लेकिन उसकी याचिका खारिज कर दी गई. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने पूरे प्रकरण की सुनवाई की और हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने RBI दिशा-निर्देशों का किया उल्लेख

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी निष्पक्ष वसूली प्रक्रिया संबंधी दिशा-निर्देशों का उल्लेख किया. अदालत ने कहा कि ऋणदाताओं को कर्ज वसूली के लिए किसी भी प्रकार के उत्पीड़न, देर रात संपर्क करने या बाहुबल का सहारा नहीं लेना चाहिए. कानून व्यवस्था वाले देश में वसूली और कब्जे की प्रक्रिया केवल कानूनी माध्यम से ही की जा सकती है. पीठ ने दोहराया कि भारत में कानून का शासन है और कोई भी संस्था स्वयं कानून हाथ में नहीं ले सकती.

कब्जा लेने की प्रक्रिया स्पष्ट होना जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऋण समझौते में वाहन वापस लेने का प्रावधान भारतीय संविदा अधिनियम और कानूनी मानकों के अनुरूप होना चाहिए. अदालत के मुताबिक किसी भी एग्रीमेंट में ये प्रावधान स्पष्ट होने चाहिए:

  • कब्जा लेने से पहले नोटिस की अवधि
  • वाहन कब्जे की प्रक्रिया
  • बिक्री या नीलामी का तरीका
  • वाहन बेचने से पहले बकाया भुगतान का अंतिम अवसर
  • ऋणदाता और कर्जदार के अधिकारों की स्पष्टता

कोर्ट ने कहा कि इन प्रक्रियाओं का उद्देश्य कर्जदार को उचित अवसर देना है.

लोन एग्रीमेंट की धारा पर उठाए सवाल

मामले में ऋण समझौते की धारा 11 पर भी अदालत ने गंभीर टिप्पणी की. इस धारा में कहा गया था कि भुगतान में चूक होने पर बिना किसी नोटिस के कर्जदार का वाहन पर अधिकार समाप्त हो जाएगा. वहीं दूसरी ओर समझौते में सात दिन का नोटिस देने का प्रावधान भी मौजूद था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रावधान वित्तीय कंपनी को एकतरफा अधिकार देता है और निष्पक्षता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता. अदालत ने माना कि ट्रक मालिक को वाहन कब्जे में लेने से पहले आवश्यक सात दिन का नोटिस नहीं दिया गया था, इसलिए कंपनी को वाहन जब्त करने का वैध अधिकार प्राप्त नहीं हुआ.

आधी रात की कार्रवाई को बताया गैरकानूनी

पीठ ने कहा कि रात एक बजे स्टीयरिंग लॉक तोड़कर वाहन ले जाना किसी भी तरह शांतिपूर्ण या कानूनी कब्जा नहीं माना जा सकता. अदालत ने यह भी पाया कि वाहन कब्जे का दस्तावेज ट्रक मालिक के हस्ताक्षर के बिना तैयार किया गया था. कोर्ट के अनुसार हाईकोर्ट ने इस महत्वपूर्ण पहलू पर पर्याप्त विचार नहीं किया. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की उस टिप्पणी से भी असहमति जताई जिसमें कहा गया था कि ट्रक मालिक ने राहत के लिए देर से अदालत का रुख किया.

आजीविका के अधिकार का उल्लंघन

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रक मालिक सीमित साधनों वाला व्यक्ति था और उसकी आजीविका पूरी तरह उस वाहन पर निर्भर थी. अदालत ने माना कि वित्तीय कंपनी की मनमानी कार्रवाई के कारण उसे उसके रोजगार के साधन से वंचित कर दिया गया. यह संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 के तहत उपलब्ध अधिकारों के खिलाफ है. कोर्ट ने कहा कि जब कोई कंपनी बिना नोटिस और बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए किसी व्यक्ति के जीवनयापन के साधन पर कब्जा कर लेती है, तो उसे उसके परिणाम भुगतने होंगे.

कंपनी पर लगाया जुर्माना, मुआवजा देने के आदेश

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने वाहन की बिक्री को रद्द नहीं किया, लेकिन वित्तीय कंपनी के खिलाफ कई निर्देश जारी किए. अदालत ने आदेश दिया कि:

  • दोनों लोन खातों को बंद किया जाए.
  • वाहन बिक्री से प्राप्त 4.50 लाख रुपये ट्रक मालिक को लौटाए जाएं.
  • इस राशि पर बिक्री की तारीख से भुगतान तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दिया जाए.
  • मानसिक पीड़ा और आजीविका के नुकसान के लिए 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए.
  • मुकदमे की लागत के रूप में 50 हजार रुपये अतिरिक्त दिए जाएं.

RBI को भी दिए निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक को भी निर्देश दिया कि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) और अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा कर्ज वसूली से जुड़े नियमों का वास्तविक अनुपालन सुनिश्चित किया जाए. अदालत ने कहा कि भविष्य में किसी भी व्यक्ति को बिना नोटिस, बिना प्रक्रिया और आधी रात को उसकी आजीविका से वंचित करने जैसी घटनाएं दोबारा नहीं होनी चाहिए. कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया कि कर्ज वसूली का अधिकार कानून के दायरे में ही प्रयोग किया जा सकता है और वित्तीय संस्थानों को हर हाल में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा.

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