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सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने खींच दी लकीर, जब योग्यता हो पैमाना, तब लिंग क्यों बने बाधा?

संजीव कुमार मिश्र
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अक्टूबर 07, 2026 14:05 pm IST
    • Published On अक्टूबर 07, 2026 14:05 pm IST
    • Last Updated On अक्टूबर 07, 2026 14:05 pm IST
सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने खींच दी लकीर, जब योग्यता हो पैमाना, तब लिंग क्यों बने बाधा?

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ होने वाले लैंगिक भेदभाव और सदियों पुरानी रूढ़िवादी सोच पर एक सख्त टिप्पणी की है, इससे भारत के सामाजिक और श्रम बाजार के ढांचे पर गंभीर बहस शुरू हो गई है. यह मामला सिर्फ चार दशक पुरानी एक कानूनी लड़ाई के पटाक्षेप भर का नहीं है, बल्कि यह इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि हमारे समाज में सुरक्षा और संरक्षण के छद्म आवरण के पीछे महिलाओं को समान अवसरों से वंचित करने की मानसिकता कितनी गहरी रही है. इसे बदलने की कितनी सख्त जरूरत है.

क्या थी सुमित्रा की शिकायत

सुप्रीम कोर्ट के सामने आया यह ऐतिहासिक मामला 1988 का है. हरियाणा की रहने वाली सुमित्रा ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के करनाल स्थित एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में हेल्पर पद के लिए आवेदन किया था. वे निर्धारित योग्यता पूरी करती थीं. चयन प्रक्रिया के अंतिम 49 उम्मीदवारों में उनका नाम शामिल था. इनमें से 43 पुरुष उम्मीदवारों को नियुक्ति दे दी गई, लेकिन सुमित्रा को केवल इसलिए नकार दिया गया क्योंकि वे महिला थीं और उनके काम में भारी एलपीजी सिलेंडर उठाना शामिल था. अदालत ने इस संकीर्ण सोच पर गहरा प्रहार करते हुए सवाल उठाया कि जब भारत के करोड़ों घरों में महिलाएं खुद भारी-भरकम गैस सिलेंडर उठाती हैं, उसे बदलती हैं और रोजमर्रा के कठिन कार्य करती हैं, तो किसी संगठित नौकरी में केवल महिला होने के आधार पर उन्हें अयोग्य कैसे माना जा सकता है? करीब चार दशक लंबी कानूनी जंग के कारण सुमित्रा की नौकरी की उम्र निकल चुकी थी, इसलिए शीर्ष अदालत ने उन्हें 12 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश दिया. अदालत का यह फैसला केवल आर्थिक राहत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सामंती मानसिकता पर करारा आघात है, जो किसी व्यक्ति की कार्यक्षमता का मूल्यांकन उसके कौशल, प्रशिक्षण और योग्यता के बजाय उसके लिंग के आधार पर करती है.

भारतीय समाज और नीतिगत ढांचे में महिलाओं को जोखिम से बचाने और जोखिम का हवाला देकर उन्हें अवसरों से वंचित करने के बीच हमेशा से एक पतली रेखा रही है. अक्सर सुरक्षा और संरक्षण के नाम पर महिलाओं को कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों से दखल से पहले ही बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. हालांकि इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि खतरनाक या जोखिम भरे कामों में सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों को नजरअंदाज किया जाए. लेकिन किसी भी काम के जोखिम को कम करने के लिए आधुनिक तकनीक, उचित प्रशिक्षण और सुरक्षा उपकरण मुहैया कराना प्रबंधन और तंत्र की जिम्मेदारी है न कि इसके नाम पर महिला उम्मीदवारों के लिए रोजगार के दरवाजे ही बंद कर देना. यदि किसी काम के लिए आवश्यक योग्यता और शारीरिक क्षमता का मापदंड तय है, तो उस पर खरा उतरने वाले हर नागरिक, चाहे वह पुरुष हो या महिला को समान अवसर मिलना चाहिए. 

रिव्यू ऑफ इकोनामिक स्टडीज में प्रकाशित डेनमार्क के एक अध्ययन का संदर्भ भी इस चर्चा को बल देता है. अध्ययन में पाया गया कि जब कार्यस्थल पर सामाजिक और व्यक्तिगत अनुभवों में बदलाव आता है तो महिलाओं की सापेक्ष कमाई और रोजगार में सकारात्मक वृद्धि होती है. यद्यपि डेनमार्क और भारत की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में बड़ा अंतर है. लेकिन यह शोध साबित करता है कि कार्यस्थल पर महिलाओं की क्षमता को लेकर बनी धारणाएं पत्थर की लकीर नहीं हैं, वे मजबूत नीतियों और सामाजिक बदलाव के साथ बदल सकती हैं.

भारत में सामाजिक बदलाव

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत एक बड़े सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है. पिछले दस सालों में भारत ने यह साबित किया है कि अगर महिलाओं को समान धरातल और अवसर दिए जाएं, तो वे हर उस क्षेत्र में अपना परचम लहरा सकती हैं जिसे कभी केवल पुरुषों का वर्चस्व माना जाता था. आज का भारत दस साल पहले का भारत नहीं है, यहां बदलाव की बयार हर क्षेत्र में दिखाई दे रही है. रक्षा, सैन्य रणनीतियों और कूटनीति के क्षेत्र को ही देखें 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण अभियानों के बाद देश और दुनिया के सामने आधिकारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस का नेतृत्व भी महिला अधिकारी ने पूरी कुशलता और आत्मविश्वास के साथ किया. आज भारतीय वायुसेना ने महिलाओं के लिए लड़ाकू विमान उड़ाने के दरवाजे खोले हैं और भारत की बेटियां राफेल और मिग-21 जैसे फाइटर जेट्स सफलतापूर्वक उड़ा रही हैं. नौसेना और थल सेना में भी महिलाओं को स्थायी कमीशन और कमान भूमिकाएं सौंपी गई हैं. इतना ही नहीं, भारत में नागरिक उड्डयन के क्षेत्र में महिला पायलटों करीब 15 फीसद हैं, जो पांच फीसद के वैश्विक औसत से तीन गुना अधिक और दुनिया में सबसे ज्यादा है.

विज्ञान, अंतरिक्ष और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी भारतीय महिलाओं ने अपनी महारत साबित की है. इसरो के मंगलयान और चंद्रयान-3 मिशन की अभूतपूर्व सफलता में महिला वैज्ञानिकों की केंद्रीय भूमिका को पूरी दुनिया ने सराहा है. भारत की महिला शोधकर्ता और इंजीनियर अब गहरे अंतरिक्ष अभियानों और उन्नत प्रौद्योगिकी का नेतृत्व कर रही हैं. स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर भी महिलाओं का योगदान अभूतपूर्व रहा है. कोरोना महामारी के वैश्विक संकट के दौरान भारत की लाखों आशा कार्यकर्ताओं, नर्सों और महिला डॉक्टरों ने फ्रंटलाइन वॉरियर के रूप में जिस निष्ठा के साथ देश की रक्षा की, उसने भारत के स्वास्थ्य सेवा ढांचे को एक नई मजबूती दी. इसके साथ ही, केंद्र सरकार की स्टार्टअप इंडिया और मुद्रा योजना जैसी पहलों के बल पर आज देश में करोड़ों सूक्ष्म व छोटे उद्यमों की बागडोर महिलाओं के हाथों में है, जो आर्थिक आत्मनिर्भरता की एक नई कहानी लिख रही हैं.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से निकला संदेश

जब भी प्रशासनिक स्तर पर महिलाओं को आगे बढ़ाने और रूढ़ियों को तोड़ने की बात होती है, तो देश के विभिन्न राज्यों के क्रांतिकारी कदमों का जिक्र करना बेहद प्रासंगिक हो जाता है. उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड जैसे राज्यों ने यह साबित किया है कि अगर मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो सामाजिक संरचना को तेजी से बदला जा सकता है. उत्तर प्रदेश में 'मिशन शक्ति' अभियान के तहत पुलिस प्रशासन और सार्वजनिक सुरक्षा में महिलाओं की भूमिका को अभूतपूर्व विस्तार मिला है. इसी तरह बिहार में भी पुलिस बल में महिलाओं की भागीदारी देश में सबसे अधिक (25 से 29 प्रतिशत) है, जहां हर थाने और प्रशासनिक पद पर महिला कर्मियों की मौजूदगी आम महिलाओं में सुरक्षा और आत्मविश्वास भर रही है. बिहार में पंचायती राज संस्थाओं में 50 फीसद आरक्षण, सरकारी नौकरियों में 35 फीसद आरक्षण और 'मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना' और 'जीविका' मिशन जैसी पहलों ने आर्थिक स्वावलंबन का नया अध्याय लिखा है. वहीं, उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य ने महिलाओं को पैतृक संपत्ति में अधिकार देने का ऐतिहासिक कानून पास करने के साथ-साथ राज्य की महिलाओं के लिए 30 फीसद क्षैतिज आरक्षण लागू कर सामाजिक सुरक्षा का मजबूत मॉडल प्रस्तुत किया है. मध्य प्रदेश की 'लाडली बहना' योजना और राजस्थान में स्वयं सहायता समूहों के जरिए आजीविका सशक्तिकरण के प्रयासों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब महिलाओं को कानून-व्यवस्था, संपत्ति के अधिकार और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में अवसर दिया जाता है, तो वे न केवल अपनी जिम्मेदारी का कुशलतापूर्वक निर्वहन करती हैं बल्कि पूरे समाज की सोच को बदलने का काम करती हैं.

सुप्रीम कोर्ट का संदेश बहुत स्पष्ट है, रोजगार में समानता सिर्फ कागजी अधिकार या नियुक्ति पत्र हासिल करने तक सीमित नहीं है. यह समाज की उस पूर्वाग्रही मानसिकता को बदलने का आह्वान है, जो जन्म के आधार पर यह तय कर लेती है कि कौन सा व्यक्ति कौन सा काम कर सकता है और कौन सा नहीं. समाज को महिलाओं के लिए न तो कृत्रिम विशेषाधिकारों की आवश्यकता है और न ही उन पर थोपी गई कृत्रिम सीमाओं की. देश की आधी आबादी को केवल तीन चीजें चाहिए, समान अवसर, समान कसौटी और सुरक्षित कार्यस्थल. गर्भावस्था, मातृत्व और कार्यस्थल की सुरक्षा जैसी विशेष परिस्थितियों के लिए संरक्षणवादी प्रावधान जरूरी हैं, लेकिन इन प्रावधानों का उद्देश्य महिलाओं से उनका अधिकार छीनना नहीं, बल्कि उनके लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना होना चाहिए. किसी काम का जोखिम या कठिनाई यह तय न करे कि उसे महिला करेगी या पुरुष; बल्कि काम की वास्तविक जरूरतें यह तय करें कि उम्मीदवार में क्या योग्यता होनी चाहिए. जब योग्यता ही चयन का एकमात्र पैमाना बनेगी, तभी भारत सही अर्थों में एक विकसित, समावेशी और सशक्त राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर अपनी पहचान को और मजबूत कर सकेगा.

(डिस्क्लेमर: लेखक देश की राजनीति पर पैनी नजर रखते हैं. वो राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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