जब भी देश में IIT की कामयाबी का जिक्र होता है, तो हमारी जुबान पर अक्सर बड़ी-बड़ी टेक कंपनियों के फाउंडर्स या दुनिया हिला देने वाले वैज्ञानिकों के नाम आ जाते हैं. लेकिन इतिहास के पन्नों में कुछ ऐसे भी नाम दर्ज हैं, जिन्होंने चकाचौंध से दूर रहकर भारत की इंडस्ट्रियल रीढ़ को मजबूत किया. सतीश कुमार कौरा एक ऐसा ही नाम हैं. यह कहानी उस शख्स की है, जिसने जीरो से शुरुआत कर 1200 करोड़ का इलेक्ट्रॉनिक्स साम्राज्य खड़ा किया और जब उसका बना-बनाया कारोबार नई तकनीक की आंधी में उजड़ने लगा, तो उसने हार मानने के बजाय आसमान की तरफ रुख कर लिया.
जब टीवी स्क्रीन पर खेला सबसे बड़ा दांव
सतीश कुमार कौरा का जन्म एक साधारण मिडिल क्लास परिवार में हुआ था. पिता ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में मामूली नौकरी करते थे, इसलिए बिजनेस या उद्योग का दूर-दूर तक कोई बैकग्राउंड नहीं था. मोड़ तब आया जब सतीश ने IIT कानपुर की कठिन परीक्षा पास की और 1966 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की. इसके बाद वह मास्टर्स के लिए कनाडा की कार्लटन यूनिवर्सिटी चले गए.
विदेश में सुनहरे मौके थे, लेकिन दिल में वतन लौटने की जिद थी. 1973 में उन्होंने 'सैमटेल' (Samtel) ग्रुप की नींव रखी और अगले ही साल 'टेलीट्यूब इलेक्ट्रॉनिक्स' बनाकर टीवी के लिए पिक्चर ट्यूब बनाने का काम शुरू किया. उस दौर में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए पूरी तरह सरकारी कंपनियों या विदेशों से आने वाले आयात पर निर्भर था. बिना किसी कारोबारी तजुर्बे के, कौरा ने सीधे उस समस्या पर हाथ डाला जिसका हल निकालने में देश के बड़े-बड़े दिग्गज कतरा रहे थे.
1981 में 'सैमटेल इंडिया' और 1986 में मित्सुबिशी व सुमितोमो के साथ मिलकर 'सैमटेल कलर' की शुरुआत हुई. 1982 के एशियाई खेलों के बाद देश में रंगीन टीवी का ऐसा सैलाब आया कि सैमटेल की किस्मत खुल गई. कंपनी हर साल एक करोड़ पिक्चर ट्यूब बनाने की क्षमता तक पहुंच गई. भारत के हर दूसरे घर के ड्राइंग रूम में जलने वाली स्क्रीन कौरा की मेहनत का नतीजा थी.
जब लगा कि सब खत्म हो जाएगा: फ्लैट स्क्रीन का तूफान
लेकिन तकनीक की दुनिया किसी के लिए नहीं रुकती. जैसे ही सीआरटी (CRT) ट्यूब्स का दौर खत्म हुआ और फ्लैट-पैनल (एलसीडी/एलईडी) डिस्प्ले का जमाना आया, सैमटेल का करोड़ों का साम्राज्य सीधे रडार पर आ गया. यह सिर्फ ग्राहकों की पसंद का बदलना नहीं था, बल्कि उस पूरी फैक्ट्री और तकनीक का पतन था, जिस पर यह कंपनी खड़ी थी. किसी भी आम कारोबारी के लिए यह दुकान बंद करने का वक्त था. मगर सतीश कौरा कोई आम कारोबारी नहीं थे. उन्होंने तकनीक को छोड़ने के बजाय उसका मैदान बदल दिया.
ड्राइंग रूम की टीवी से लड़ाकू विमानों के कॉकपिट तक
कौरा ने फैसला किया कि जो डिस्प्ले टेक्नोलॉजी अब तक घरों के मनोरंजन का हिस्सा थी, वही अब देश की सरहदों की हिफाजत करेगी. सैमटेल ने सीधे डिफेंस और एविएशन सेक्टर में कदम रखा. साल 2006 में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के साथ मिलकर बनी Samtel HAL Display Systems, जो देश के डिफेंस एवियोनिक्स इतिहास की पहली पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप बनी.
कौरा की कंपनी ने सुखोई-30 MKI (Su-30MKI), लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस (LCA Tejas) और इंटरमीडिएट जेट ट्रेनर (IJT) जैसे भारत के सबसे आधुनिक लड़ाकू विमानों के लिए स्वदेशी मल्टी-फंक्शन डिस्प्ले (MFD) और हेड-अप डिस्प्ले तैयार किए. 2017 तक कंपनी सुखोई के पूरे बेड़े के लिए 1,000 से ज्यादा स्वदेशी डिस्प्ले सेना को सौंप चुकी थी.
नाम गुमनाम रहा, लेकिन काम ने रचा इतिहास
देश के लिए उनके इस अभूतपूर्व योगदान को बड़े स्तर पर सराहा गया. 1989 में IIT कानपुर ने अपने पहले 'डिस्टिंग्विश्ड एलुमनाई अवॉर्ड' से उन्हें नवाजा. 2004 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया. वह DRDO की रिव्यू कमेटी और प्रधानमंत्री की साइंटिफिक एडवाइजरी काउंसिल का भी अहम हिस्सा रहे. 1974 में एक छोटी सी पिक्चर ट्यूब से शुरू हुआ सफर 2006 में सुखोई के कॉकपिट तक जा पहुंचा. सतीश कुमार कौरा की यह दास्तान सिर्फ एक कारोबारी की कामयाबी नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भर भारत के उस सफर का आईना है, जिसने विदेशों पर निर्भरता छोड़कर अपनी सीमाओं को अपने दम पर सुरक्षित करना सीखा.
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