आज की कहानी एक ऐसे शख्स की है जिसने अपनी बर्बादी से कामयाबी की नई इबारत लिख दी. यह कहानी है Veeba (वीबा) के फाउंडर विराज बहल की, जिन्होंने बिजनेस चलाने के लिए अपना घर तक बेच दिया. मर्चेंट नेवी की अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर विराज ने रेस्टोरेंट बिजनेस में हाथ आजमाया, लेकिन सारे आउटलेट्स एक के बाद एक धड़ाम हो गए. रेस्टोरेंट की खाली पड़ी कुर्सियां हर दिन नाकामी का अहसास कराती थीं.
रेस्टोरेंट बंद हुए महज तीन दिन हुए थे, जेब में फूटी कौड़ी न थी. विराज ने अपनी पत्नी रिदमा से कहा, "सॉस की फैक्ट्री लगाने के लिए हमें अपना घर बेचना होगा." विराज को लगा खरी-खोटी सुनने को मिलेगी, लेकिन पत्नी ने भरोसा जताया और कहा, "अगर यही तुम्हारी मंजिल है, तो आगे बढ़ो." नीमराना में दोनों ने खुद हाथों से खड़े रहकर अपनी पहली फैक्ट्री खड़ी की.
जब अपनी नाकामी से निकला 'अरबों का आइडिया'
रेस्टोरेंट भले ही डूब गया, पर विराज को एक बेशकीमती सबक दे गया. उन्होंने देखा कि देश में केचप और मेयोनीज के अलावा तंदूरी स्प्रेड, मिंट मेयो और चिपोटल जैसी सॉसेज का अकाल था. उन्होंने सोचा, जो दिक्कत मुझे आई, वो दूसरों को भी आ रही होगी.
उन्होंने विदेशी सॉसेज को देसी रसोई के स्वाद में ढाला. घर की बची सूखी रोटी-सब्जी में जब उनकी चिपोटल सॉस लगी, तो बच्चों को मैक्सिकन रोल का जायका मिला.

डोमिनोज का 70 टन का पहला दांव
शुरुआत में बड़ी कंपनियों के दरवाजे खटखटाना आसान नहीं था. विराज महीनों डोमिनोज के दफ्तर के चक्कर काटते रहे. आखिरकार उन्हें 70 टन का पहला ऑर्डर मिला. उस दौर में 70 टन पूरे महीने का प्रोडक्शन था, जो आज वीबा की फैक्ट्री में महज आधे घंटे से भी कम में बन जाता है. इसके बाद पिज्जा हट, केएफसी, बर्गर किंग और स्टारबक्स जैसी दिग्गज कंपनियां भी लाइन में लग गईं.
बाजार के 'दिग्गजों' के बीच अनोखी रणनीति
जब रिटेल में कदम रखा, तो सामने मैगी और किसान जैसे महाबली खड़े थे. विराज उनसे सीधे टकराने के बजाय अलग रास्ते पर चले. जब दिग्गज केचप में उलझे थे, वीबा ने शेफ-स्पेशल ड्रेसिंग्स से घरों में जगह बनाई. विज्ञापनों से पहले देश के 750 से ज्यादा कस्बों और नुक्कड़ की दुकानों तक डिस्ट्रीब्यूशन का जाल बिछाया. जब ब्रांड मजबूत हुआ, तब देश की पहली प्रिजर्वेटिव-फ्री और सबसे कम चीनी वाली केचप उतारी. 'वीबा' (Veeba) आज 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की बड़ी कंपनी बना दिया है, जो देश के घर-घर में जाना-पहचाना नाम बन चुकी है. साल 2025 में वे मशहूर शो 'शार्क टैंक इंडिया' (सीजन 4) में बतौर जज और इन्वेस्टर भी शामिल हो चुके हैं.

फंडिंग और नए दौर के युवाओं के लिए फलसफा
विराज का मानना है कि फंडिंग मिलना जश्न नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का बोझ है. सही इन्वेस्टर चुनना शादी जैसा है. गलत साथी मिल गया तो जिंदगी भर का रोना हो जाता है.
आज के युवाओं को उनका सीधा संदेश है, "सिर्फ पैशन से पेट नहीं भरता, उसके साथ पसीना और सब्र चाहिए. हर रोज चुपचाप सिर झुकाकर एक ही काम सालों-साल पूरी शिद्दत से करना पड़ता है. फाउंडर सिर्फ पोस्टर व्बॉय होता है, असली ताकत तो बैकस्टेज खड़ी टीम और परिवार होता है."
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