हजारों साल पीछे जाएं तो रामायण की वो कहानी याद आती है, जहां संजीवनी बूटी ने लक्ष्मण के प्राण बचाए थे. आयुर्वेद का वो चमत्कार आज भी हमारी रगों में है. आज हम एक ऐसी ही जड़ी-बूटियों की जादुई कहानी लेकर आए हैं, जिसने न सिर्फ लाखों रेल कर्मचारियों और सफाईकर्मियों को दाद-खाज और खुजली से निजात दिलाई, बल्कि देखते ही देखते 600 करोड़ रुपये का खड़ा कर दिया साम्राज्य. हम बात कर रहे हैं आपके चहेते 'मेडिमिक्स' साबुन की.
कहानी शुरू होती है साल 1960 से. चेन्नई के किलपॉक मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरी पढ़कर निकले डॉ. वीपी सिधन को रेलवे में ट्रेनी एलोपैथ डॉक्टर की नौकरी मिली. वैसे तो वो अंग्रेजी दवाइयों के डॉक्टर थे, लेकिन खानदान सदियों पुराना आयुर्वेदिक था. नब्ज पकड़ते ही बीमारी जान लेते थे.

रेलवेकर्मियों को दुख देखा नहीं गया
नौकरी के दौरान उन्होंने देखा कि बेचारे रेल कर्मचारी दिन-भर धूल, पसीने और कोयले के बीच जूझते थे, जिससे उनके बदन पर भयंकर स्किन इंफेक्शन हो जाते थे. डॉ. सिधन से उनका यह दर्द देखा नहीं गया. उन्होंने अपने पारिवारिक नुस्खों से एक आयुर्वेदिक तेल तैयार किया.
चमत्कारी तेल ने ऐसा असर दिखाया कि मरीजों की त्वचा सोने जैसी चमकने लगी! देखते ही देखते शहर भर में डॉक्टर साहब के तेल के चर्चे होने लगे.
ये भी पढ़ें: प्लास्टिक की बोतलों से बना दिया घर, ईंट-पत्थर से भी ज्यादा मजबूत, खर्च हुए सिर्फ साढ़े चार लाख
तेल लगाने से क्यों हिचकने लगे लोग?
लेकिन कहते हैं ना कि हर बड़ी कामयाबी के पीछे एक अड़चन होती है. तेल चिपचिपा था, सो लोग इसे लगाने से कतराने लगे. दोस्तों ने सलाह दी कि क्यों न इसे साबुन का रूप दे दिया जाए?
डॉक्टर साहब को बात जंच गई. उन्होंने सोचा, इलाज भी होगा और चिपचिपाहट से छुट्टी भी! बस फिर क्या था, साल 1969 में उनके छोटे से किचन में जन्म हुआ 'मेडिमिक्स' का. 'मेडि' यानी मेडिसिन की ताकत और 'मिक्स' यानी जड़ी-बूटियों और कुदरती तेलों का अनोखा मेल.

हाथ से साबुन बनाते पति-पत्नी
शुरुआत में डॉक्टर साहब और उनकी पत्नी खुद हाथों से इस साबुन को सांचे में ढालते थे. इसे दवा की तरह पर्चे पर लिखकर दिया जाता था. मांग बढ़ी, तो पेरांबुर के एक छोटे से कमरे में सिर्फ एक कर्मचारी के साथ इसकी फैक्ट्री खुली.
विज्ञापन के लिए फूटी कौड़ी नहीं थी, लेकिन मरीजों के भरोसे ने 'माउथ पब्लिसिटी' का ऐसा पहिया घुमाया कि मेडिमिक्स चेन्नई के हर मेडिकल स्टोर पर छा गया.
कर्मचारी हड़ताल में लग गया फैक्ट्री में ताला
तभी 1980 में लेबर स्ट्राइक के चलते फैक्ट्री पर ताला लग गया. तीन साल तक कंपनी अंधेरे में रही. लेकिन डॉ. सिधन ने हार नहीं मानी. 1983 में जब वापसी की, तो मजदूरों का दिल जीता, मशीनें लगाईं और रोजाना 5 हजार बनने वाला साबुन अब 50 हजार बनने लगा. उन्होंने विज्ञापन में सीधे कहा, 'यह डॉक्टरों का सुझाया साबुन है.' बस, जनता का अटूट विश्वास इस 'हरे साबुन' से जुड़ गया.
आज मेडिमिक्स दुनिया के 30 से ज्यादा देशों में अपनी खुशबू बिखेर रहा है और दुनिया का सबसे बड़ा हैंडमेड आयुर्वेदिक साबुन बन चुका है. कंपनी की वैल्यूशन करीब 600 करोड़ रुपए है.
ये भी पढ़ें: निरमा गर्ल: इस मुस्कुराती तस्वीर के पीछे छिपी है दर्दनाक कहानी, अरबपति पिता ने बेटी को बना दिया अमर
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं