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'पत्नी पढ़ी-लिखी है, गुजारा भत्ता क्यों दूं?' पति की दलील पर हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी की उच्च शिक्षा या व्यावसायिक कौशल भरण-पोषण से इनकार का आधार नहीं हो सकता.

'पत्नी पढ़ी-लिखी है, गुजारा भत्ता क्यों दूं?' पति की दलील पर हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी की शिक्षा या व्यावसायिक कौशल के आधार पर भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता
  • कोर्ट ने कहा कि पति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बचने के लिए पत्नी की योग्यता को आधार नहीं बना सकता है
  • परिवार न्यायालय ने महिला की भरण-पोषण याचिका खारिज की थी, जबकि बच्चे को मात्र 3000 रुपये गुजारा भत्ता दिया था
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इलाहाबाद:

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पत्नी का अधिक पढ़ा-लिखा होना या उसके पास व्यावसायिक कौशल होना मात्र इस आधार पर उसे भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता. अदालत ने कहा कि पति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बचने के लिए पत्नी की योग्यता को आधार नहीं बना सकता. जस्टिस गरिमा प्रसाद ने बुलंदशहर परिवार न्यायालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें सीआरपीसी की धारा 125 के तहत महिला की भरण-पोषण संबंधी अर्जी खारिज कर दी गई थी.

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अदालत ने फैसले में क्या कहा

परिवार न्यायालय ने यह कहते हुए अर्जी खारिज की थी कि महिला ने अपनी पेशेवर शिक्षा छिपाई और पर्याप्त कारण के बिना अलग रह रही है. हालांकि, परिवार अदालत ने महिला के बेटे को 3 हजार रुपये प्रति माह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था. महिला ने हाईकोर्ट में दलील दी कि उसके पास आय का कोई स्रोत नहीं है और पति यह साबित करने में विफल रहा कि वह कामकाजी है. वहीं, पति ने दावा किया कि पत्नी अत्यधिक योग्य है, निजी अध्यापक के रूप में काम करती है और सिलाई-कढ़ाई में आईटीआई डिप्लोमा रखती है.

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महिला ने ससुराल में दुर्व्यवहार के कारण घर छोड़ा

अदालत ने पाया कि महिला ने ससुराल में दुर्व्यवहार के कारण घर छोड़ा और उसके रोजगार का कोई ठोस सबूत नहीं है. अदालत ने कहा कि पत्नी की कमाने की संभावना वास्तविक रोजगार से अलग है और घरेलू जिम्मेदारियों के कारण कई महिलाएं कार्यबल में शामिल नहीं हो पातीं. हाईकोर्ट ने बच्चे के लिए 3,000 रुपये गुजारा भत्ता को अपर्याप्त बताते हुए कहा कि बच्चे को पढ़ाई और स्वस्थ वातावरण के लिए अधिक सहयोग की जरूरत है. अदालत ने मामले को परिवार न्यायालय को वापस भेजते हुए एक महीने के भीतर नए सिरे से उचित आदेश पारित करने का निर्देश दिया.

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