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आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में चार्ज फ्रेम करने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ी बात कह दी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आत्महत्या मामले में क्रिमिनल रिवीजन खारिज करते हुए कहा कि आरोप तय करने के चरण में अनुमान/गंभीर संदेह पर्याप्त है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 228 CrPC के तहत चार्ज फ्रेमिंग के समय विस्तृत कारण आवश्यक नहीं, जबकि धारा 227 में डिस्चार्ज के लिए कारण रिकॉर्ड करना पड़ता है. IPC 306 में ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोप तय करने का आदेश बरकरार रखा गया.

आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में चार्ज फ्रेम करने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ी बात कह दी
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 306 के तहत आरोप तय करने में अनुमान और संदेह पर्याप्त होता है
  • आरोप तय करने के चरण में विस्तृत कारणों का उल्लेख जरूरी नहीं होता और दोषसिद्धि के मापदंड जांचे नहीं जाते
  • धारा 227 के तहत आरोपी को डिस्चार्ज करने के लिए पर्याप्त आधार न होने पर ही आदेश दिया जाता है
प्रयागराज:

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आत्महत्या से जुड़े एक मामले में आवेदक की क्रिमिनल रिवीजन याचिका को खारिज करते हुए कहा है कि आरोप तय करने (Framing of Charge) के चरण में अनुमान ही काफी है. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस स्टेज पर कोर्ट को विस्तृत कारण दर्ज करने की आवश्यकता नहीं होती और बरी या दोषसिद्धि के लिए आवश्यक मापदंडों की जांच इस अवस्था में नहीं की जा सकती. आईपीसी की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत आरोप तय करने के लिए इतना भर पर्याप्त है कि मामले का ठोस आधार और समग्र संदेश यह बताता हो कि अपराध किया गया है. उकसावे के आवश्यक तत्वों की उपस्थिति या अनुपस्थिति को आरोप तय होने के समय गहराई से नहीं परखा जा सकता; यह विचारण न्यायालय (ट्रायल कोर्ट) तय करेगा. हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आरोप तय करने की स्टेज तब आती है जब आरोपी डिस्चार्ज नहीं किया गया हो; इसलिए आरोप तय होने के बाद पूर्ण विचारण (फुल ट्रायल) करना ही पड़ेगा.

धारा 227 (डिस्चार्ज) और धारा 228 (चार्ज फ्रेमिंग): कोर्ट की स्पष्टता

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 227 के तहत डिस्चार्ज में, मामले के रिकॉर्ड और उसके साथ जमा दस्तावेज़ों पर विचार करने तथा आरोपी और अभियोजन पक्ष की दलीलें सुनने के बाद, यदि जज को लगता है कि आगे बढ़ने का पर्याप्त आधार नहीं है, तो वह आरोपी को डिस्चार्ज कर देगा और ऐसा करने के कारणों को रिकॉर्ड करेगा. वहीं धारा 228 में आरोप तय करने में, यदि इस विचार और सुनवाई के बाद जज की राय है कि यह मानने का आधार है कि आरोपी ने ऐसा अपराध किया है जो विशेष रूप से सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय नहीं है, तो वह आरोपी के खिलाफ आरोप तय कर सकता है.

आदेश द्वारा मामले को ट्रायल के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) या प्रथम श्रेणी के अन्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को ट्रांसफर भी कर सकता है और आरोपी को संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने निर्धारित तारीख पर पेश होने का निर्देश दे सकता है. बाद में मजिस्ट्रेट पुलिस रिपोर्ट पर दायर वारंट‑मामलों के ट्रायल की प्रक्रिया के अनुसार अपराध का ट्रायल करेंगे; और जो मामले विशेष रूप से न्यायालय द्वारा विचारणीय हैं, उनमें आरोपी के खिलाफ लिखित में आरोप तय किया जाएगा.

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सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला: संदेह/गंभीर संदेह पर्याप्त

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि संदेह/गंभीर संदेह/अनुमान मौजूद होने के कारण कोर्ट आईपीसी की धारा 306 के तहत आरोप तय कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि सेशंस कोर्ट द्वारा आरोप तय करना गलत है. हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और आवेदक की रिवीजन याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने साथ ही स्पष्ट किया कि फैसले में की गई टिप्पणियां केवल आरोप तय करने के चरण तक सीमित हैं और इसे मामले के गुण‑दोष पर राय नहीं माना जाए. यह आदेश जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र ने आवेदक अशोक सिंह उर्फ काली सिंह की क्रिमिनल रिवीजन याचिका को खारिज करते हुए दिया है.

केस का घटनाक्रम और दर्ज आदेश

आवेदक ने सीआरपीसी की धारा 397/401 के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. इसमें गोरखपुर के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश/स्पेशल जज द्वारा 24 जनवरी 2024 को आईपीसी धारा 306 के तहत आरोप तय करने के आदेश और अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 22 अक्टूबर 2021 को अपराध का संज्ञान लेने के आदेश को चुनौती दी गई थी. 2 मार्च 2020 को जिला अस्पताल, गोरखपुर के एक वार्ड बॉय ने पुलिस को शवगृह में एक शव होने की सूचना दी. मृतक की पहचान दीन दयाल सिंह के रूप में हुई, जो याचिकाकर्ता अशोक सिंह का सगा भाई था. मौके पर पहुँची पुलिस को मृतक की जेब से एक सुसाइड नोट मिला, जिसके आधार पर एफआईआर दर्ज की गई.

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जांच के दौरान मृतक की पैंट की बाईं जेब से हाथ से लिखा सुसाइड नोट और दो आधार कार्ड बरामद हुए. सुसाइड नोट पढ़ने पर मौत का कारण आवेदक द्वारा मृतक को परेशान करना बताया गया, जबकि मौत का कारण ट्रेन से लगी चोटें पाई गईं. जांच के आधार पर मजिस्ट्रेट कोर्ट के सामने चार्जशीट पेश की गई, जिस पर 22 अक्टूबर 2021 के ट्रायल कोर्ट के आदेश से धारा 306 के तहत मामले का संज्ञान लिया गया. बाद में 24 जनवरी 2024 के सेशंस कोर्ट के आदेश से उसी सेक्शन के तहत आरोप तय किए गए, यही दोनों आदेश इस रिवीजन में चुनौती के दायरे में थे.

आवेदक की दलीलें: धारा 107 के तत्व लागू नहीं, FSL रिपोर्ट अधूरी

आवेदक की ओर से कहा गया कि आईपीसी सेक्शन 306 के तहत आरोप तय करना गैर‑कानूनी है क्योंकि आईपीसी सेक्शन 107 (उकसावे की परिभाषा/तत्व) के आवश्यक घटक लागू नहीं होते. सुसाइड नोट की सच्चाई को मान भी लिया जाए तो उसके कंटेंट से यह प्रतीत होता है कि मृतक अपनी प्रॉपर्टी अपने परिवार के सदस्यों में बांटना चाहता था; इसमें आवेदक द्वारा मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाने का स्पष्ट उल्लेख या विवरण नहीं मिलता. फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) ने 3 अगस्त 2021 को रिपोर्ट सबमिट की, जिसमें सुसाइड नोट में मृतक की हैंडराइटिंग का मिलान हो गया था; हस्ताक्षर (Signature) के लिए अतिरिक्त नमूने मांगे गए थे.

इस संबंध में कम्युनिकेशन भेजा गया, किंतु अतिरिक्त हस्ताक्षर संबंधी अंतिम रिपोर्ट रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं हुई; इसलिए धारा 306 के तहत चार्ज फ्रेम करने के लिए सबूतों की कमी थी. आवेदक ने यह भी कहा कि मृतक की पत्नी ने शुरुआत में बयान देने से इन्कार किया था और पुलिस को दी गई पहली अर्जी में लिखा था कि आत्महत्या व्यापार में घाटे के कारण हुई है, परिवार का कोई सदस्य जिम्मेदार नहीं है; बाद में उन्होंने संपत्ति विवाद और उत्पीड़न का आरोप लगाया.

सरकारी पक्ष की दलीलें: सुसाइड नोट और गवाहों के बयान पर्याप्त

सरकारी वकील ने तर्क दिया कि इस स्टेज पर सुसाइड नोट पर्याप्त सबूत है. जांच के दौरान गवाहों के बयानों से यह स्पष्ट है कि आवेदक ने मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाया. ये तथ्य मामले में संज्ञान लेने और आगे आरोप तय करने के लिए पर्याप्त थे. इसलिए माननीय मजिस्ट्रेट ने कोई गलती नहीं की है. जहां तक चार्ज फ्रेम करने के आदेश का सवाल है, इस स्टेज पर कोर्ट को विस्तृत कारण दर्ज करने की आवश्यकता नहीं होती और गंभीर संदेह के आधार पर भी चार्ज फ्रेम किया जा सकता है; अतः ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है.

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