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25 साल की उम्र में हुआ सफेद दाग, देवीलाल ने बताया कैसे समाज की सोच से लड़ी असली लड़ाई

सफेद दाग को लेकर समाज में आज भी कई तरह की गलत धारणाएं मौजूद हैं. कई लोग इसे संक्रामक बीमारी समझते हैं. ऐसे माहौल में व्यक्ति त्वचा की स्थिति के साथ समाज की प्रतिक्रियाओं और पूर्वाग्रहों से भी जूझता रहता है.

25 साल की उम्र में हुआ सफेद दाग, देवीलाल ने बताया कैसे समाज की सोच से लड़ी असली लड़ाई
सफेद दाग के साथ देवीलाल ने कैसे बिताए 23 साल. ( Image Source NDTV)

25 जून को विश्व विटिलिगो दिवस (World Vitiligo Day) मनाया जाता है. यह दिन विटिलिगो (सफेद दाग) के बारे में जागरूकता बढ़ाने और उससे जुड़ी सामाजिक धारणाओं व पूर्वाग्रहों पर सवाल उठाने का अवसर है. इसका असर केवल त्वचा तक सीमित न रहकर व्यक्ति के आत्मविश्वास और सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है. 

25 साल की उम्र में शुरू हुई एक लंबी लड़ाई

48 वर्षीय देवीलाल चमोली जिले के रामबगढ़ के रहने वाले हैं. उनके शरीर पर 25 साल की उम्र में सफेद दाग दिखने शुरू हुए थे. शुरुआत में यह बहुत कम था, लेकिन अखबारों में छपने वाले विज्ञापनों और एक बाबा के प्रभाव में आकर उन्होंने कुछ दवाइयां लीं. इसके बाद दाग कम होने के बजाय बढ़ते चले गए.

देवीलाल बताते हैं कि शुरुआती दिनों में उन्हें काफी आत्मग्लानि होती थी. लोगों से मिलने-जुलने में भी झिझक महसूस होती थी. हालांकि अब उन्होंने इसके साथ जीना सीख लिया है.

वह कहते हैं, कोई मुंह पर इस बारे में बात करता है तो बुरा जरूर लगता है, लेकिन पहले की तरह अब मैं इस बारे में इतना नहीं सोचता.

क्या सफेद दाग से बड़ी समस्या लोगों का व्यवहार है?

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Photo Credit: NDTV

सफेद दाग को लेकर समाज में आज भी कई तरह की गलत धारणाएं मौजूद हैं. कई लोग इसे संक्रामक बीमारी समझते हैं. ऐसे माहौल में व्यक्ति त्वचा की स्थिति के साथ समाज की प्रतिक्रियाओं और पूर्वाग्रहों से भी जूझता रहता है.

देवीलाल के मामले में विचार किया जाए तो 23 साल बाद भी इस स्थिति के साथ जी रहे व्यक्ति को किसी टिप्पणी से बुरा लगता है, तो क्या समस्या केवल त्वचा तक सीमित है?

इसी विषय को समझने के लिए हमने एम्स बिलासपुर में मेडिकल सोशल वेलफेयर ऑफिसर रोहित गुप्ता से बात की.

रोहित गुप्ता का कहना है कि विटिलिगो (सफेद दाग) जैसी स्थितियों में सबसे बड़ी चुनौती चिकित्सकीय नहीं, सामाजिक होती है. लोग समय के साथ अपनी स्थिति को स्वीकार करना सीख लेते हैं, लेकिन समाज का व्यवहार उनके आत्मविश्वास और सामाजिक जीवन को लगातार प्रभावित करता रहता है.

वह अमेरिकी समाजशास्त्री चार्ल्स हॉर्टन कूली के 'लुकिंग ग्लास सेल्फ' सिद्धांत का जिक्र करते हैं. सरल शब्दों में, यह सिद्धांत बताता है कि व्यक्ति खुद को अक्सर उसी नजर से देखने लगता है, जैसी नजर उसे समाज की अपने प्रति महसूस होती है. जब किसी व्यक्ति को बार-बार उसकी त्वचा की स्थिति के आधार पर अलग नजर से देखा जाता है या उस पर टिप्पणियां की जाती हैं, तो इसका असर उसके आत्मसम्मान पर पड़ सकता है.

रोहित गुप्ता, विकलांगता अध्ययन के विद्वान माइक ओलिवर के 'सोशल मॉडल ऑफ डिसेबिलिटी' का भी उल्लेख करते हैं. उनके अनुसार किसी व्यक्ति की कठिनाइयों का कारण केवल उसकी शारीरिक स्थिति नहीं होती, बल्कि समाज में मौजूद पूर्वाग्रह और व्यवहार भी उसकी चुनौतियों को बढ़ा सकते हैं.

रोहित का कहना है कि वास्तविक बदलाव तब आएगा जब प्रभावित व्यक्ति और समाज, दोनों मिलकर अपने नजरिये में बदलाव लाएंगे. वैज्ञानिक तथ्यों को स्वीकार करते हुए किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी त्वचा के बजाय उसके व्यक्तित्व, क्षमताओं और योगदान के आधार पर किया जाए.

पद बदलता है तो नजरिया भी बदल जाता है

रोहित गुप्ता एक और महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान दिलाते हैं. उनका कहना है कि समाज का व्यवहार बीमारी या शारीरिक स्थिति से तय न होकर व्यक्ति की सामाजिक पहचान और पद से भी प्रभावित होता है.

यदि कोई व्यक्ति बड़े पद पर हो या समाज में प्रभावशाली माना जाता हो, तो लोग उसी स्थिति को अलग नजर से देखते हैं. वहीं सामान्य व्यक्ति को अक्सर ज्यादा सवालों, टिप्पणियों और पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है.

उनके मुताबिक यह बताता है कि समस्या केवल सफेद दाग नहीं है. सवाल समाज की धारणा और उसके आधार पर होने वाले व्यवहार का भी है.

विटिलिगो (सफेद दाग) कोई संक्रामक बीमारी नहीं है

रोहित गुप्ता का कहना है कि सफेद दाग को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है. लोगों को यह समझना होगा कि यह कोई संक्रामक बीमारी नहीं है. ऐसे लोगों से दूरी बनाने या उन्हें अलग नजर से देखने का कोई चिकित्सकीय आधार नहीं है.

उनका मानना है कि यह परिवार, दोस्त, पड़ोसी और समाज के व्यवहार पर निर्भर करता है कि वह किसी व्यक्ति के जीवन को आसान बनाएं या मुश्किल.

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