हमारे देश के ग्रामीण और दूर दराज के इलाकों में सांप का काटना एक बहुत बड़ी समस्या रहा है. हर साल हजारों लोग सांप के डसने की वजह से अपनी जान गंवा देते हैं या फिर हमेशा के लिए अपाहिज हो जाते हैं. अक्सर देखा जाता है कि समय पर सही इलाज और एंटी स्नेक वेनम (ASV) न मिलने की वजह से मरीज की हालत बिगड़ जाती है. इसी गंभीर परेशानी को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है.
राज्य सरकार ने पूरे महाराष्ट्र में सर्पदंश यानी सांप काटने को "अधिसूचित बीमारी" (Notified Disease) घोषित कर दिया है. सरकार के इस फैसले से अब राज्य के हर कोने में सांप के जहर का इलाज मिलना काफी आसान हो जाएगा.
क्या है नया नियम और अस्पतालों को क्या करना होगा?
इस नए फैसले के लागू होने के बाद अब राज्य के सभी सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों और प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों के लिए कड़े नियम बना दिए गए हैं. अब किसी भी डॉक्टर या अस्पताल के पास अगर सांप काटने का कोई भी संदिग्ध, संभावित या पक्का मामला आता है, तो उसकी पूरी जानकारी तुरंत स्वास्थ्य विभाग को देना अनिवार्य कर दिया गया है. इसके साथ ही अगर किसी मरीज की सांप काटने से मौत होती है, तो उसका पूरा ब्यौरा भी प्रशासन को सौंपना होगा.
महाराष्ट्र के सार्वजनिक स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री प्रकाश अबिटकर ने इस बारे में बात करते हुए कहा कि गांवों और जंगलों से सटे इलाकों में सांप काटने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है. ऐसे में अगर मरीज को समय पर सही डाक्टरी मदद मिल जाए, तो उसकी जान बचाई जा सकती है.
सरकार का मकसद यह है कि राज्य के हर इलाके में नजर रखी जा सके, मरीजों को तुरंत सही इलाज मिले और एंटी स्नेक वेनम की दवाइयों का सही बंटवारा हो ताकि किसी भी सरकारी या प्राइवेट सेंटर पर दवा की कमी न पड़े.

कैसे काम करेगा नया ट्रैकिंग सिस्टम?
सरकार के नोटिफिकेशन के मुताबिक, सभी हेल्थ सेंटर्स और डॉक्टरों को सांप काटने के हर केस की रिपोर्ट अपने जिले के डिस्ट्रिक्ट हेल्थ ऑफिसर या डिस्ट्रिक्ट सिविल सर्जन को भेजनी होगी. यह सारा डेटा डिजिटल तरीके से हेल्थ मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम (HMIS) या इंटीग्रेटेड डिसीज सर्विलांस प्रोग्राम (IDSP) के पोर्टल पर दर्ज किया जाएगा. इस रिपोर्ट में सिर्फ मरीज का नाम ही नहीं, बल्कि कई अहम जानकारियां शामिल होंगी:
- मरीज को एंटी स्नेक वेनम (ASV) की कितनी शीशियां या डोज दी गईं.
- इलाज के बाद मरीज की तबीयत में क्या सुधार हुआ या क्या नतीजा रहा.
- क्या मरीज को किसी बड़े अस्पताल में रेफर करने की जरूरत पड़ी.
- अस्पताल में एंटी वेनम का कितना स्टॉक बचा है और रोजाना कितना इस्तेमाल हो रहा है.
इस पूरे सिस्टम की निगरानी के लिए राज्य, जिला और नगर निगम स्तर पर अलग अलग अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की गई है. राज्य स्तर पर डायरेक्टर (अस्पताल) पूरी व्यवस्था पर नजर रखेंगे. जिला स्तर पर सिविल सर्जन और हेल्थ ऑफिसर जिम्मेदारी संभालेंगे, जबकि नगर निगम इलाकों में मेडिकल ऑफिसर ऑफ हेल्थ इस पूरे काम को देखेंगे.
अस्पतालों को दवाइयों के स्टॉक का रियल टाइम रिकॉर्ड रखना होगा ताकि जिस इलाके में सांप काटने के ज्यादा मामले आ रहे हों, वहां तुरंत अतिरिक्त एंटी वेनम भेजा जा सके.
मौसम और इलाके के हिसाब से बनेगी योजना
सरकार इस जुटाए गए डेटा का बारीकी से विश्लेषण करेगी. इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि साल के किस मौसम में, किस महीने में और किस खास इलाके में सांप काटने की घटनाएं सबसे ज्यादा होती हैं. इस जानकारी के आधार पर सरकार उन खास इलाकों में लोगों को जागरूक करने के लिए स्पेशल कैंपेन चलाएगी और वहां पहले से ही जरूरी दवाइयों और डॉक्टरों का इंतजाम पुख्ता करेगी.
आपको बता दें कि मॉनसून सत्र के दौरान बीजेपी विधायक विक्रम पाचपुते ने विधानसभा में यह मुद्दा पुरजोर तरीके से उठाया था. उन्होंने मांग की थी कि सांप काटने के मामलों, मौतों और इलाज के नतीजों की अनिवार्य ट्रैकिंग होनी चाहिए. सरकार के इस फैसले का स्वागत करते हुए विधायक पाचपुते ने सरकारी हाफकिन संस्थान (Haffkine Institute) को फिर से पूरी क्षमता के साथ शुरू करने की मांग की है, क्योंकि यही एकमात्र संस्थान है जिसके पास सांप का जहर निकालने की कानूनी अनुमति है.
गोल्डन ऑवर और नई तकनीकों पर जोर
विधायक पाचपुते ने इस बात पर भी जोर दिया कि महाराष्ट्र में सिर्फ पॉलीवेलेंट एंटी वेनम पर निर्भर रहने के बजाय खास प्रजातियों के हिसाब से मोनोवेलेंट वैक्सीन तैयार की जानी चाहिए. अलग अलग क्षेत्रों में सांपों के जहर की प्रकृति में थोड़ा अंतर होता है, इसलिए रीजनल एंटी वेनम बैंक बनाए जाने चाहिए ताकि ग्रामीण अस्पतालों को स्थानीय सांपों के हिसाब से सटीक इलाज मिल सके.
उन्होंने सांप काटने के बाद के शुरुआती समय यानी 'गोल्डन ऑवर' के महत्व को बताते हुए कहा कि जहर की पहचान के लिए आरटी पीसीआर (RT PCR) जैसी रैपिड टेस्ट किट की सुविधा भी अस्पतालों में होनी चाहिए ताकि डॉक्टर बिना समय गंवाए सही इलाज शुरू कर सकें.
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