वजन घटा है, यह तो तराजू पर दिख जाता है. लिवर के अंदर क्या हो रहा है, वो नंबर नहीं बताता. द गुड वेट में ओबेसिटी एंड वेट लॉस स्पेशलिस्ट डॉ. नेहा शाह कहती हैं कि यही सबसे बड़ी गलतफहमी है जो मरीज पाल लेते हैं. वजन कम हुआ मतलब लिवर भी सुधर गया, जरूरी नहीं. क्लिनिक में ऐसे मामले अक्सर आते हैं जहां वजन घटने के बावजूद लिवर की रिपोर्ट पहले जैसी ही, या कई बार उससे भी खराब निकलती है.
वजन घटा तो लिवर भी ठीक हो गया, यह सोच कहां गलत है
शरीर में चर्बी दो जगह जमा होती है. त्वचा के नीचे वाली, जिसे subcutaneous fat कहते हैं, और अंगों के आसपास जमा होने वाली visceral fat, जिसमें लिवर की चर्बी भी आती है. तेजी से वजन घटाने पर, फिर चाहे वो क्रैश डाइट हो या GLP-1 जैसी दवाएं, शुरुआत में पानी और मसल मास ज्यादा घटता है. स्किन के नीचे की चर्बी भी साथ में घटती दिखती है. पर लिवर का फैट धीरे चलता है. डॉ. शाह के मुताबिक कई बार वजन आठ-दस किलो तक कम हो चुका होता है, फिर भी लिवर के अल्ट्रासाउंड में फैट पहले जैसा ही दिखता है.
और यह सिर्फ मोटे लोगों की समस्या नहीं है. मेडिकल भाषा में अब इसे MASLD कहते हैं, यानी Metabolic Dysfunction-Associated Steatotic Liver Disease. भारत में हर तीसरे-चौथे वयस्क में यह किसी न किसी स्तर पर मिल रहा है. इनमें से कई लोगों का बॉडी मास इंडेक्स बिल्कुल सामान्य होता है, पतले शरीर वाले लोग भी इसमें शामिल हैं.
सिर्फ तराजू के नंबर पर भरोसा न करें
लिवर में जमा फैट को यूं ही छोड़ दिया जाए तो सूजन बढ़ती है, फिर फाइब्रोसिस, और आखिर में सिरोसिस तक बात पहुंच सकती है. सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि इसमें लक्षण अक्सर नहीं दिखते, सालों तक पता ही नहीं चलता. इसलिए सिर्फ वजन कम होते देखकर यह मान लेना कि अंदर सब ठीक हो रहा है, बड़ी भूल साबित हो सकती है.
कैसे पता चलेगा कि लिवर की चर्बी वाकई घट रही है
यह पता तराजू से नहीं चलेगा. लिवर फंक्शन टेस्ट, यानी ALT और AST के नंबर देखने होंगे. पेट का अल्ट्रासाउंड या फाइब्रोस्कैन भी करवाना चाहिए, इससे फैट के साथ-साथ लिवर की स्टिफनेस का भी पता चलता है. कमर की परिधि में कमी आना एक अच्छा संकेत माना जाता है, वजन से भी ज्यादा भरोसेमंद. ब्लड शुगर और ट्राइग्लिसराइड भी साथ में सुधरने चाहिए. शुरुआत में एक बार टेस्ट करवा लें, फिर हर तीन से छह महीने में दोहराते रहें, खासकर अगर वजन तेजी से घट रहा हो.
लिवर की चर्बी असल में घटती कैसे है
धीरे-धीरे वजन घटाना, हफ्ते में आधा से एक किलो के आसपास, मसल मास को बचाता है और लिवर पर भी बेहतर असर डालता है. प्रोटीन की मात्रा पूरी रखनी होगी, दाल-रोटी हो, पनीर हो या अंडा-मछली-चिकन, ताकि क्रैश डाइटिंग में मसल न पिघले. मैदा और रिफाइंड शुगर से बनी चीजों पर लगाम जरूरी है क्योंकि फ्रक्टोज सीधा लिवर में फैट बनकर जमता है. नाश्ते में पोहा, इडली या बेसन का चीला भारी परांठों से कहीं बेहतर विकल्प है. सिर्फ कार्डियो काफी नहीं, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग भी उतनी ही जरूरी है. शराब कम करना या छोड़ देना मदद करता है. नींद पूरी लेना और तनाव कम रखना भी भूलना नहीं चाहिए, क्योंकि बढ़ा हुआ कोर्टिसोल लिवर में फैट बढ़ाने का काम करता है.
वजन घटना शुरुआत भर है, पूरी कहानी नहीं. असली लक्ष्य मेटाबॉलिक हेल्थ है, यानी लिवर, शुगर, कोलेस्ट्रॉल और मसल मास, इन सबका साथ में सुधरना. अगली बार वजन घटे तो सिर्फ तराजू देखकर खुश मत होइए, लिवर के पैरामीटर भी डॉक्टर से चेक करवा लीजिए.
(यह लेख डॉ. नेहा शाह, ओबेसिटी एंड वेट लॉस स्पेशलिस्ट एवं को-फाउंडर, द गुड वेट, से बातचीत पर आधारित है.)
(डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है. कोई भी बदलाव करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें.)
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