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जब इंसानों से पहले बंदरों को परोसा गया ओणम साध्या, केरल के इस मंदिर में दिखी 53 साल पुरानी अद्भुत परंपरा!

Onam Sadya For Monkeys: सोचिए क्या हो अगर ओणम के मौके पर केले के पत्तों पर छप्पन भोग सजे हों और मेहमान इंसानों की जगह बंदर हों तो? केरल के एक मंदिर में ये खूबसूरत नजारा हर साल देखने को मिलता है. पढ़ें पूरी खबर.

53 सालों से नहीं बदली ये परंपरा, इंसानों ने पकाया और परोसा, फिर बंदरों ने मजे से खाया ओणम महाभोज

Kollam Temple Monkey Feast:  ओणम (onam) का त्योहार हो और साध्या (sadya) का स्वाद न मिले ऐसा तो हो ही नहीं सकता, लेकिन केरल के कोल्लम जिले में स्थित सास्तामकोट्टा (Sasthamkotta) श्री धर्म संस्था मंदिर (Sree Dharma Sastha Temple) में ओणम का जश्न थोड़ा अलग अंदाज में मनाया जाता है. दरअसल, यहां ओणम के खास मौके पर एक अद्भुत परंपरा निभाई गई. यहां इंसानों से पहले मंदिर के बंदरों को केले के पत्तों पर पारंपरिक ओणम साध्या परोसा गया, पिछले 53 सालों से चली आ रही ये प्रथा इंसानियत और बेजुबानों के प्रति प्रेम की मिसाल है.

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केले के पत्तों पर सजा ट्रेडिशनल स्वादिष्ट ओणम साध्या

सास्तामकोट्टा श्री धर्म संस्था मंदिर के उत्तरी हॉल में केले के पत्ते बिछाए जाते हैं. उन पत्तों पर पचड़ी, पायसम, चावल और तरह-तरह के ट्रेडिशनल पकवान परोसे जाते हैं. हर साल उथराडम (Uthradam) और थिरुवोणम (Thiruvonam) के मौकों पर, मंदिर में रहने वाले बंदरों को पारंपरिक ओणम साध्या (traditional Onam sadya) खिलाई जाती है. ये परंपरा 5 दशक से भी ज्यादा समय से चली आ रही है. वीडियो में देखा जा सकता है कि, कैसे मंदिर के उत्तरी हिस्से में बने डाइनिंग हॉल में केले के पत्ते कतार में बिछाए गए और एक-एक करके पकवान परोसे गए. इस बीच आस-पास के पेड़ों की टहनियों, दीवारों और छतों पर बैठे बंदर दावत तैयार होने का इंतजार करते दिखते हैं.

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इंसानों की तरह अपनी बारी का इंतजार करते रहे खास मेहमान

खाना बनने और परोसे जाने के दौरान बंदरों का डिसिप्लिन देखने लायक होता है. वो पेड़ों की डालियों, छत और दीवारों पर बैठकर बड़ी ही शांति से देखते रहते हैं. जब तक पूरा खाना पत्तों पर सज नहीं जाता और लोग दूर नहीं हट जाते, तब तक वो नीचे नहीं आते. सबसे पहले झुंड का सबसे पुराना बंदर 'मुरिवालन' (Murivaalan) नीचे उतरकर खाना चखता है, फिर बाकी बंदर भी अपनी-अपनी जगह पर बैठकर इंसानों की तरह भोजन का लुत्फ उठाते हैं.

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53 सालों से चली आ रही है ये अनोखी और पावन परंपरा

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इन बंदरों का नाता भगवान राम के समय से जोड़ा जाता है. इस अनूठी शुरुआत के पीछे अरविंदाक्षन नायर (Aravindakshan Nair) की सोच थी, जिन्होंने 53 साल पहले भूखे भटकते बंदरों को देखकर ये दावत शुरू की थी. उनका मानना था कि जब हम ओणम पर स्वादिष्ट भोजन करते हैं, तो हमारे साथ रहने वाले ये बेजुबान भूखे नहीं रहने चाहिए.

केरल से अश्विन नंदकुमार की रिपोर्ट...

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