Viral Video: अगर आप कभी हिमाचल प्रदेश के धर्मकोट जाएंगे, तो कुछ ही घंटों में एक अलग ही दुनिया महसूस करेंगे. दुकानों पर हिब्रू भाषा में लिखे बोर्ड, कैफे के मेन्यू में शक्शूका और हमुस, और कुछ दुकानों की घड़ियों में इजरायल का समय. यही वजह है कि लोग इसे 'हिमालय का मिनी इजरायल' कहते हैं. यहां हर साल करीब 20 हजार इजरायली टूरिस्ट आते हैं. सीजन के समय तो यहां एक बार में हजार से ज्यादा इजरायली मौजूद होते हैं, जो इस छोटे से गांव की पूरी रौनक ही बदल देते हैं. हाल ही में यहां पर इजरायली नागरिकों की सुरक्षा के लिए हिमाचल पुलिस ने सिक्योरिटी बढ़ा दी है.
धर्मकोट में क्यों आते हैं इतने इजरायली?
दरअसल, इजरायल में मिलिट्री ट्रेनिंग सबके लिए जरूरी है. नौकरी या पढ़ाई शुरू करने से पहले, वहां के युवा इस मानसिक तनाव से उबरने के लिए लंबी यात्रा पर निकल पड़ते हैं. कम खर्च, अध्यात्म और खूबसूरत वादियों के कारण भारत उनकी पहली पसंद बन गया. इसी तरह गोवा, कसोल और धर्मकोट जैसे ठिकाने इजरायलियों से भरे पड़े रहते हैं.
छोटे से गांव में मिलता है इजरायली खाना
जैसे-जैसे इजरायली सैलानी बढ़े, वैसे-वैसे यहां का ढांचा भी बदला है. उनके पसंदीदा खाने, लंबे समय तक रुकने के लिए गेस्ट हाउस और हिब्रू भाषा के बोर्ड लग गए. यहां तक कि इंटरनेट कैफे में हिब्रू कीबोर्ड भी मिलने लगे. आज आलम यह है कि गांव के कई हिस्सों में स्थानीय बोली से ज्यादा हिब्रू सुनाई देती है. कैफे में इजरायली व्यंजन जैसे शक्शूका, हमुस और लबनेह, भारतीय थाली और योग-ध्यान की सुस्त रफ्तार जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. यहां लोग हफ्ते भर के लिए आते हैं और महीनों रुक जाते हैं.
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कैसे पहुंचे धर्मकोट?
मैक्लोडगंज से धर्मकोट से सिर्फ 1 से 2 किलोमीटर (आसान चढ़ाई या 10 मिनट की टैक्सी) पर है. वहीं, धर्मशाला से धर्मकोट की दूरी करीब 9 से 10 किलोमीटर है. गग्गल एयरपोर्ट से धर्मकोट लगभग 20 किलोमीटर है. दूसरा 'मिनी इजरायल' कसोल से धर्मकोट की दूरी करीब 222 किलोमीटर है.
अगर आप फ्लाइट से आना चाहते हैं तो धर्मकोट के नजदीकी गग्गल एयरपोर्ट (कांगड़ा) दिल्ली से कनेक्टेड है. ट्रेन से आने वाले टूरिस्ट के लिए पठानकोट सबसे पास का बड़ा रेलवे स्टेशन है ( तकरीबन 90 किमी). जहां से मैक्लोडगंज के लिए बसें और टैक्सी आसानी से मिल जाती हैं. अगर आप रोड ट्रिप करना चाहते हैं तो दिल्ली और चंडीगढ़ से मैक्लोडगंज के लिए सीधी बसें चलती हैं. यहां से आगे का रास्ता पैदल या स्थानीय टैक्सी से पूरा कर सकते हैं.
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जाने का सबसे सही समय
मार्च से जून से सबसे शानदार समय होता है. सुहाना मौसम, जो ट्रेकिंग और कैफे में वक्त बिताने के लिए सबसे बेहतरीन है. सितंबर से नवंबर में साफ नजारे देखने को मिलेंगे. मॉनसून के बाद साफ आसमान और वादियों के खूबसूरत नजारे फोटोग्राफी के लिए बेस्ट हैं. दिसंबर से फरवरी में कड़ाके की ठंड और कभी-कभी बर्फबारी. शांति पसंद करने वालों के लिए अच्छा है.
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