सोचिए, आप सिक्का उछालें और कोई आपसे कहे कि हेड आने की गारंटी 120 % है. आप कहेंगे क्या बकवास है. हमारी इस आम दुनिया में किसी भी चीज के होने की उम्मीद यानी संभावना ज्यादा से ज्यादा 100% ही हो सकती है. इससे आगे तो गणित के सारे नियम फेल हो जाते हैं. विज्ञान की जिस रहस्यमयी दुनिया को हम 'क्वांटम फिजिक्स' कहते हैं, वहां हमारी दुनिया के नियम ताक पर रख दिए जाते हैं. और इसी अजीबोगरीब क्वांटम दुनिया में भारत के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जो आने वाले वक्त में पूरी दुनिया की भौतिकी और गणित को हमेशा-हमेशा के लिए बदल कर रख सकता है. इसी बात को जीवनभर महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन को भी परेशान कर रखा था.
बेंगलुरु के रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (RRI) के वैज्ञानिकों ने लैब में एक ऐसा प्रयोग किया है, जिसने सबको हैरान कर दिया है. उन्होंने एक ऐसी क्वांटम वैल्यू को नापा है, जो 1.17 आई है. यानी हमारी आम दुनिया की 100 परसेंट (यानी 1) की लक्ष्मण रेखा को पार कर गई है. साइंस जर्नल 'क्वांटम' में छपी यह खोज इतिहास में पहली बार हुई है, जब वैज्ञानिकों ने लैब के अंदर इस जादुई आंकड़े को छूने में सफलता पाई है.
अब आप सोच रहे होंगे कि क्या वैज्ञानिकों ने 100% से ज्यादा की संभावना खोज ली है? तो जवाब है, नहीं. कुदरत के नियम इतनी आसानी से नहीं टूटते. दरअसल, वैज्ञानिकों ने जिस चीज को नापा है, वह कोई साधारण संभावना नहीं है. उन्होंने क्वांटम कणों के उस बर्ताव को रिकॉर्ड किया है, जिसे 'इंटरफेरेंस' यानी दो रास्तों के बीच का टकराव और मिलाप कहते हैं.

आइए इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं
हमारी इस दुनिया में अगर आपको दिल्ली से मुंबई जाना है, तो आप एक बार में किसी एक ही रास्ते से जाएंगे. लेकिन क्वांटम की नन्हीं दुनिया में ऐसा नहीं होता. वहां प्रकाश का एक बेहद बारीक कण यानी 'फोटॉन', एक ही समय में अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए जितने भी मुमकिन रास्ते हैं, उन सब पर एक साथ चल सकता है.
रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने इसी प्रकाश के कण 'फोटॉन' के साथ यह अनोखा खेल खेला. उन्होंने लैब में लेजर लाइट और कांच के टुकड़ों का एक जाल बुना. इस सेटअप में फोटॉन के चलने के कई रास्ते थे. वैज्ञानिकों ने प्रकाश के एक खास गुण, जिसे पोलराइजेशन (ध्रुवीकरण) कहते हैं, उसका इस्तेमाल करके इन रास्तों को अलग किया. इसके बाद उन्होंने एक ऐसी फिल्टरिंग तकनीक अपनाई, जिससे ये रास्ते आपस में टकराने लगे, बिल्कुल वैसे ही जैसे पानी में उठने वाली दो लहरें मिलकर एक बड़ी लहर बन जाती हैं.
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जब ये क्वांटम लहरें आपस में मिलीं, तो वैज्ञानिकों ने जिस वैल्यू को रिकॉर्ड किया, वह थी 1.17. यह गणित के उस सिद्धांत के बेहद करीब है जिसे 'क्वांटम मेजर थ्योरी' कहा जाता है, जहां गणितीय अनुमान 1.18 का था.
तो फिर यह एक से ऊपर कैसे चला गया? क्योंकि यह साधारण संभावना नहीं, बल्कि क्वांटम की दुनिया का अपना एक विशेष पैमाना है. प्रकाश के कण के पाए जाने की संभावना आज भी 100% के अंदर ही है. लेकिन जो पैमाना एक के पार गया है, वह उन अलग-अलग रास्तों के बीच का जादुई तालमेल है.

यह खोज इतनी बड़ी क्यों है?
अब तक 'क्वांटम मेजर थ्योरी' सिर्फ ब्लैकबोर्ड पर लिखे फॉर्मूलों और गणित की किताबों तक सीमित थी. भारत के वैज्ञानिकों ने पहली बार इसे लैब में सच करके दिखा दिया है. यह खोज इसलिए भी अहम है क्योंकि यह हमें ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्य 'क्वांटम ग्रेविटी' को समझने के करीब ले जा सकती है, जिसने अल्बर्ट आइंस्टीन को भी जीवनभर परेशान किया था.
वैज्ञानिकों का साफ कहना है कि उन्होंने अभी क्वांटम ग्रेविटी की गुत्थी सुलझाई नहीं है, लेकिन उन्होंने उस बंद दरवाजे की चाबी जरूर खोज ली है जो हमें क्वांटम दुनिया की नई और अनसुनी जानकारियां दे सकती है. भविष्य में इसका इस्तेमाल सुपरफास्ट क्वांटम कंप्यूटर बनाने में हो सकता है. फिलहाल, सबसे बड़ी बात यह है कि भारत के वैज्ञानिकों ने साबित कर दिया है कि क्वांटम की अनोखी दुनिया हमारी सोच से भी कहीं ज्यादा जादुई और रोमांचक है.
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