एक समय ब्रिटिश साम्राज्य महाशक्तियों में से एक था. लेकिन धीरे-धीरे जब साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा और आजादी की मांग उठने लगीं तो ब्रिटिश साम्राज्य ने 'बांटने का रास्ता' अपनाया. आयरलैंड बांटा. भारत और पाकिस्तान को भी बांटा. फिलिस्तीन को भी बांटने का प्रस्ताव दिया. लेकिन आज इसी यूनाइटेड किंगडम पर अपने ही बंटवारे का संकट खड़ा हो गया है.
यूनाइटेड किंगडम में आज भी इंग्लैंड के अलावा स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड शामिल हैं. और अब तीनों ही UK से आजाद होने की मांग कर रहे हैं.
सोमवार को वेल्स, स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड के नेताओं ने सोमवार को एक ऐसे समझौते पर दस्तखत किए, जिससे UK के टूटने का खतरा पैदा हो गया है. तीनों के नेताओं ने प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम और UK सरकार से संवैधानिक बदलाव के लिए तैयार रहने को कहा है.
चल क्या रहा है UK में?
सोमवार को स्कॉटिश नेशनल पार्टी के जॉन स्विनी, वेल्स की प्लेड सिमरू पार्टी की रून एप आयरवर्थ और उत्तरी आयरलैंड की सिन फेन की मिशेल ओ'नील की मीटिंग हुई.
इस मीटिंग में तीनों के बीच एक समझौते पर दस्तखत हुए. इस समझौते में लिखा है- 'इससे साफ संकेत और क्या हो सकता है कि वेस्टमिंस्टर (संसद) का समय अब खत्म हो गया है.'
इसके जरिए उन्होंने UK की सरकार को चेतावनी दे दी है और कह दिया है कि संवैधानिक बदलाव के लिए तैयार रहें. यह पहली बार है जब तीनों देशों के नेता या तो आजादी के समर्थक हैं या उत्तरी आयरलैंड को एक करना चाहते हैं.
आज तीनों अलग होना चाहते हैं. हालांकि, प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम के प्रवक्ता टॉम वेल्स UK के बंटवारे के खतरे को खारिज कर दिया है.

यही UK कई बंटवारों का कारण रहा है!
हालांकि, आज जिस UK पर खुद बंटवारे का संकट मंडरा रहा है, वही UK दुनिया में कई बंटवारों का कारण भी बना है. सबसे बड़ा उदाहरण भारत-पाकिस्तान और इजरायल-फिलीस्तीन है. लेकिन इससे भी पहले अंग्रेजों ने भारत के बंगाल को दो हिस्सों में बांटा था.
1905 में भारत में ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड कर्जन ने बंगाल को दो हिस्सों में बांट दिया था. इतिहास में इसे 'बंग-भंग' भी कहा जाता है. दो हिस्सों में बांटकर एक को पश्चिम बंगाल और दूसरे को पूर्वी बंगाल और असम बना दिया गया था.
बंगाल के बंटवारे को ब्रिटिश सरकार ने 'प्रशासनिक सुविधा' बताया लेकिन असल में यह अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' वाली नीति थी.
इस बंटवारे का देशभर में जमकर विरोध हुआ. अंग्रेजी सामानों का बहिष्कार हुआ. आखिरकार अंग्रेजों को झुकना पड़ा और 12 दिसंबर 2011 को दिल्ली दरबार में इस बंटवारे को रद्द करने का ऐलान किया. उसी दिन अंग्रेजों ने अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली करने की भी घोषणा की.
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भारत और पाकिस्तान का भी बंटवारा
भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के लिए भी अंग्रेजों को ही जिम्मेदार माना जाता है. इतिहासकारों का मानना है कि भारत और पाकिस्तान के बंटवारे की नींव कोई रातोरात नहीं रखी गई थी, बल्कि यह अंग्रेजों की ही 'फूट डालो और राज करो' की नीति का नतीजा था.
1857 की क्रांति के बाद अंग्रेज समझ गए थे कि भारत पर राज करने के लिए हिंदू-मुस्लिम में फूट डालना जरूरी है. इसके लिए अंग्रेजों ने फूट डाली. मुस्लिम लीग को भी शह दी. दूसरे विश्व युद्ध के बाद मोहम्मद अली जिन्ना को राजनीतिक महत्व दिया गया.
जब बात बिगड़ने लगी और बंटवारा ही एकमात्र रास्ता बचा तो माउंटबेटन को सत्ता हस्तांतरण के लिए बहुत कम समय दिया गया. भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारे की लाइन खींचने वाले सिरिल रैडक्लिफ को सिर्फ 5 हफ्ते का समय मिला. पंजाब और बंगाल के बीच जल्दबाजी में बंटवारा किया गया.
इजरायल और फिलिस्तीन को बांटा
पहले विश्व युद्ध के बाद ओटोमन साम्राज्य खत्म हो गया और मिडिल ईस्ट के ज्यादातर इलाकों पर ब्रिटेन और फ्रांस का कब्जा हो गया.
लेकिन ब्रिटेन के ही एक वादे ने मिडिल ईस्ट में एक ऐसी जंग की शुरुआत कर दी, जो आज तक चल रही है. ब्रिटेन ने फिलिस्तीन में यहूदी मुल्क बनाने का वादा किया था. लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद तक ऐसा नहीं हो सका. फिर हिटलर की नाजी सेना के अत्याचारों के कारण यहूदियों के लिए अलग मुल्क की मांग और तेज हो गई.
जब मांग तेज हुई तो 15 मई 1947 को ब्रिटेन ने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र के सामने रख दिया. आगे चलकर संयुक्त राष्ट्र में एक प्रस्ताव पास हुआ. यह प्रस्ताव था फिलिस्तीन के बंटवारे का. प्रस्ताव के तहत एक हिस्सा अरब मुल्क और दूसरा हिस्सा यहूदी मुल्क बना, जबकि येरूशलम पर अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण की बात थी.
संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव पास होने के बाद ब्रिटेन ने फिलिस्तीन की आजादी का ऐलान कर दिया. 15 मई 1948 को फिलिस्तीन को ब्रिटेन से आजादी मिली लेकिन एक रात पहले ही 14 मई को यहूदी नेता डेविड बेन-गुरियों ने यहूदियों के लिए अलग मुल्क का ऐलान कर दिया, जिसका नाम इजरायल रखा गया.
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आयरलैंड का भी किया गया बंटवारा
1801 में आयरलैंड पर भी ब्रिटिश हुकूमत लागू हो गई. लेकिन एक सदी बाद आयरलैंड के एक हिस्से में आजादी की मांग होने लगी.
यहां भी जब बात बिगड़ने लगी तो ब्रिटिश संसद ने गवर्नमेंट ऑफ आयरलैंड एक्ट 1920 पास किया और आयरलैंड का बंटवारा कर दिया. आयरलैंड के दो हिस्से बने- दक्षिणी आयरलैंड और उत्तरी आयरलैंड.
दक्षिणी आयरलैंड वह हिस्सा था, जहां आजादी की मांग हो रही थी. इसमें आयरलैंड की 32 में से 26 काउंटी रही. जबकि, उत्तरी आयरलैंड अब भी UK का ही हिस्सा रहा. 1949 में दक्षिणी आयरलैंड 'रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड' बन गया.
... क्या अब UK भी बंटेगा?
कई बंटवारों का जिम्मेदार रहा UK अब खुद बंटवारे के खतरे का सामना कर रहा है. हालांकि, यह सब इतना आसान नहीं है.
ग्लासगो यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी की डायरेक्टर निकोला मैकइवेन ने कहा कि तीनों नेताओं का मिलना प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण था, लेकिन इसका कोई कानूनी महत्व नहीं है.
1990 के दशक के आखिर में UK ने कई ऐसे कानून पास किए, जिससे वेल्स, स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड को कुछ अधिकार मिले. सबकी अपनी-अपनी सरकारें हैं और संसद काफी हद तक फैसले लेती है. लेकिन पूरी तरह से आजाद नहीं हैं और UK से मंजूरी की जरूरत पड़ती है.
ऐसा नहीं है कि UK के अंदर आजादी की मांग पहली बार उठी है. स्कॉटलैंड ने 2014 में अलग होने की नाकाम कोशिश की थी, जिसमें 55% लोगों ने अलग होने की मांग खारिज कर दी थी.
वहीं, 1998 के गुड फ्राइडे शांति समझौते ने नॉर्दर्न आयरलैंड ने भी इसके एकीकरण को और मुश्किल बना दिया. समझौते के तहत, अगर वहां के सर्वे यह संकेत देते हैं कि एकीकरण का प्रस्ताव पारित होने की संभावना है, तो एकीकरण पर वोट कराना जरूरी है. UK सरकार का कहना है कि यह शर्त अभी पूरी नहीं हुई है. आयरलैंड को भी जनमत संग्रह में इस बदलाव को मंजूरी देनी होगी.
निकोला मैकइवेन का कहना है कि इन तीनों के साथ आने का सबसे बड़ा असर यह हो सकता है कि वे नियमित रूप से एक-दूसरे के साथ सहयोग करने पर सहमत हों और इससे यूके सरकार पर ज्यादा असर डालने में मदद मिल सकती है.
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