कभी परमाणु तकनीक की अवैध सप्लाई को लेकर बदनाम रहे पाकिस्तान को अब दुनिया की प्रमुख परमाणु निगरानी संस्था IAEA यानी International Atomic Energy Agency से बड़ी राहत मिली है. IAEA की टीम ने पाकिस्तान की नागरिक परमाणु सुरक्षा व्यवस्था को 'मजबूत' यानी robust बताया है. लेकिन भारत में रणनीतिक मामलों के एक्सपर्ट्स इस हरी झंडी को लेकर सतर्क हैं. उनका कहना है कि IAEA की जांच का दायरा सीमित था और इसमें पाकिस्तान के परमाणु हथियार या सैन्य परमाणु ठिकाने शामिल नहीं थे. यही वजह है कि कभी A.Q. Khan के नेटवर्क के कारण 'Nuclear Walmart' कहलाए पाकिस्तान को मिली इस तारीफ के बावजूद भारत के सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं.
IAEA ने पाकिस्तान को क्यों दी हरी झंडी?
IAEA की International Physical Protection Advisory Service यानी IPPAS ने पहली बार पाकिस्तान में परमाणु सुरक्षा का रिव्यू मिशन पूरा किया है. यह मिशन पाकिस्तान सरकार के अनुरोध पर 28 सितंबर से 9 अक्टूबर 2026 तक चला. 12 दिनों की समीक्षा के बाद अंतरराष्ट्रीय टीम ने कहा कि पाकिस्तान ने परमाणु सामग्री और परमाणु प्रतिष्ठानों की भौतिक सुरक्षा के लिए एक मजबूत परमाणु सुरक्षा व्यवस्था बनाई है. जिस नागरिक परमाणु सुविधा का टीम ने जायजा लिया, वहां इन सुरक्षा इंतजामों को उचित तरीके से लागू होते पाया गया. IAEA के मुताबिक पाकिस्तान समय-समय पर इसकी समीक्षा करता है और इंतजामों में कहीं खामी होती है तो उसे दुरुस्त भी करता है. हालांकि इसके साथ ही टीम ने प्रक्रियाओं और सुरक्षा इंतजामों को और मजबूत करने के लिए कुछ सिफारिशें और सुझाव भी दिए.
भारतीय एक्सपर्ट बोले- 'Nuclear Walmart' को मत भूलिए
भारत के लिए पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी किसी भी इंटरनेशनल रिपोर्ट की अहमियत ज्यादा है. दोनों देश परमाणु हथियार संपन्न पड़ोसी हैं और इनके बीच युद्ध से लेकर सैन्य टकराव तक का लंबा इतिहास रहा है. हाल में Operation Sindoor के दौरान भी दोनों के बीच तनाव बढ़ा था.यही वजह है कि पाकिस्तान के परमाणु सुरक्षा रिकॉर्ड को लेकर IAEA का सकारात्मक आकलन भारत में भी करीब से देखा जा रहा है. NDTV से नाम न जाहिर करने की शर्त पर बात करने वाले एक वरिष्ठ भारतीय विशेषज्ञ के मुताबिक, पाकिस्तान की परमाणु सुविधाओं पर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के अनुसार IAEA की जांच दुनिया के लिए भरोसा बढ़ाने वाला कदम है. खास तौर पर पाकिस्तान में आतंकी संगठनों की संवेदनशील परमाणु सामग्री तक संभावित पहुंच को लेकर रही चिंताओं के संदर्भ में इसका महत्व है.
आखिर पाकिस्तान को क्यों कहा गया 'Nuclear Walmart'?
इसकी जड़ पाकिस्तान के मशहूर परमाणु वैज्ञानिक डॉ. अब्दुल कादिर खान यानी A.Q. Khan से जुड़े नेटवर्क में है. A.Q. Khan को पाकिस्तान में परमाणु बम कार्यक्रम के प्रमुख चेहरों में गिना जाता था. लेकिन बाद में हुई जांच में उनके नेटवर्क के जरिए यूरेनियम संवर्धन की तकनीक, सेंट्रीफ्यूज के डिजाइन और दूसरी संवेदनशील परमाणु जानकारियां दूसरे देशों तक पहुंचाए जाने की बात सामने आई. यह नेटवर्क कई महाद्वीपों तक फैला हुआ था. इसमें फ्रंट कंपनियों, बिचौलियों और गुप्त सप्लाई चेन का इस्तेमाल किया गया. अंतरराष्ट्रीय जांच में इसके तार ईरान, लीबिया और उत्तर कोरिया तक पहुंचे. 2003 में लीबिया के परमाणु कार्यक्रम छोड़ने के बाद इस नेटवर्क के कई अहम पहलू सामने आए. इसी संदर्भ में CIA के पूर्व डायरेक्टर George Tenet ने 'Nuclear Walmart' जैसी उपमा का इस्तेमाल किया था, यानी ऐसी जगह जहां अलग-अलग खरीदारों तक परमाणु तकनीक और विशेषज्ञता पहुंच रही थी.
A.Q. Khan ने टीवी पर मानी थी जिम्मेदारी
अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने के बाद पाकिस्तान ने A.Q. Khan के खिलाफ जांच शुरू की. फरवरी 2004 में उन्होंने राष्ट्रीय टेलीविजन पर बिना अनुमति परमाणु तकनीक फैलाने की गतिविधियों की जिम्मेदारी स्वीकार की. इसके बाद भी तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने उन्हें माफी दे दी, हालांकि उन्हें घर में नजरबंद रखा गया. पाकिस्तान का कहना रहा कि ये गतिविधियां सरकार की मंजूरी के बिना की गई थीं. इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठते रहे कि कई देशों में फैला इतना बड़ा नेटवर्क बिना जानकारी के आखिर कैसे काम करता रहा. कुल मिलाकर इस पूरे एपिसोड ने पाकिस्तान की परमाणु व्यवस्था की निगरानी, जवाबदेही और सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए और उसकी साख को भारी नुकसान पहुंचाया.
किन देशों के एक्सपर्ट थे टीम में?
सात सदस्यों वाले मिशन का नेतृत्व मोरक्को की परमाणु और रेडियोलॉजिकल सुरक्षा संस्था के पूर्व डायरेक्टर जनरल Khammar Mrabit ने किया.इसमें चीन, रोमानिया, रूस और स्लोवाकिया के विशेषज्ञों के साथ IAEA के दो कर्मचारी भी शामिल थे. IAEA की Deputy Director General और Department of Nuclear Safety and Security की प्रमुख Karine Herviou ने कहा कि पाकिस्तान में पहला IPPAS मिशन सफलतापूर्वक पूरा होना उसकी परमाणु सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की प्रतिबद्धता दिखाता है. उन्होंने परमाणु सुरक्षा से जुड़े कर्मचारियों की ट्रेनिंग और उनके विकास में पाकिस्तान के योगदान की भी सराहना की.
लेकिन क्या पाकिस्तान के परमाणु हथियार भी जांचे गए?
नहीं. और भारत के नजरिए से इस पूरी रिपोर्ट को समझने के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण बात है. IPPAS मिशन ने पाकिस्तान के परमाणु हथियारों वाले ठिकानों का निरीक्षण नहीं किया. इसका दायरा नागरिक परमाणु सामग्री, नागरिक परमाणु प्रतिष्ठानों और उनसे जुड़ी सुरक्षा एवं नियामक व्यवस्था तक सीमित रहा. पाकिस्तान Nuclear Non-Proliferation Treaty यानी NPT में परमाणु हथियार संपन्न देश के रूप में शामिल नहीं है. इसी वजह से उसके रणनीतिक परमाणु हथियार और उनसे जुड़ी सैन्य सुविधाएं इस IPPAS समीक्षा के दायरे में नहीं थीं. इसलिए IAEA के सकारात्मक आकलन को पाकिस्तान के पूरे परमाणु कार्यक्रम या उसके Nuclear Weapons Programme की क्लीन चिट के तौर पर नहीं देखा जा सकता. Bulletin of the Atomic Scientists के Nuclear Notebook के आकलन के मुताबिक पाकिस्तान के पास करीब 170 परमाणु हथियार होने का अनुमान है. वास्तविक संख्या सार्वजनिक नहीं है.
IAEA की हरी झंडी, लेकिन भारत की चिंता खत्म नहीं
पाकिस्तान के लिए IAEA का यह आकलन महत्वपूर्ण उपलब्धि है. कभी A.Q. Khan के परमाणु नेटवर्क के कारण दुनिया भर में बदनामी झेलने वाले पाकिस्तान की नागरिक परमाणु सुरक्षा व्यवस्था को अब अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की टीम ने मजबूत बताया है. लेकिन तस्वीर का दूसरा हिस्सा भारत के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है. IAEA ने उन सैन्य परमाणु ठिकानों या परमाणु हथियारों की जांच नहीं की, जिन्हें लेकर पाकिस्तान की परमाणु ताकत और सुरक्षा संबंधी सबसे संवेदनशील सवाल जुड़े हैं. इसलिए कहानी सिर्फ इतनी नहीं है कि IAEA ने पाकिस्तान को 'हरी झंडी' दे दी. असली बात यह है कि हरी झंडी नागरिक परमाणु सुरक्षा व्यवस्था के सीमित दायरे में मिली है, जबकि पाकिस्तान के सैन्य परमाणु कार्यक्रम पर IAEA की इस समीक्षा से कोई निष्कर्ष नहीं निकलता. यही फर्क भारत की सतर्कता की वजह है. पाकिस्तान भले ही परमाणु सुरक्षा पर अंतरराष्ट्रीय संस्था से सकारात्मक आकलन हासिल कर चुका हो, लेकिन भारतीय विशेषज्ञों के लिए A.Q. Khan नेटवर्क और 'Nuclear Walmart' का इतिहास अभी पुराना नहीं पड़ा है.
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