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ईरान के बाद कहां युद्ध? ग्रीनलैंड, क्यूबा, ताइवान, कोरिया...195 देशों की दुनिया में 100 से ज्यादा सीमा विवाद

ट्रंप ने नाटो देशों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. वो उन्हें धमकी दे रहे हैं. कायर कह रहे हैं. अगर अमेरिका अपने रूख पर कायम रहा. यूरोप से नाटो की सुरक्षा शील्ड हटी तो यहां भी स्थितियां बदल सकती हैं. तब दुनिया में युद्ध और कॉनफ्लिक्ट का नक्शा तेजी से बदलेगा.

ईरान के बाद कहां युद्ध? ग्रीनलैंड, क्यूबा, ताइवान, कोरिया...195 देशों की दुनिया में 100 से ज्यादा सीमा विवाद
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में चल रही आधी जंग के जिम्मेदार ये तीन देश हैं.
  • 2026 में अमेरिका की नीति में बदलाव और ट्रंप प्रशासन के सैन्य कदमों के कारण विश्व युद्ध की आशंका बढ़ी है
  • अमेरिका ने वेनेजुएला पर ड्रग तस्करी का बहाना बनाकर सैन्य हमला किया और वहां के संसाधनों पर नियंत्रण किया है
  • माना जा रहा है कि ईरान युद्ध तो सिर्फ शुरूआत है, इसके बाद और कई देशों पर अमेरिका, रूस, चीन हमला कर सकते हैं

जब भी कोई बड़ा देश किसी दूसरे बड़े देश पर हमला करता है तो महायुद्ध और वर्ल्ड वॉर को लेकर अटकलें लगती रहती हैं. मगर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से अब तक हुए कई युद्ध होने के बाद भी ऐसा नहीं हो पाया. कारण सोवियत रूस और अमेरिका ने हमेशा एक-दूसरे से सीधे टकराने से खुद को रोके रखा और दूसरा संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन, जिन्हें ताकतवर मुल्कों ने खुद ही तीसरा विश्वयुद्ध रोकने के लिए बनाया था. मगर 2026 अलग है. नाटो अमेरिका का साथ ईरान युद्ध में छोड़ता दिख रहा है और सोवियत रूस से टूटा रूस अपनी ताकत बढ़ाने के लिए अकेले चार सालों से लड़ रहा है. चीन खुद अपनी ताकत तो बढ़ा ही रहा है, रूस को भी पीछे से सपोर्ट कर रहा है. ऐसे में दुनिया भर में युद्ध शुरू हो गए हैं या होने वाले हैं.  

दुनिया में कुल 195 देश, 135 से 150 लड़ रहे

दुनिया के नक्शे को अगर विवाद और युद्ध की दृष्टि से देखें तो 100 सीमा और क्षेत्रीय विवाद हैं. नस्ली विवाद में 61 स्टेट एक्टर्स के बीच विवाद हैं, तो 74 नॉन स्टेट एक्टर्स विवाद बढ़ा रहे हैं.  40 से 70 ऐसे एथिनिक विवाद हैं, जो लंबे समय से चल रहे हैं. 62 ऐसे देश हैं, जहां धार्मिक उत्पीड़न और भेदभाव की वजह से विवाद है. 20 से 30 धार्मिक संघर्ष दुनिया में लंबे समय से जारी हैं. 300 से 500 ऐसे विवाद हैं, जिनकी वजह आर्थिक है. उपासला कॉनफ्लिक्ट डेटा प्रोग्राम और पीस रिसर्च इन्स्टीट्यूट ओस्लो के मुताबिक दुनिया में 61 आर्म्ड कनफिलिक्ट चल रहे हैं, जिसमें सरकारें शामिल हैं. 74 ऐसे संघर्ष हैं, जिसमें नॉन स्टेट एक्टर एक्टिव हैं. 2024 के डेटा के मुताबिक दुनिया में कुल मिलाकर 135 से 150 सक्रिय संघर्ष हैं और दुनिया में 8 से 10 बड़े युद्ध चल रहे हैं. 100 से ज्यादा सीमा विवाद हैं, जो एक या एक से ज्यादा देशों के बीच हैं. याद रखिए दुनिया में केवल 195 देश हैं.

हर चौथे विवाद में अमेरिका

यहां एक रोचक आंकड़ा है वो ये कि दुनिया के विवाद और युद्ध की ऐसी लिस्ट बनायी जाए, जिसमें विश्वशक्तियां शामिल हैं या उनकी कोई भूमिका है तो पता चलता है कि अमेरिका का सबसे ज्यादा दुनिया के देशों से है. दुनिया के विवादों में यहां जानिए कितने प्रतिशत किस देश का हाथ-

  • 25-30% में अमेरिका
  • 10-15% में चीन
  • 10% में रूस
  • 70-75% क्षेत्रीय कॉनफ्लिक्ट हैं
  • 10-15% धार्मिक कॉनफ्लिक्ट हैं
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ट्रंप के आने से बढ़ा डर

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नयी दुनिया की शुरूआत कर दी है. जिसमें हर विवाद के जज ट्रंप हैं. हर समस्या का समाधान ट्रंप हैं. शांति के दूत ट्रंप हैं. युद्ध रोकने वाली सबसे बड़ी शक्ति भी ट्रंप हैं. दुनिया का विकास और विनाश सब ट्रंप में समाहित है. वही पुण्य का फल देते हैं और पापी को दंड. यानी खाता न बही जो ट्रंप कहें वही सही. डोनाल्ड ट्रंप बिना संकोच और लिहाज के किसी भी राष्ट्र के प्रमुख से बात करते हैं. किसी भी राष्ट्र को धमकी देते हैं. वो रलिव-सलिव या गलिव- की शैली पर काम कर रहे हैं. वो साफ बोलते हैं कि “हमारी शर्तों पर रहो, नहीं तो भाग जाओ, वरना मारे जाओगे."

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ट्रंप सुबह कुछ कहते हैं. शाम को कुछ कहते हैं. एक ही मुद्दे पर एक आदमी के बारे में अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग बातें करते हैं. दुनिया कन्फ्यूज है कि किस बात पर विश्वास करें और किसे झूठा समझें. समस्या ये है कि ट्रंप की किसी बात को हल्के में भी नहीं लिया जा सकता है. टैरिफ और वेनेजुएला के मुद्दे पर उन्होंने जो कहा, वो कर दिया. जबकि दुनिया को लग रहा था कि ट्रंप ऐसा नहीं कर सकते हैं. अमेरिका को फिर से ग्रेट बनाने के क्रम में ट्रंप के वेनेजुएला सरप्राइज ने अच्छे अच्छों के होश उड़ा दिए हैं.

ट्रंप का वेनेजुएला सरप्राइज

11 अगस्त 2017 – ट्रंप ने पहली बार वेनेजुएला के खिलाफ बड़ा बयान दिया था, जिसमें उन्होंने “Military Option” की बात कही थी. तब वेनेजुएला सरकार ने इसे “सार्वभौमिकता के खिलाफ चरम हमला” कहा था. ट्रंप जब दोबारा राष्ट्रपति बने तो वो अपनी पुरानी बात नहीं भूले थे. उन्होंने 20 जनवरी 2025 – को एक Executive Order निकाला, जिसने वेनेजुएला के ड्रग कार्टेल और क्राइम सिंडिकेट्स को विदेशी आतंकी संगठन घोषित करने की नींव डाल दी. फरवरी 2025 में ट्रंप प्रशासन ने 8 लैटिन अमेरिकी क्राइम संगठनों को FTO घोषित कर दिया. अगस्त 2025 में वेनेजुएला के इर्द-गिर्द युद्धपोतों की तैनाती कर दी. जिसमें अमेरिका के तीन गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर शामिल थे. जल्द ही यह संख्या बढ़ाकर 6000 से अधिक मैरिन्स और तीन एंफिबियन असॉल्ट शिप तक पहुंचा दी गई. फिर 2 सितंबर 2025 वेनेजुएला तट से निकली पहली नाव पर मिसाइल स्ट्राइक की गई. इस नाव को ड्रग बोट बताया गया. सितंबर 2025 से दिसंबर 2025 के बीच में अमेरिका ने 35 मिलिट्री स्ट्राइक्स की. सबके निशाने पर वो नाव थीं, जिन पर अमेरिका ड्रग तस्करी का आरोप लगा रहा था. इन हमलों में कम से कम 115 लोग मारे गए.

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इसी दौरान धीरे-धीरे कैरिबियन समुद्र में अमेरिका ने अपना मिलिट्री बिल्डअप काफी बड़ा कर लिया. युद्धपोत, पनडुब्बियां, F‑35 लड़ाकू विमान बढ़ाए गए. फिर लगभग एक साल की तैयारी के बाद अमेरिका ने अपना सुपर दांव चल दिया. 3 जनवरी 2026 को अमेरिका ने वेनेजुएला पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमला किया. वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिसिलिया फ्लोरेस को गिरफ्तार किया गया. दोनों को उठाकर अमेरिका ले आए और वहां की अदालत में उनके खिलाफ मुकदमा शुरू कर दिया. नार्को‑टेररिज़्म और ड्रग तस्करी के आरोप तय किए गए.

ड्रग्स बहाना, मिनरल निशाना?

ये बात सार्वजनिक है कि दुनिया में वेनेजुएला की पहचान हाई रिसोर्स नेशन के रूप में की जाती है. पेट्रोलियम भंडार की लिस्ट में नंबर वन है. सोना उत्पादन में 28वें नंबर पर है. कोयला उत्पादन में 69वें नंबर पर है. क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में भी वेनेजुएला की पहचान होती है. पिछले कुछ सालों में चीन के साथ वेनेजुएला का व्यापार काफी ज्यादा बढ़ा है और पेट्रोलियम सेक्टर इसके शीर्ष में है. तो इस तरह से एक बात सामने आती है कि अमेरिका ने वेनेजुएला को ड्रग की तस्करी के नाम पर घेरा और आखिर में वहां के शासक को बदल कर संसाधान पर अपना कंट्रोल कर लिया. जिससे एक बात साफ हो गई कि अगर चीन से नजदीकियां बढ़ाओगे तो अमेरिका के निशाने पर आ जाओगे.

ईरान की रूस-चीन से नजदीकियां

ईरान के साथ जो लड़ाई हुई, उसमें एक बड़ी वजह चीन के साथ ईरान की नजदीकियां बताई जाती हैं. चीन ईरान से बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम ले रहा है. आपको याद होगा कि जब होर्मुज गलियारे पर युद्ध पहुंचा और दुनिया के लिए जाने वाले तेल-गैस की सप्लाई पर संकट आया तो भी ईरान ने होर्मुज गलियारे से केवल चीन के जहाजों को निकलने की इजाजत दी थी. दावा है कि ईरान अपने ऊपर लगे प्रतिबंधों से निपटने के लिए भी चीन के साथ अघोषित व्यापार करता है, जिसका लेन-देन चीनी मुद्रा युआन में होता है. इससे अलग ईरान के मिसाइल और डिफेंस कार्यक्रम में भी चीन की भूमिका देखी जाती है. ईरान ने अपने खास शाहेद ड्रोन रूस को दिए थे, जिनका इस्तेमाल यूक्रेन के खिलाफ किया गया. दावा तो ये भी है कि ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई का इलाज रूस में चल रहा है, जो अमेरिका के हमले में बुरी तरह घायल हो गए थे.

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नॉर्थ कोरिया की रूस-चीन की नजदीकियां

नॉर्थ कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन के साथ अमेरिका की दुश्मनी की दो बड़ी वजह हैं. पहला वो अमेरिका के दोस्त साउथ कोरिया का दुश्मन है. दूसरा ये कि नॉर्थ कोरिया कड़े से कड़े प्रतिबंधों के बावजूद मिसाइल और बम तैयार करता है. इसके पीछे चीन और रूस को ही जिम्मेदार माना जाता है. किम जोंग उन चीन की उस परेड में भी शामिल थे, जिसे चीन ने दुनिया को अपनी शक्ति का परिचय देने के लिए आयोजित किया था. इसे चीन में विक्ट्री डे मिलिट्री परेड कहा जाता है. इसे चीन अस्सी साल से मना रहा है. ये जापान की हार की वर्षगांठ पर मानाया जाता है. 80वीं विक्ट्री डे परेड में पुतिन, जिनपिंग और किम जोंग उन एक साथ दिखे थे. आज की तारीख में ये तीनो ही अमेरिका के अघोषित एक्सिस ऑफ इविल हैं.

नॉर्थ कोरिया भी ऐसा मोर्चा है, जो अमेरिका के साथ युद्ध के हिसाब से संवेदनशील है. युद्ध का खतरा दिखाने वाले संवेदी सूचकांक में नॉर्थ कोरिया और अमेरिका के सामने लाल बत्ती जलती रहती है. जब ट्रंप पहली बार राष्ट्रपति बने तो किम जोंग उन के साथ उनकी कई राउंड मौखिक लड़ाई हुई थी.

2017 में पहला राउंड हुआ

ट्रंप ने किम जोंग उन को लिटिल रॉकेट मैन कहा तो किम जोंग उन ने बदले में उन्हें डरपोक D*G कहा था. इसके अलावा ट्रंप को डोटार्ड भी कहा, जिसका अर्थ होता है मूर्ख बूढ़ा व्यक्ति.

2018 में दूसरा राउंड

नए साल के संदेश में किम ने कहा कि “मेरे डेस्क पर न्यूक्लियर बटन है”—और पूरा अमेरिका उसकी रेंज में है.  ट्रंप ने पलटवार किया और सोशल मीडिया संदेश में कहा कि “मेरे पास भी न्यूक्लियर बटन है, लेकिन यह उससे बहुत बड़ा और अधिक शक्तिशाली है और काम भी करता है."

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साउथ कोरिया भी बड़ा फैक्टर

9 मार्च 2026 से 19 मार्च 2026 तक साउथ कोरिया के साथ अमेरिका ने युद्धअभ्यास किया है, जिसे नाम दिया गया है फ्रीडम शील्ड 26. किम जोंग उन इसे अमेरिका का आक्रमण अभ्यास कहते हैं. उन्होंने जवाब में 10 बैलेस्टिक मिसाइल दाग दीं. अपनी सेनाओं को नदी पार करने के अभ्यास में लगा दिया. किम जोंग‑उन की बहन किम यो‑जोंग ने अमेरिकी अभ्यास के खिलाफ धमकी दी और कहा कि परिणाम कल्पना से परे होंगे. किम जोंग उन ने कहा कि अगर हमला हुआ तो बड़े विनाश के लिए तैयार रहें. अब सार्वजनिक जगहों पर नॉर्थ कोरिया के किम जोंग उन के साथ उनकी बेटी भी देखी जाती हैं. माना जा रहा है कि किम अपने उत्तराधिकारी को ट्रेनिंग दे रहे हैं.

समुद्र में क्या छिड़ेगा वर्ल्ड वॉर?

वैसे ईरान यु्द्ध के दौरान भी नॉर्थ कोरिया चर्चा का विषय बना. जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला कर दिया या वेनेजुएला में अमेरिका ने स्ट्राइक कर दी तो कहा गया कि किम जोंग उन के साथ अमेरिका ऐसा नहीं कर सकता है, क्योंकि उसके पास लंबी दूरी की मिसाइल और परमाणु बम है. तो क्या शांति से रहने के लिए अशांति का भंडार होना जरूरी है. वर्ना दुनिया एक जंगल हो चुकी है. आप जैसे ही कमजोर पड़े मजबूत आपको निगल जाएगा. अमेरिका को ग्रेट बनाने का जो प्लान ट्रंप के पास है, उसमें समुद्र बहुत महत्वपूर्ण है. आप कहेंगे कैसे तो इसको समझिए ऐसे कि जब अमेरिका किसी को धमकाता है तो उसके आसपास के समुद्र में अपने युद्धपोत ले जाकर खड़े कर देता है. ईरान हो या वेनेजुएला, दोनों को अमेरिका ने समुद्र में घेर लिया. इतिहास गवाह है कि दुनिया के समुद्र में अमेरिका के युद्धपोत भय की सुनामी पैदा करते हैं. युद्धपोतों ने अमेरिका की हनक साबित करने में बड़ी भूमिका निभाई. चीन और अमेरिका की दुश्मनी में भी समुद्र की बड़ी भूमिका है. अब आपको ट्रंप का वो मास्टरप्लान समझाते हैं, जो उन्होंने अमेरिका को फिर से ग्रेट बनाने के लिए तैयार किया है. इसमें भी समुद्र की भूमिका बहुत ज्यादा है.

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गल्फ ऑफ मेक्सिको-गल्फ ऑफ अमेरिका

दुनिया के नक्शे में अमेरिका के करीब पहुंचिए तो अटलांटिक, आर्किटक और पैसफिक ओशन दिखायी देते हैं. इनमें नॉर्थ एटलांटिक ओशन में कैरेबियन सी के ऊपर गल्फ ऑफ मेक्सिको हुआ करती थी. ट्रंप ने उसका नाम बदल दिया. अमेरिका में जनवरी 2025 में एक एक्सक्यूटिव ऑर्डर लिखा गया और अमेरिका के भीतर गल्फ ऑफ मेक्सिको का नाम गल्फ ऑफ अमेरिका हो गया. ट्रंप ने कहा कि ये पानी अमेरिका की सुरक्षा और आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इससे अमेरिका का गौरव बढ़ेगा, इसलिए इसका नाम अमेरिका के नाम पर ही होना चाहिए. इसलिए अमेरिका के भीतर अब गल्फ ऑफ मेक्सिको-गल्फ ऑफ अमेरिका है. इस बात का मेक्सिको ने विरोध किया. क्यूबा ने विरोध में साथ दिया. वैसे दुनिया में अमेरिका के बाहर ये अभी भी गल्फ ऑफ मेक्सिको है, क्योंकि वहां नाम बदलने के लिए अमेरिका को इंटरनेशनल हाइड्रोग्राफिक ऑर्गेनाइजेशन की इजाजत चाहिए, लेकिन ट्रंप यहीं नहीं रुके. उन्होंने अलास्का में मौजूद अमेरिका की सबसे ऊंची चोटी माउंट डेनाली का नाम बदल कर माउंट मैक्निले कर दिया. इसे भी उन्होंने अमेरिका के गौरव से जोड़ा.

पनामा नहर

अमेरिका और लैटिन अमेरिका के बीच में दुनिया के नक्शे पर नजर डालें तो अटलांटिक महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाली एक आर्टिफिशिएल कैनाल है. ये पनामा से निकलती है. लंबाई 82 किलोमीटर है. ये अमेरिका के लिए जहाजों की दूरी को करीब 12000 किलोमीटर कम कर देती है. दुनिया का 5% समुद्री व्यापार इसी नहर से होता है. अमेरिका, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया के लिए ये प्रमुख समुद्री व्यापार मार्ग है. नहर का निर्माण 1904 में शुरू हुआ और 1914 में पूरा हुआ. इसके निर्माण में मुख्य भूमिका अमेरिका की रही. 1999 में अमेरिका ने पनामा कैनाल पनामा को सौंप दी, लेकिन ट्रंप अब एक बार फिर इस पर कब्जे का दावा कर रहे हैं.

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क्यूबा

नॉर्थ एटलांटिक ओशन में कैरेबियन सी और गल्फ ऑफ मेक्सिको के बीच में एक देश है क्यूबा. इस देश से अमेरिका का पुराना छत्तीस का आंकड़ा है. ट्रंप ने अपनी ताजा धमकी में क्यूबा पर कब्जा करने का दावा किया है. क्यूबा अमेरिका के बीच लड़ाई की वजह विचारधारा है. विवाद की शुरूआत 1959 से हुई. साम्यवादी नेता फिदेल कास्त्रो ने समाजवादी सरकार बनाई, जिसे रूस का समर्थन था. इससे पहले क्यूबा में तानाशाह बतिस्ता का शासन था, जिसे अमेरिका का समर्थन था. कास्त्रो ने अमेरिकी कंपनी और बैंक का राष्ट्रीयकरण कर दिया, जैसे ईऱान में हुआ कि वहां जब तक शाह की सत्ता थी अमेरिका खुश था, लेकिन जैसे ही उसे हटा कर इस्लामिक अयातुल्लाह आए, अमेरिका की दुश्मनी शुरू हो गई. वहां भी तेल की कंपनी का राष्ट्रीयकरण हुआ था. वेनेजुएला में भी विवाद की बड़ी वजह तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण है. क्यूबा पर अमेरिका ने दुनिया का सबसे लंबा आर्थिक इंबार्गो लगा दिया, जो 1960 से अब तक जारी है. 1960 से 1980 के बीच सीआईए ने यहां बार बार घुसपैठ की. बे ऑफ पिग्स विश्व प्रसिद्ध तख्तापलट की घटना है, जिसमें CIA ने 1400 पूर्व क्यूबन को भेजकर कास्त्रो का तख्ता पलटने की कोशिश की थी. तब रूस ने क्यूबा में परमाणु मिसाइल लगा दीं. तनाव चरम पर पहुंच गया. ट्रंप राष्ट्रपति बने तो क्यूबा को आतंकवादी की लिस्ट में डाल दिया. 2025-26 में इसे स्टेट स्पॉन्सर्स टेररिज्म की लिस्ट में डाल दिया. अब क्यूबा पर कब्जे की धमकी दे रहे हैं. ईरान के साथ भी अमेरिका की मोडस ऑपरेंडी यही है.

ग्रीनलैंड

रूस, चीन और अमेरिका की लड़ाई में पिसने वालों की लिस्ट लंबी है. दुनिया के नक्शे पर एक देश ग्रीनलैंड हैं. डोनाल्ड ट्रंप ने उस पर कब्जा करने की जिद ठान ली है. ईरान युद्ध से पहले दुनिया में विवाद के नक्शे पर ग्रीनलैंड ही बड़ा फ्लैश प्वाइंट बनकर उभरा था. ट्रंप ने कहा कि किसी भी स्थिति में वो ग्रीनलैंड को अपने कब्जे में कर लेंगे. कारण भी बताया. वो रूस और चीन को अपना पड़ोसी नहीं बनाना चाहते.

अफगानिस्तान

रूस और अमेरिका की अदावत लिस्ट में एक नाम और प्रमुख है. ईरान का पड़ोसी अफगानिस्तान. पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जो मौजूदा जंग चल रही है, उसके बीज भी अमेरिका ने विश्व में शांति की रक्षा के लिए बोए थे. जैसे वो ईरान में हमले के लिए दावा कर रहे हैं, 1979 में रूस अफगानिस्तान में घुसा. अफगानिस्तान की कम्यूनिस्ट सरकार की रक्षा का दावा करके. ये वही साल है, जब ईरान में अयातुल्लाह ने इस्लामिक क्रांति की थी. 1980 में अमेरिका ने यहां पर ऑपरेशन साइक्लोन चलाया. रूस की सेना के खिलाफ मुजाहिद्दीन लड़ाकों को पैसा, हथियार और ट्रेनिंग दी. सऊदी अरब और पाकिस्तान की  ISI  ने रूस के खिलाफ अमेरिका का साथ दिया. तब वो अमेरिका के प्रॉक्सी रूस के खिलाफ लड़ रहे थे. जैसे ईरान के प्रॉक्सी इजरायल के खिलाफ लड़ रहे हैं.

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1989 में रूस हटा. अफगानिस्तान की सत्ता राष्ट्रपति नजीबुल्लाह को मिली, लेकिन गृहयुद्ध छिड़ गया. 1994 में तालिबान का उदय हुआ. 1996 में तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया. नजीबुल्लाह को मार दिया. तालिबान के साए में अलकायदा चीफ ओसामा बिन लादेन यहां छिपा रहा. अमेरिका में 9/11 अटैक हुआ. अमेरिका और नाटो ने अफगानिस्तान में अल कायदा के खिलाफ एक्शन शुरू कर दिया. 2001 से 2014 के बीच यहां अमेरिका समर्थित सरकार रही. मगर, 2020 में अमेरिका ने तालिबान से समझौता कर लिया. अमेरिकी फौज अफगानिस्तान से निकल गई. अब पाकिस्तान और तालिबान में युद्ध हो रहा है. ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, आतंकवाद के सबसे ज्यादा शिकार अब पाकिस्तान में हैं. भारत का मानना है कि पाकिस्तान की जमीन से आतंकवाद जन्म लेता है. फिर भी अमेरिका पाकिस्तान की पूरी मदद करता है.

यमन

दुनिया के नक्शे में विवाद का बड़ा केन्द्र यमन भी है. यमन में तीन सत्ताएं हैं. यहां पीएलसी की सरकार है, जिसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है, लेकिन देश की राजधानी और कुछ और हिस्सों में हूती का कब्जा है. हूती को ईरान समर्थित आतंकी गुट कहा जाता है, जिस पर इजरायल और अमेरिका हमला करते रहते हैं. हूती भी अमेरिका इजरायल के खिलाफ एक्शन करता है. यहां पर यूनाइटेड अरब अमीरात के समर्थन से चलने वाली साउदर्न ट्रांजिश्नल काउंसिल भी एक्टिव है. स्थितियां विस्फोटक हैं और लगभग युद्ध की स्थिति चलती रहती है.

सोमालिया

अफ्रीका के सोमालिया में कबीलों के विवाद ने आतंकवाद का रूप ले लिया है. अल-कायदा से जुड़े संगठन अल शबाब को इसके लिए जिम्मेदार माना जा रहा है.

नाइजीरिया

नाइजीरिया अफ्रीका का देश है. यहां कई तरह के कॉनफ्लिक्ट एक साथ चल रहे हैं. बोकोहरम सबसे कुख्यात है. नाइजर नदी के डेल्टा में क्रूड ऑयल पर कब्जे की लड़ाई लंबे समय से विस्फोटक बनी हुई है.

एशिया

एशिया में आते हैं. नक्शे पर युदध और विवाद के दृष्टिकोण से नजर डालें तो चीन और आसपास के इलाके बहुत संवेदनशील हैं. साउथ चाइना सी में चीन की मौजूदगी और एक्टिविटी निश्चित समय अंतराल में विवाद का विषय बनती है. यहां चीन के खिलाफ जो रीजनल स्टेक होल्डर्स हैं उनके पीछे अमेरिका खड़ा हो जाता है, लेकिन चीन लगातार इस इलाके में एक्टिव रहता है. यहां भी विवादों के पीछे समुद्र की बड़ी भूमिका है. साउथ चाइना सी में वियतनाम, फिलिपींस, मलेशिया, ब्रुनेई, ताइवान और इंडोनेशिया के विवाद हैं. यहां विवाद की वजह स्पार्तली और पार्सेल और नाटूना आईलैंड हैं. ईस्ट चाइना सी में चीन, जापान और ताईवान के बीच विवाद है. वजह सेनकाकू और दिएयू द्वीप समूह पर विवाद है.

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चीन Vs ताइवान

चीन और ताइवान को लेकर स्थितियां ज्यादा विस्फोटक हैं. चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है. ताइवान इससे सहमत नहीं है. दुनिया में सबसे ज्यादा आशंका इसी बात की है कि दुनिया में अगर चीन और अमेरिका युद्ध भूमि में कहीं आमने-सामने आ सकते हैं तो वो जगह ताइवान है. अगर चीन ताइवान पर कब्जा करने की कोशिश करता है तो ताइवान के पीछे अमेरिका की मिलिट्री पॉवर देखने को मिल सकती है. वैसे ऐसी ही स्थिति चीन-जापान तनाव की स्थिति में भी हो सकती है, लेकिन चीन का दावा है कि उसने 14 में से 12 देशों के साथ अपने क्षेत्रीय विवाद सुलझा लिए हैं. इसलिए अब बड़ा फ्लैश प्वाइंट चीन और ताइवान ही है.

रूस Vs यूक्रेन Vs नाटो

यूक्रेन के साथ रूस की लड़ाई 24 फरवरी 2022 से शुरू मानी जाती है. यहां यूक्रेन के पीछे नाटो देश खड़े हैं. अमेरिका भी यूक्रेन के साथ है. यूक्रेन ने अमेरिका-इजरायल की मदद की, जब ईरान युद्ध में शाहेद ड्रोन से निपटना चुनौती बन गया, लेकिन इसी युद्ध में नाटो और अमेरिका के बीच विरोध भी हो गया. जब नाटो देशों ने होर्मुज गलियारे में अमेरिका की मदद करने से मना कर दिया. अमेरिका ने समुद्र में बिछायी गयी माइन्स को हटाने के लिए मदद मांगी थी. अब ट्रंप ने नाटो देशों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. वो उन्हें धमकी दे रहे हैं. कायर कह रहे हैं. अगर अमेरिका अपने रूख पर कायम रहा. यूरोप से नाटो की सुरक्षा शील्ड हटी तो यहां भी स्थितियां बदल सकती हैं. तब दुनिया में युद्ध और कॉनफ्लिक्ट का नक्शा तेजी से बदलेगा.

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