रक्षाबंधन पर जहां देशभर में बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधने की तैयारी कर रही हैं, वहीं देहरादून से महज 30 किलोमीटर दूर बटोली गांव की कई बहनें इस बार अपने भाइयों तक पहुंच ही नहीं पाएंगी. वजह है गांव को बाकी दुनिया से काट देने वाला 300 फीट गहरा नाला और खतरनाक रास्ता. बारिश के मौसम में हालात इतने खराब हो जाते हैं कि ग्रामीण खुद को गांव में कैद महसूस करते हैं. कई महिलाओं ने रिश्तेदारों के हाथ राखी भेजी है, क्योंकि जान जोखिम में डालकर नाला पार करना संभव नहीं है. NDTV की टीम ने ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर बहनों का दर्द जाना.
देहरादून से 30 किलोमीटर, लेकिन विकास से वर्षों दूर
उत्तराखंड के कई गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पलायन की मार झेल रहे हैं. कहीं सड़क नहीं है, कहीं पुल नहीं है, तो कहीं रोजगार और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव लोगों को गांव छोड़ने के लिए मजबूर कर रहा है. देहरादून से करीब 30 किलोमीटर दूर सहसपुर विधानसभा का बटोली गांव भी ऐसी ही तस्वीर पेश करता है. यहां खेती-बाड़ी है, पक्के मकान हैं, प्राकृतिक सौंदर्य है, लेकिन एक सुरक्षित सड़क नहीं है. ग्रामीणों के अनुसार गांव के रास्ते में हुए बड़े लैंडस्लाइड ने स्थिति और गंभीर बना दी. भू-स्खलन के बाद करीब 300 मीटर लंबा और 300 फीट गहरा कटाव बन गया, जिसने गांव का संपर्क लगभग समाप्त कर दिया.

Raksha Bandhan 2026: बिना सड़क और पुल से कटा है गांव
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गांव पहुंचने के लिए जान जोखिम में डालना मजबूरी
बटोली गांव पहुंचने का अनुभव ही इस क्षेत्र की वास्तविक स्थिति बताने के लिए काफी है. गांव तक पहुंचने के लिए लोगों को पहले गहरे नाले में उतरना पड़ता है. इसके बाद दलदली जमीन, फिसलन भरे पत्थरों, चिकनी मिट्टी और बहते पानी के बीच से गुजरते हुए दूसरी ओर चढ़ाई करनी होती है. ग्रामीण बताते हैं कि बारिश होने पर यह रास्ता मौत का रास्ता बन जाता है. अगर कोई व्यक्ति नाले में उतरने के बाद अचानक पानी बढ़ जाए तो उसकी जान खतरे में पड़ सकती है. स्थिति इतनी गंभीर है कि प्रशासन ने स्थायी समाधान की जगह पीडब्ल्यूडी के दो मजदूर वहां तैनात कर रखे हैं, जो सुबह आठ बजे से शाम पांच बजे तक आने-जाने लायक अस्थायी रास्ता बनाने का प्रयास करते हैं.

Raksha Bandhan 2026: बहनों का छलका दर्द
रक्षाबंधन पर भाई-बहन नहीं मिल पा रहे
गांव की महिलाओं का कहना है कि इस बार रक्षाबंधन का त्योहार अधूरा रह जाएगा. गांव निवासी रेखा रावत बताती हैं कि बारिश के कारण नाले में पानी बढ़ जाता है और फिसलन भी बहुत ज्यादा हो जाती है. ऐसे में गांव से बाहर निकलना ही मुश्किल हो जाता है. सरिता रावत कहती हैं, ‘राखी का त्योहार है, लेकिन मैं अपने भाई के पास नहीं जा पा रही हूं. नाले में बहुत ज्यादा पानी है और उसे पार करने की हिम्मत नहीं हो रही.' उनके लिए रक्षाबंधन का पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि परिवार से जुड़ाव का अवसर होता है, जो इस बार छिन गया है.

Raksha Bandhan 2026: बहनें नहीं बांध पाती राखी
राखी रिश्तेदारों के हाथ भेजनी पड़ी
गांव की एक अन्य महिला सीमा की आंखों में दर्द साफ दिखाई देता है. वह कहती हैं कि उन्होंने अपने भाई को साफ मना कर दिया कि वह गांव आने की कोशिश न करे, क्योंकि रास्ता बेहद खतरनाक है. सीमा कहती हैं, ‘मुझे डर है कि मेरे भाई को भी खतरा हो सकता है. इसलिए मैंने रिश्तेदारों के माध्यम से उसके लिए राखी भिजवा दी है.' एक बहन का अपने भाई को राखी न बांध पाना केवल व्यक्तिगत दुःख नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की विफलता है जो आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों तक नहीं पहुंच सकी.
मानसून में गांव बन जाता है कैदखाना
ग्रामीणों का कहना है कि हर साल मानसून के दौरान बटोली गांव लगभग नजरबंद हो जाता है. लोग जरूरी कामों के लिए भी बाहर नहीं निकल पाते. मेहमान आना बंद हो चुके हैं. रिश्तेदार गांव आने से डरते हैं. ग्रामीण बताते हैं कि अब लोग साफ कह देते हैं कि जब गांव पहुंचने का रास्ता ही नहीं है तो वहां कैसे आएं. गांव में कई मकानों पर ताले लगे हैं. बड़ी संख्या में परिवार पलायन कर चुके हैं और जो लोग बचे हैं, वे भी बच्चों को पढ़ाई के लिए देहरादून, विकासनगर और अन्य कस्बों में किराये के कमरों में रख रहे हैं.

Raksha Bandhan 2026: ग्राउंड जीरो से NDTV
बीमारी भी बड़ी चुनौती
बटोली गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं का संकट भी गंभीर है. गांव की महिला सरिता रावत बताती हैं कि उन्हें एक सप्ताह से बुखार है. शरीर में दर्द है, लेकिन वह अस्पताल या बाजार तक नहीं जा सकतीं. उन्होंने किसी के हाथ दवा मंगवाई और उसी के सहारे इलाज कर रही हैं. वहीं ग्रामीण सुखबीर सिंह रावत बताते हैं कि उन्हें तेज बुखार होने पर भी इसी खतरनाक रास्ते से होकर दवा लेने जाना पड़ा. वह कहते हैं, ‘अगर गांव में किसी की मौत हो जाए तो पांच लोग भी नहीं मिलेंगे जो अर्थी उठा सकें.'
चुनाव में वादे, बाद में खामोशी
ग्रामीणों में सरकार और प्रशासन के प्रति नाराजगी भी साफ दिखाई देती है. गांव के कपूर सिंह पुंडीर कहते हैं कि कई बार अधिकारियों को ज्ञापन दिए गए, कई बार ग्रामीणों को लेकर प्रशासन से मुलाकात की गई, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं निकला. उनका कहना है, ‘वोट लेने के समय नेता जरूर आते हैं, लेकिन सड़क और पुल की बात पर सिर्फ आश्वासन मिलता है.' ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों से उनकी समस्याएं फाइलों में बंद हैं, जबकि हर मानसून में उन्हें जान जोखिम में डालकर जीना पड़ता है.
एक साल बाद भी नहीं बदले हालात
ग्रामीण बताते हैं कि पिछले एक साल में स्थिति सुधरने की बजाय और खराब हुई है. कटाव और गहरा हो गया है. मलबा बढ़ गया है. पानी का बहाव तेज हो गया है और खतरा पहले से ज्यादा बढ़ चुका है. इसके बावजूद गांव को सुरक्षित सड़क या पुल से जोड़ने के लिए कोई ठोस काम दिखाई नहीं दे रहा.
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