- उत्तराखंड में 23 बड़े ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, ग्लोबल वार्मिंग इसकी वजह है.
- पिथौरागढ़, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमौली से लेकर कई स्थानों में ग्लेशियर पिघल रहे हैं.
- बढ़ता तापमान इसकी बड़ी वजह माना जा रहा है.
दुनिया में इस वक्त जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की वजह से तापमान बढ़ रहा है और बढ़ते तापमान का सीधा असर ग्लेशियर पर पड़ रहा है. खासकर हिमालय के ग्लेशियर पर उत्तराखंड के हिमालय क्षेत्र में मौजूद ग्लेशियर इस वक्त खतरे की जद में हैं. एक रिसर्च में यह पाया गया कि उत्तराखंड के 23 बड़े ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं इन ग्लेशियर की रफ्तार का कारण जहां जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग की वजह बढ़ता तापमान है वही एक दूसरा कारण इन ग्लेशियर का आकर, ढलान, मलबा कितना है यानी यह समझ लीजिए ग्लेशियर की भौगोलिक स्थिति.
नेपाल का जलप्रलय बड़ा उदाहरण
अगस्त के महीने में नेपाल में आया जल प्रलय इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि जलवायु परिवर्तन ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बढ़ता तापमान ग्लेशियर पर कितना बुरा प्रभाव डाल रहा है तेजी से बड़े-बड़े ग्लेशियर के हिमखंड टूट कर नीचे तलहटी से बहते हुए आबादी में भारी तबाही ला रहे हैं. यही वजह है कि अब वैज्ञानिकों के साथ पर्यावरणविदों और तमाम सरकारों का केंद्र बिंदु हिमालय के वह ग्लेशियर हैं जो खतरे में आ गए हैं. क्योंकि हिमालय के ग्लेशियर न सिर्फ भारत बल्कि भारत के अलावा अन्य पड़ोसी देश में सिंचाई पीने का पानी और जल विद्युत परियोजनाओं में उपयोग में आता है हिमालय से गंगा, भागीरथी, सतलुज रावी, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, यमुना, अलकनंदा, महाकाली जैसी कई बड़ी नदियां निकलती हैं, जो मानव सभ्यता के लिए वरदान साबित है लेकिन इनमें आने वाली हिमालय से नेपाल जैसा जल प्रलय खतरनाक ही नहीं बल्कि जानलेवा भी साबित हो रहा है.
उत्तराखंड में यहां पिघल रहे ग्लेशियर
उत्तराखंड का क्षेत्र भी हूबहू नेपाल की तरह ही है यही वजह है कि यहां पर मौजूद ग्लेशियर की सेहत को लेकर वैज्ञानिक परिवार चिंता में रहते हैं. क्योंकि उत्तराखंड में गंगोत्री, अलकापुरी, मिलम, पिंडारी, खतलिंग, सतोपंथ, भागीरथी के अलावा सैकड़ो ग्लेशियर है जिनकी पिछले कुछ सालों में पिघलने की रफ्तार तेजी से बड़ी है इसके अलावा न सिर्फ यह ग्लेशियर पीछे की और किसके हैं इसके अलावा उनकी चौड़ाई इनकी मोटी पर भी ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ते तापमान जलवायु परिवर्तन का असर पड़ा है. दरअसल, डिस्कवर जिओसाइंस में एक रिसर्च पेपर पब्लिश हुआ है ज्योति कुमारी, गिरीश चंद्र कोठारी, अतुल कुमार पाटीदार और वादिया इंस्टीट्यूट का हिमालयन जियोलॉजी के सीनियर वैज्ञानिक मनीष मेहता ने रिसर्च की है 23 ग्लेशियर के रिकॉर्ड देखे गए और में रिकॉर्ड्स के आधार पर यह पाया गया कि एक ग्लेशियर के पिघलने का कारण क्या है.
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कितनी रफ्तार से पिघल रहे ग्लेशियर
- पिथौरागढ़ जिले के शंकुल्प ग्लेशियर का 76 साल (1881-1957)का रिकार्ड देखा गया ग्लेशियर 518 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 6.8 मीटर प्रतिवर्ष है.
- उत्तरकाशी के बंदर पूछ ग्लेशियर का 39 साल (1960-1999) के रिकॉर्ड में 995 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 25.51 मीटर प्रतिवर्ष है.
- रुद्रप्रयाग के चोराबरी ग्लेशियर का 48 साल (1962-2010) के रिकॉर्ड में 327 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 6.8 मीटर प्रतिवर्ष है.
- टिहरी के खतलिंग ग्लेशियर का 49 साल (1965-2014) के रिकॉर्ड में 4340 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 88 मीटर प्रतिवर्ष है.
- गंगोत्री ग्लेशियर का की दो बार अध्ययन किया गया पहला 69 साल का ( 1935-2004) के रिकॉर्ड में 1519.13 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 22.02 मीटर प्रतिवर्ष है.
- दूसरा 6 साल (2004-2010) के रिकॉर्ड में 119 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 21.3 मीटर प्रतिवर्ष है.
- उत्तरकाशी के डोकरानी ग्लेशियर का दो बार का रिकॉर्ड का अध्ययन किया गया जिसमे 45 साल (1962-2007) के रिकॉर्ड में 751.35 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 16.7 मीटर प्रतिवर्ष है दूसरा अध्ययन में 6 साल (2007-2013) के रिकॉर्ड में 128 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 21 मीटर प्रतिवर्ष है.

- उत्तरकाशी के भागीरथी ग्लेशियर के 49 साल (1968-2017) के रिकॉर्ड में 182 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 3.7 मीटर प्रतिवर्ष है
- चमोली जिले के सतोपंथ ग्लेशियर के 44 साल (1962-2006) के रिकॉर्ड में 1163.65 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 26.45 मीटर प्रतिवर्ष है
- टिपरा ग्लेशियर के 46 साल (1962-2008) के रिकॉर्ड में 663 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 14.41 मीटर प्रतिवर्ष है
- दुनागिरी ग्लेशियर 51 साल ( 1962-2013) के रिकॉर्ड में 484 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 9 मीटर प्रतिवर्ष है
- पिथौरागढ़ के मिलम ग्लेशियर अध्ययन दो बार किया गया , पहले अध्ययन में 49 साल (1968-2017 ) के रिकॉर्ड में 1565 मीटर पिघला है. इसकी पिघलने की रफ्तार 32 मीटर प्रतिवर्ष है दूसरे अध्ययन में 46 साल (1972-2018) के रिकॉर्ड में 1749 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 37.8 मीटर प्रतिवर्ष है
- उत्तरी नंदा देवी ग्लेशियर के 37 साल ( 1980-2017) के रिकॉर्ड में 797 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 22 मीटर प्रतिवर्ष है

- चांगबंग ग्लेशियर के 37 साल (1980-2017 ) के रिकॉर्ड में 620 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 17 मीटर प्रतिवर्ष है
- रमणी ग्लेशियर के 37 साल ( 1980-2017) के रिकॉर्ड में 1138 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 32 मीटर प्रतिवर्ष है
- बेथरतोली ग्लेशियर के 37 साल ( 1980-2017) के रिकॉर्ड में 358 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 10 मीटर प्रतिवर्ष है
- त्रिशूल ग्लेशियर के 37 साल (1980-3017 ) के रिकॉर्ड में 777 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 21 मीटर प्रतिवर्ष है
- दक्षणी नंदा देवी ग्लेशियर के 37 साल (1980-2017 ) के रिकॉर्ड में 603 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 16 मीटर प्रतिवर्ष है
- पिंडारी ग्लेशियर अध्ययन दो बार किया गया , पहले अध्ययन में 121 साल (1845-1966) के रिकॉर्ड में 2840 मीटर पिघला है, इसकी पिघलने की रफ्तार 23.4 मीटर प्रतिवर्ष है दूसरे अध्ययन में 18 साल (2000-2018) के रिकॉर्ड में 825.23 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 45.85 मीटर प्रतिवर्ष है
- कफनी ग्लेशियर के 46 साल ( 1972-2018) के रिकॉर्ड में 1057 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 16 मीटर प्रतिवर्ष है
- रालम ग्लेशियर के 26 साल (1990-2016 ) के रिकॉर्ड में 416 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 16 मीटर प्रतिवर्ष है
- जौंदर बमक ग्लेशियर के 35 साल (1975-2010 ) के रिकॉर्ड में 1399 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 40 मीटर प्रतिवर्ष है
- झज्जु बमक ग्लेशियर के 48 साल (1962-2010) के रिकॉर्ड में 700 मीटर पिघला है इसकी पिघलने की रफ्तार 13.46 मीटर प्रतिवर्ष है
उत्तराखंड में मलबे से ढके हुए ग्लेशियर
इन सभी ग्लेशियर के पुराने रिकॉर्ड का अध्ययन किया गया और ही पाया कि जो ग्लेशियर मलबे से ढके हुए है, उनके पिघलने की रफ्तार कुछ मीटर प्रति वर्ष है लेकिन जो ग्लेशियर साफ बर्फ वाले हैं. उनकी पिघलने की रफ्तार 80 मीटर प्रति वर्ष से भी अधिक पाई गई है. ग्लेशियर पर सीधे तौर पर असर डालने वाले कारक में जलवायु परिवर्तन है यानी तापमान का बढ़ना. अगर इसी तरह से ग्लेशियर पिघलते रहे तो समुद्र का जलस्तर बढ़ाने का खतरा बन रहा है. इसके अलावा प्राकृतिक खतरे जिसमें ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड, एवलांच आना और ऊंचाई से मलबे के नीचे बहना से प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ गया है.
वही साल 2000 के बाद ग्लेशियर की पिघलने की रफ्तार बहुत तेजी से बड़ी है इन सब ग्लेशियर के पिघलने का कारण 4000 मीटर तक बारिश का होना भी है. क्योंकि 4000 मीटर पर पहले बर्फ पड़ती थी. लेकिन अब वहां बारिश हो रही है इसके अलावा गर्मियों का सीजन भी पड़ गया है और सर्दियों में पढ़ने वाली बर्फ बहुत कम पड़ रही है और जो बर्फ पड़ भी रही है उसको जमाने में टाइम नही मिल पा रहा है. ग्लेशियर के पिघलने की वजह से ग्लेशियर झील बनने का ज्यादा खतरा पैदा हो गया है.
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