- अल्फ्रेड कुक भारतीय वायुसेना के फाइटर पायलट थे जिन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध में अद्वितीय वीरता दिखाई थी.
- 1965 के कलाईकुंडा हवाई युद्ध में कुक ने अकेले 4 पाकिस्तानी जेट्स का मुकाबला किया था.
- उनकी बहादुरी के लिए वीर चक्र मिला था. निधन से तीन दिन पहले उन्होंने एनडीटीवी से डिटेल बातचीत की है.
तारीख 18 सितंबर 2026, दिन शुक्रवार. जब रात में भारत के अधिकांश लोग अपने-अपने घरों में सो रहे थे, उसी दौरान देश ने अपने एक महान सपूत को खो दिया. इनका नाम था- अल्फ्रेड कुक. ये अग्रेजी नाम सुनकर आपकी जेहन में आएगा ये भारतीय सपूत कैसे? जरा तसल्ली रखिए, नाम भले अंग्रेजी हो लेकिन अल्फ्रेड कुक ने देश के लिए जो किया, वो अपने आप में बेहद चौंकाने वाला है. अल्फ्रेड कुक भारतीय वायुसेना के फाइटर पायलट थे. 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने जिस वीरता का परिचय दिया था, वो अपने आप में अतुलनीय है. उस जंग में अल्फ्रेड कुक अकेले ही पाकिस्तान के 4 जेट्स से भिड़ गए थे. खास बात यह है कि इस दौरान उनकी गोलियां खत्म हो गई थी. लेकिन इसके बाद भी वो दुश्मन के जेट्स से लोहा लेते रहे. कुक ने जब तक पाकिस्तानी जेट्स का पीछा जारी रखा, जब तक वो भाग न खड़े हुए हो.
वीर चक्र से सम्मानित किए गए थे अल्फ्रेड कुक
अल्फ्रेड कुक की इस अद्वितीय वीरता के लिए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया था. बीते शुक्रवार को दिल्ली में उनका निधन हो गया. कुक के निधन के साथ ही भारत ने एक महान फाइटर पायलट को हमेशा के लिए खो दिया. लेकिन उनके किस्से लंबे समय तक लोगों को प्रेरित करते रहेंगे. इस बीच NDTV के साथ एक गजब का संयोग भी हुआ. निधन से मात्र तीन दिन पहले अल्फ्रेड कुक एनडीटीवी दफ्तर पहुंचे थे.

आखिरी इंटरव्यू में अल्फ्रेड कुक.
Photo Credit: NDTV
NDTV के पास अल्फ्रेड कुक का आखिरी इंटरव्यू
उन्होंने डिफेंस कवर करने वाले NDTV के दो सीनियर पत्रकार विष्णु सोम और शिव अरूर से लंबी बातचीत की थी. इस बातचीत के दौरान अल्फ्रेड कुक ने भारत-पाकिस्तान के बीच 1965 में हुई लड़ाई के साथ-साथ अन्य मुद्दों पर खुलकर चर्चा की. अल्फ्रेड कुक के साथ हुई यह बातचीत अब एनडीटीवी की अनमोल धरोहर हैं. क्योंकि कुक का यह आखिरी इंटरव्यू हैं. इस इंटरव्यू में अल्फ्रेड कुक ने क्या कुछ कहा था, पढ़ें अल्फ्रेड कुक की आखिरी इंटरव्यू की खास बातें.
'पायलट के हौसले से मिलती है जंग में जीत'
1965 की लड़ाई के दिखाई अपनी वीरता के बारे में अल्फ्रेड कुक ने कहा, "युद्ध या संकट के समय सिर्फ आधुनिक विमान काम नहीं आते, बल्कि पायलट का हौसला, गहन प्रशिक्षण और अपनी मशीन पर अटूट विश्वास ही जीत दिलाता है." NDTV के पॉडकास्ट 'कंट्रोल ऑल्ट डिफेंस' में उन्होंने 7 सितंबर 1965 के कलाईकुंडा हवाई युद्ध की रोमांचक और अनसुनी दास्तान साझा की.

1965 की वो घटना, जब पाक के चार जेट्स से भिड़े थे कुक
उन्होंने बताया कि उस दिन पश्चिम बंगाल स्थित कलाईकुंडा एयरबेस पर पाकिस्तानी वायुसेना के चार एफ-86 सेबर जेट्स ने अचानक हमला कर दिया था. हॉकर हंटर उड़ा रहे अल्फ्रेड कुक ने अपने विंगमैन ममगेन के साथ मिलकर मोर्चा संभाला. संख्याबल में भारी दुश्मन के सामने पीछे हटने के बजाय कुक ने अकेले चारों सेबर विमानों को उलझा लिया. अदम्य साहस दिखाते हुए उन्होंने पाकिस्तानी स्क्वाड्रन लीडर अफजल खान के विमान को मार गिराया और दूसरे विमान (तारिक हबीब) को गंभीर नुकसान पहुंचाया.
पाक जेट्स को भगाकर दमदम एयरपोर्ट पर उतरे थे कुक
डॉगफाइट के दौरान जब कुक का गोला-बारूद पूरी तरह समाप्त हो गया, तब भी उन्होंने रणक्षेत्र नहीं छोड़ा. अपने विंगमैन ममगेन को दुश्मन के निशाने पर देख निहत्थे कुक ने अपने हंटर को आक्रामक मुद्रा में चौथे पाकिस्तानी सेबर के पीछे लगा दिया और कलाबाज़ियां दिखाते हुए विंगमैन की जान बचाई. क्षतिग्रस्त विंग, खराब स्पीड इंडिकेटर और नाममात्र ईंधन के साथ उन्होंने कोलकाता के दमदम एयरपोर्ट पर विमान की चमत्कारी आपातकालीन लैंडिंग कराई.

तकनीकी कमियों के बारे में भी कुक ने की बात
NDTV के इस पॉडकास्ट में कुक ने युद्ध की गंभीर तकनीकी कमियों को भी उजागर किया. जैसे हाई-एक्सप्लोसिव के स्थान पर 'बॉल एम्युनिशन' मिलना और प्रशस्ति पत्र में ममगेन की जान बचाने का उल्लेख न होना. इसी आंतरिक असंतोष के चलते उन्होंने वायुसेना से इस्तीफा दिया और बाद में ऑस्ट्रेलिया बस गए. कई रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि कलाईकुंडा में प्रदर्शित उनकी असाधारण वीरता वास्तव में 'परमवीर चक्र' के योग्य थी.
बताते चले कि अल्फ्रेड कुक का जन्म लखनऊ में हुआ था. शुरुआती पढ़ाई-लिखाई और परवरिश लखनऊ के प्रतिष्ठित ला मार्टिनियर कॉलेज में हुई थी. उनके माता-पिता एंग्लो-इंडियन समुदाय से थे. वर्ष 1968 में भारतीय वायु सेना से सेवानिवृत्ति के बाद वह ऑस्ट्रेलिया जाकर बस गए थे. लेकिन अपनी स्क्वाड्रन और भारत के प्रति उनका लगाव बरकरार रहा.
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